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अमरीका में जारी है रंगभेद

विचार

 

अमरीका में जारी है रंगभेद

रघु ठाकुर


अमरीका में फर्ग्युसन में फैली हिंसा को रोकने के प्रयासों ने अमरीकी सरकार को कठिनाई में डाल दिया है. 23 नवम्बर 2014 को ज्यूरी कोर्ट ने सेन्ट लुईस के उपनगर फर्ग्युसन में 18 वर्षीय माईकल ब्राउन की पुलिस अधिकारी लारेन विलसन की गोली से हुई मौत के मामले में विलसन के खिलाफ मुकद्मा चलने से इंकार किया था. ग्रैंड ज्यूरी जिसमें 3 अश्वेत सदस्य थे और 9 श्वेत समुदाय के.

रंगभेद


श्वेत समुदाय के सदस्यों ने बहुमत से विलसन के खिलाफ मुकदमा चलाने से इंकार कर दिया था परन्तु इस फैसले को अश्वेत समदाय ने गलत फैसला माना. यहॉं तक कि अर्टानी जनरल ने इस फैसले की आलोचना की और कहा कि अश्वेत युवक आमतौर पर पुलिस अधिकारियों के हाथों मारे जाते हैं और ज्यूरी इस प्रकार उन्हे दोषमुक्त कर देती है.

इन घटनाओं ने अनेक पहलू दुनिया के सामने लाये हैं. रंगभेद और नस्लभेद कितनी गहरी बीमारी होती है यह इस चिंगारी से सामने आ गया है. 130 स्थानों पर अमरीका के मिसोरी राज्य में तथा दुनिया के अन्य कई देशों में भी अश्वेतों ने इस फैसले का विरोध किया है. अमरीका के 37 राज्यों में भी विरोध की सूचनायें हैं तथा अश्वेत समुदाय ने आक्रोश में पुलिस की इमारत को भी जलाया है और दुकानों की लूटपाट की है.

यह हालात तब है जब अमरीका के राष्ट्रपति के पद पर एक अश्वेत बराक ओबामा है और यह उनका दूसरा कार्यकाल है. परन्तु अश्वेत राष्ट्रपति होने के बाद अश्वेत समुदाय के मन में श्वेत समुदाय के प्रति जो संशय व्याप्त है और नस्लीय भेदभाव या रंगभेदभाव के जो संदेह व्याप्त हैं उन्हे अमरीका हल नही कर पाया है. बराक ओबामा होने वाले पहले अश्वेत राष्ट्रपति थे. इससे अश्वेतों के मन में गौरव का भाव तो पैदा हुआ है परन्तु व्यवस्था के प्रति विश्वास पैदा नही हुआ. यह हिंसा दरअसल अमरीकी व्यवस्था के प्रति अविश्वास के कारण है.

अमरीका सारी दुनिया में जाति और साम्प्रदायिक हिंसा के खिलाफ अगुवा बनने का प्रयास करता रहा है परन्तु खुद अपने समाज को नही बदल सका. विज्ञान ने और अमरीकी वैज्ञानिकों ने बड़े बड़े हथियारों की खोज की है परन्तु रंगभेद को या नस्लभेद को मन या तन से मिटाने की कोई खोज नही की. अभी भी अंर्तनस्लीय विवाह बहुत कम ही होते हैं और रंगभेद अमरीकी समाज में छिपा हुआ है.

मानवीय सभ्यता के विकास और अमरीकी समाज के बड़े बड़े दावे का खोखलापन ऐंसी घटनाओं से सिद्ध होता है. फर्ग्युसन की हिंसा कोई अकेली एक घटना को लेकर नही है बल्कि ऐंसी अनेकों घटनायें जिनमे श्वेत पुलिस अधिकारियों के द्वारा अश्वेतों की हत्या पर ज्यूरी अदालतों ने निष्पक्षता नही बरती, घटती रही है, का परिणाम है. अमरीकी समाज का यह रंगभेद व नस्लीय व्यवहार पहले भी सामने आ चुका है. अमरीका जब ईराक युद्ध में फॅंसा था तब अमरीकी सेना में काले सैनिकों को भर्ती करने के लिये पहली बार कोलेन पावेल, एक अश्वेत को सैन्य प्रमुख बनाया गया था ताकि श्वेत मौत के शिकार न हो.

