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मोदी लहर पर विराम

आलेख

 

मोदी लहर पर विराम

सत्येंद्र रंजन


झारखंड और जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव के नतीजों को नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भारतीय जनता पार्टी की एक और सफलता दिखाने के तर्क मौजूद हैं. अगर तुलना इन राज्यों के पिछले विधानसभा चुनावों से की जाए तो बेशक भाजपा की छलांग प्रभावशाली लगेगी. मसलन, 2009 में झारखंड में भाजपा ने 20.18 प्रतिशत वोट हासिल कर 18 जीती थीं. जम्मू-कश्मीर में 2008 में 12.45 फीसदी मत और 11 सीटें उसे हासिल हुई थीं. इस बार झारखंड में सीटें 37 और वोट 31.3 प्रतिशत मिले. जम्मू-कश्मीर में सीटें 25 हैं, और वोट 23 प्रतिशत. लेकिन क्या यह तुलना वाजिब है?

नरेंद्र मोदी


इस वर्ष 16 मई को जब लोकसभा के चुनाव परिणाम आए और भाजपा ने अप्रत्याशित जीत दर्ज की, तो राजनीतिक टीकाकारों ने उसे राजनीतिक सुनामी की संज्ञा दी. कहा गया कि उन नतीजों ने भारतीय राजनीतिक धरातल की अंदरूनी संचरना बदल दी है. अक्टूबर में महाराष्ट्र और हरियाणा के विधानसभा चुनाव परिणामों को उसी भूचाल का आगे बढ़ना बताया गया.

अगर हम इस व्याख्या को स्वीकार करते हों, तो फिर जम्मू-कश्मीर और झारखंड के ताजा जनादेश को समझने का आधार वर्ष क्या होना चाहिए? जाहिर है, तार्किक यह होगा कि इन चुनाव की तुलना पिछले लोकसभा चुनाव से हो. और तब यह स्वीकार करने में किसी विवेकशील व्यक्ति को दिक्कत नहीं होगी कि जम्मू-कश्मीर और झारखंड चुनाव नतीजे भाजपा की आशाओं के अनुरूप नहीं आए.

झारखंड में वह अपने गठबंधन सहयोगी ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन (आजसू) के साथ मिल कर सरकार बनाने की स्थिति में पहुंच गई, मगर पिछले लोकसभा चुनाव के नतीजों की रोशनी में देखें तो यह परिणाम भाजपा के लिए मायूसी का सबब होना चाहिए. मई में राज्य की 14 में से 12 लोकसभा सीटें भाजपा के खाते में गई थीं. उसे 40.11 प्रतिशत वोट मिले थे. सिर्फ छह महीनों का फर्क यह है कि पार्टी अपने बूते बहुमत हासिल नहीं कर पाई, जबकि उसके वोट प्रतिशत में 8.81 फीसदी की गिरावट आई. कहा जा सकता है कि तब लोगों ने केंद्र में सरकार बनाने के लिए नरेंद्र मोदी के नेतृत्व को समर्थन दिया था, जबकि विधानसभा चुनाव में क्षेत्रीय पहलू प्रासंगिक हो गए.

मगर इसकी अनदेखी नहीं हो सकती कि इस चुनाव में भी भाजपा का चेहरा मोदी ही थे. उन्होंने राज्य के 81 में से 39 विधानसभा क्षेत्रों में चुनाव सभाएं कीं. फिर इस बार भाजपा ने अपने साथ आजसू को भी जोड़ लिया था, जिसे लोकसभा चुनाव में अलग से 3.71 फीसदी वोट मिले थे. यानी ये गठबंधन 43.82 प्रतिशत वोट आधार के साथ मैदान में उतरा था. आजसू अपने वोट बचाने में सफल रहा और यही कारण है कि अब भाजपा राज्य में सरकार का नेतृत्व करने जा रही है.

जम्मू-कश्मीर पर गौर करें तो वहां ये पार्टी महज 25 सीटें ही जीत पाई. लोकसभा चुनाव में उसे 32.36 प्रतिशत वोट मिले थे. इस बार यह आंकड़ा 23 फीसदी रह गया. यानी 9.36 प्रतिशत का नुकसान. लोकसभा चुनाव में उसने लद्दाख की सीट भी जीती थी, जबकि इस बार वहां कांग्रेस ने वापसी की. भाजपा की तमाम सफलताएं जम्मू क्षेत्र में सिमटी रह गईं.

पहले से जताई संभावनाओं के अनुरूप ही जम्मू-कश्मीर पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी विधानसभा में सबसे बड़ा दल बन कर उभरी, जबकि कांग्रेस और नेशनल कांफ्रेंस का प्रदर्शन उनके लिए जताई गई आशंकाओं की तुलना में कहीं बेहतर रहा. भाजपा ने इस चुनाव में मिशन 44+ के साथ ऊंची उम्मीदें जोड़ी थीं. यानी मकसद 87 सदस्यीय विधानसभा में अपने बूते बहुमत हासिल करना था. कश्मीर घाटी में भी उसने खूब ताकत झोंकी. मगर वहां उसका कोई उम्मीदवार जमानत नहीं जीता.

