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अश्वमेध घोड़े की वापसी

विचार

 

अश्वमेध घोड़े की वापसी

रघु ठाकुर


केन्द्र की मोदी सरकार ने अंततः भूमि अधिग्रहण कानून में संषोधन करने का निर्णय कर लिया है तथा केबिनेट के इन निर्णयों को राष्ट्रपति जी ने अध्यादेश के रुप में जारी करने के लिए बगैर किसी विलम्ब के अनुमोदित भी कर दिया है. जिस प्रकार देश व दुनिया के कारपोरेटस् ने श्री नरेंद्र मोदी का समर्थन किया था उससे यह निर्णय अपेक्षित ही था, क्योंकि भूमि अधिग्रहण कानून में वर्ष 2013 के संशोधनों के बाद से देश का कारपोरेट मीडिया पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार को व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को नीति पक्षाघात का शिकार घोषित करने लगा था.

भूमि अधिग्रहण


भूमि अधिग्रहण कानून ब्रिटिशकाल में लागू किया गया था तथा उसके माध्यम से सरकारों को यह अधिकार दिया गया था कि वे जनहित के नाम पर किसी भी भूमि का अधिग्रहण कर सकते हैं. यह अधिग्रहण वास्तव में भू.स्वामियों को जमीन से बेदखल करने का व बलात् जमीन छीनने का अधिकार था.

जनहित की व्याख्या तथा घोषणा तो अंततः नौकरशाही व सत्ता को ही करना थी. पिछले लगभग 100 वर्षों से यह कानून देश के राजनीतिक शक्ति से वंचित समुदायों व किसानों को उनकी जमीन से बेदखल करने का औजार बना हुआ था. इसके विरुद्ध देश में अनेकों अंचलों में आंदोलन भी चले, विशेषतः 1950 के दशक में समाजवादी नेता स्वर्गीय डॉ. राममनोहर लोहिया की प्रेरणा से देश के पहले भूमि अधिकार के अहिंसक सत्याग्रह की शुरुआत वर्तमान छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले के सिहावा अंचल से हुई थी. बाद में कोरबा, उड़ीसा और झारखंड के कोयलांचल आदि क्षेत्रों में भी इस भूमि अधिग्रहण के खिलाफ समाजवादियों ने आंदोलन शुरु किए.

कुछ इलाकों में 1984 के बाद गैर सरकारी सत्ता संरक्षित और पोषित आंदोलन समूह भी विरोध में उतरे. समाजवादी आंदोलन ने जनता के प्रतिरोध, क्रोध व हताशा को राजनीतिक बदलाव की ओर प्रवृत्त किया था और एक जन-राजनीति की शुरुआत की थी. परन्तु गैर सरकारी नामक इन समूहों ने सत्ता की स्थिरता के भीतर ही छुटपुट राहतों के प्रयास किए और नारे दिए. ऐसे आंदोलन सरकारों को भी सुविधाजनक थे क्योंकि वे बदलाव के बजाए थोड़ी थी राहत में संतुष्ट हो जाते थे.

बहरहाल लम्बे संघर्षों के बाद वर्ष 2013 में ब्रिटिशकाल के भूमि अधिग्रहण कानून में कुछ जनहितैषी संशोधन हो सके थे. सिंचित या दो.फसली जमीन का अधिग्रहण नहीं होगा. जनहित की परिभाषा की गयी थी तथा सड़क, शाला, अस्पताल और ग्रामीण अधोसंरचना को ही जनहित माना गया था. औद्योगीकरण की जरुरतों को जनहित से अलग कर व्यापारिक गतिविधि के रुप में रखा गया था. .किसान की या भूमि मालिक की सहमति तथा मुआवजे के बगैर अधिग्रहण पर रोक लगी थी तथा मुआवजे का पूर्व भुगतान जरुरी बनाया गया था. जहां 80 प्रतिशत किसान अपनी सहमति व्यक्त न करें वहां अधिग्रहण न हो यह प्रावधान भी जोड़े गए थे.

इसके अलावा जमीन का मुआवजा बाजार दर से दोगुना होगा तथा कुछ वर्षों तक उसकी कीमत के एक हिस्से के बराबर क्षतिपूर्ति के रुप में मदद दी जाती रहेगी. दरअसल इन संशोधनों के माध्यम से भूमि विस्थापितों के पुनर्वास पैकेज की शुरुआत हुई थी, यद्यपि यह प्रावधान सम्पूर्ण न्याय के कदम तो नहीं थे परन्तु कुछ न कुछ राहत देने वाले अवष्य थे. हालांकि हम लोगों की मांग तो यह थी कि औद्योगिक उद्देश्यों के लिए नए अधिग्रहण के बजाए बंद कारखानों की जमीनों का इस्तेमाल हो. अगर कोई बाध्यता नहीं हो तो जमीन के अधिग्रहण की बजाए उसे पट्टे पर लिया जाए तथा उसका नियमित किराया उद्योग जगत या सरकार भू.मालिकों को दे.