उन्होने बाद में विदेश सचिव के रूप में भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की और अमरीका के युद्ध के पक्ष में समूची दुनिया में वातावरण बनाने के पक्ष में जनमत तैयार करने के लिये दिन रात भ्रमण किया परन्तु अमरीका को सफलता मिलते ही उन्हे न केवल किनारे कर दिया गया बल्कि ऐंसी परिस्थितयॉं पैदा कर दी गई कि उन्हे राष्ट्रपति पद का सपना देखना तो दूर राजनीति से ही अलग थलग हो जाना पड़ा.

बराक ओबाम का निर्वाचन भी कोई अमरीकी समाज की क्रांतिकारिता नही है बल्कि एक अर्थ में लाचारी थी क्योंकि इस्लामिक आंतकवाद के खिलाफ अमरीका को एकजुट रखने और अमरीकी सैन्य शक्ति की सैन्य संख्या वृद्धि की दृष्टि से ओबामा को राष्ट्रपति बनाना अमरीकी व्यवस्था के हित में था. अमरीका ने अपने देश में दो खण्ड बना लिये हैं एक अमरीका की निर्वाचित सरकार है और दूसरी तरफ अमरीकी व्यवस्था और प्रशासन.

सरकारें बदलती रहती है परन्तु अमरीकी व्यवस्था और प्रशासन की नीति और चरित्र लगभग स्थिर रहता है. यह एक अर्थ में अच्छा भी है कि राज्य की नीतियॉं व्यक्ति के साथ नही बदलती है. भारत जैंसे देश में प्रधानमंत्री के पद पर व्यक्ति के बदलने के साथ ही राज्य की नीतियॉं भी बदल जाती है याने नीतियॉं बहुत हद तक व्यक्तिपरक होती है जबकि अमरीका मे ंनीतियॉं राज्यपरक होती हैं.

भारत के राजनेताओं को अमरीका की फर्ग्युसन की घटना उनके अपने साम्प्रदायिक सोच जाति सोच और रंगभेदी सोच को तर्क दे सकती है और वे किसी दिन शान के साथ कह सकते हैं कि इन बीमारियों से मुक्ति संभव नही है. यह तो अमरीका में भी है.

मुझे याद है कि पूर्व विदेश मंत्री श्री जसवंत सिंह जब अमरीका यात्रा से लौटकर आये और भारतीय रेलों के बिलंब से चलने पर उनसे एक पत्रकार ने शिकायतनुमा चर्चा की और सत्ताधीशों के लिये या बड़े लोगों के लिये गाड़ियों को बिलम्बित करने की चर्चा की तो उन्होने अपनी अमरीका यात्रा का अनुभव उद्धृत करते हुये कहा कि यह सारी दुनिया में हो रहा है.

उन्होने बताया कि वे जब अमरीका यात्रा के समय किसी रेल से जा रहे थे तो रेल शुरू होते ही रूक गई और लगभग एक घंटा वही खड़ी रही क्योंकि अमरीका के किसी लोकप्रिय अभिनेता के आने का इंतजार था और उसी लिये गाड़ी खड़ी रही थी. मुझे नही पता कि उनके कथन में कितनी सच्चाई है. हो सकता है कि सच्चाई हो भी परन्तु यह कोई अच्छा उदाहरण नही हो सकता. दुनिया के अनेक देशों में अनेक घटनाओं के ऐंसे भी उदाहरण दिये जा सकते है जिनमे समान व्यवहार की घटनायें सामने आई है जैसे पिछले दिनों ब्रिटिश प्रधानमंत्री मारग्रेट थेचर के बेटे का अधिक गति से गाड़ी चलाने पर जुर्माना हुआ था या अमरीका में ब्रिटिश प्रधानमंत्री केमरून की गाड़ी की गलत पार्किंग को लेकर जुर्माना हुआ था.

15.12.2014, 14.59 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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