कुल निष्कर्ष यह उभरा कि जम्मू के जिन मतदाताओं को हिंदुत्व और सीमित अर्थ में कथित विकास के अपने एजेंडे से उसने गोलबंद किया, उनके अलावा किसी अन्य क्षेत्र या समूह के बीच वह समर्थन नहीं पा सकी. उलटे लेह- लद्दाख में सात महीने पहले मिला समर्थन भी उसके हाथ से निकल गया. तो क्या यह कहना निराधार होगा कि इन दो राज्यों के चुनाव में “मोदी मैजिक” की सीमाएं स्पष्ट हो गईं?

संकेत यह है कि मोदी सुनामी से उबर कर अब भारतीय राजनीति फिर से अपने समान धरातल पर लौट रही है. लोकसभा चुनाव में जो जनादेश आया, उसे गढ़ने में “मोदी मैजिक” और अमित शाह के जमीनी स्तर के सियासी प्रबंधन के साथ-साथ ‘अच्छे दिन’ की जगाई गई उम्मीदों की निर्णायक भूमिका थी. ये उम्मीदें भाजपा बनाए नहीं रख सकी तो आने वाले चुनावों में “मैजिक और प्रबंधन” की सीमाएं और स्पष्ट हो सकती हैं.

दरअसल, भाजपा के लिए फिलहाल फायदे का एक बड़ा पहलू कांग्रेस की रणनीति-हीनता है. कांग्रेस की निराशाओं का सिलसिला थमता नजर नहीं आता. हालांकि जम्मू-कश्मीर में उसका वैसा सफाया नहीं हुआ, जिसकी आशंका थी, इसके बावजूद उसके वोट प्रतिशत में और गिरावट आई, जो उसके समर्थन आधार में जारी क्षरण का संकेत है.

झारखंड में भी पिछले लोकसभा चुनाव की तुलना में उसे तकरीबन 3 प्रतिशत कम वोट मिले. सीटों के लिहाज से वह चौथे नंबर पर चली गई. जम्मू-कश्मीर में भी यही हाल रहा. यानी महाराष्ट्र और हरियाणा का सिलसिला आगे बढ़ा, जहां कांग्रेस प्रमुख विपक्षी दल के रूप में भी नहीं उभर पाई थी. (महाराष्ट्र में शिवसेना के भाजपा नेतृत्व वाली सरकार में शामिल होने के बाद जाकर उसे विधानसभा में मुख्य विपक्षी दल का दर्जा मिला.)

जाहिर है, पार्टी का संकट गहरा है. नेतृत्व और नीति दोनों ही स्तरों पर कांग्रेस संभलती नहीं दिखती. नतीजतन, वह लोगों के मानस से हट रही है. जल्द ही दिल्ली विधानसभा के चुनाव में उसे फिर ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ सकता है, जहां मीडिया पहले से ही मुख्य मुकाबला भाजपा और आम आदमी पार्टी के बीच होने की संभावनाएं जता रहा है.

कांग्रेस के पुनरुद्धार की फिलहाल क्षीण दिखती संभावनाओं का परिणाम है कि क्षेत्रीय दल नई प्रासंगिकता हासिल कर रहे हैं. झारखंड में भाजपा को मुख्य टक्कर झारखंड मुक्ति मोर्चा ने दी, जबकि बाबू लाल मरांडी के झारखंड विकास मोर्चा (प्रजातांत्रिक) ने उससे दो अधिक यानी 8 सीटें जीतीं. जम्मू-कश्मीर में कांग्रेस से गठबंधन तोड़ कर मैदान में उतरी नेशनल कांफ्रेंस अपनी तमाम अलोकप्रियता के बावजूद कांग्रेस से तीन अधिक यानी 15 सीटें जीतने में कामयाब रही. जाहिर है, क्षेत्रीय दलों को खारिज करने की जल्दबाजी नहीं दिखाई जानी चाहिए.

पीडीपी, नेशनल कांफ्रेंस, झामुमो तथा झाविमो (प्रजातांत्रिक) को मिली सफलताओं पर गौर करें तो यही संकेत मिलता है कि क्षेत्रीय आकांक्षाओं की नुमाइंदगी करने वाले दल मतदाताओं की प्राथमिकता में प्रासंगिक बने हुए हैं.

दो महीने पहले महाराष्ट्र में शिवसेना और एनसीपी तथा हरियाणा में इंडियन नेशनल लोक दल को मिले समर्थन के साथ ताजा परिणामों को जोड़ कर देखें तो क्षेत्रीय दलों की कायम अहमियत की और पुष्टि होती है. इसके साथ ही यह सवाल अधिक प्रासंगिक होता जा रहा है क्या आने आने वाले समय में मोदी मैजिक की चमक उतरने के साथ भारतीय राजनीति का ध्रुवीकरण भाजपा और क्षेत्रीय के बीच होगा?

06.01.2015, 17.32 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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