संबंधित उद्योग या प्रकल्प में न्यूनतम 25 प्रतिशत अंश विस्थापित लोगों के नाम निशुल्क किया जाए तथा उससे उन्हें नियमित मुनाफे का कुछ हिस्सा दिया जाता रहे. सरकार की भूमिका उद्योग जगत के लठैत या बिचौलिए की नहीं है बल्कि जनता के संरक्षण की होना चाहिए. कारखाने बंदी पर जमीने उनके पूर्व मालिक किसानों को ही वापस की जाना चाहिए परन्तु उद्योग जगत को तो भूमि अधिग्रहण लूट का सबसे आसान जरिया रहा है. किसानों की जमीन को मिट्टी के मोल छीनकर स्वतः भूमि के मालिक बन जाना यह उनका खेल रहा है.

1990 के दशक में तो उन्होंने कारखानों के आधुनिकीकरण के नाम पर इन अधिग्रहित जमीनों को बेचने का अधिकार भी पा लिया. जबकि न्याय का तकाजा यह था कि कारखाना बंदी पर जमीने किसानों को वापस की जाती. अस्सी वर्षीय मनमोहन सिंह के हटने के बाद तथा 65 वर्षीय नरेन्द्र मोदी के सत्ताग्रहण के बाद बाजार की परिभाषा का नीति पक्षाघात का दौर व आरोप समाप्त हो गए हैं और बाजार मोदी से समर्थन की कीमत अधिग्रहण कानून के कठोर हाथ की वापसी के रुप में मांग रहा था.

इंदौर में पिछले दिनों जो वैष्विक पूंजी निवेशकों का सम्मेलन हुआ था जिस पर मध्यप्रदेश सरकार ने करोड़ों रुपये खर्च किए थे इसी रणनीति का एक हिस्सा था तथा सूचनाओं के अनुसार श्री शिवराज सिंह चौहान के प्रति नापसंदगी के बावजूद भी अंतिम दिन श्री नरेंद्र मोदी इस सम्मेलन में पहुंचे और उन्होंने शिवराज सिंह की प्रषंसा भी की तथा तीन महत्वपूर्ण नीतिगत संकेत भी दिए. श्री नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री व श्री शिवराज सिंह चौहान मुख्यमंत्री ने स्पष्ट घोषणा की आप उद्योगपतिः जहां उंगली रखें वह जमीन आपको मिल जाएगी. देश में पूंजी का संकट है तथा उसका हल विदेषी और देषी पूंजीपतियोंध्साहूकारों का पूंजीनिवेश ही हो सकता है. विकास व रोजगार सृजन की एकमात्र औषधि पूंजीनिवेश व बड़े उद्योग हैं.

प्रधानमंत्रीजी ने सम्मेलन में ही मुख्यमंत्री से कहा कि आप मुझे छोड़ने जाने का शिष्टाचार छोड़ें तथा यहीं निवेशकों से चर्चा करें यानी राजनीतिक रुप से प्रधानमंत्री ने संकेत दे दिया कि देश की निर्वाचित सरकार से और देश के शिष्टाचार के कानूनों से ज्यादा महत्वपूर्ण पैसे वाले हैं. हालांकि उन्हें बाहर तक छोड़ने जाने व आने में बमुष्किल पांच मिनट का ही समय लगता परन्तु देश व दुनिया के आर्थिक मालिकों का समय भारत के प्रधानमंत्री से भी ज्यादा महत्वपूर्ण है.

प्रधानमंत्री व मुख्यमंत्री ने इंदौर के सम्मेलन में यह स्पष्ट तौर पर कह दिया कि जहां उंगली रखोगे वहां की जमीन आपको मिल जाएगीए इनका यह कथन कुछ.कुछ ऐतिहासिक व पौराणिक अश्वमेध यज्ञ के घोड़े की याद दिलाता है जिसे यज्ञ के बाद छोड़ा जाता था तथा जहां तक घोड़ा पहुंच जाए वह जमीन यज्ञ करने वाले राजा की हो जाती थी. अगर कोई घोड़े को रोक ले तो उस राजा के साथ युद्ध होता था. उस जमाने का युद्ध राजा बनाम राजा होता थाए अब 21वीं सदी का यह युद्ध सत्ता बनाम जनता का है क्योंकि इस घोड़े को बांधने का प्रयास जनता को ही करना होगा.

जिन पांच मुद्दों को नए भूमि अधिग्रहण संशोधन अध्यादेश 2014 में शामिल किया गया है उनमें से चार तो पहले ही विद्यमान थे. जो पांचवां बिन्दु जोड़ा गया है वह है. औद्योगिक कारीडोर. मोदी सरकार 500 स्मार्ट सिटी बनाना चाहती है तथा उनमें औद्योगिक कारीडोर भी बनेगें तभी वे टोकियो, सिंगापुर, पेरिस या बर्लिन जैसे बन सकेंगे और इनके लिए लगभग पांच करोड़ एकड़ कृषि भूमि का अधिग्रहण करना होगा यानी भारत की कृषि भूमि का लगभग चौथाई हिस्सा इस नये शहरीकरण और औद्योगीकरण की भेंट चढ़ जायेगा.

हम किसान व कृषि जनित रोजगारों को मिटाकर उद्योग जनित चंद निपुण रोजगार पैदा करेंगे. हम खाद्यान्न आयात के मार्ग प्रशस्त करेंगे तथा खाद्य निर्यातक से खाद्य आयातक देश में तब्दील होकर विश्व व्यापार संगठन व दुनिया के सम्पन्न देशों की इच्छापूर्ति करेंगे. हम पांच.छह करोड़ हाथों को बेरोजगार कर पन्द्रह.बीस लाख लोगों को रोजगार देंगे तथा 25 करोड़ की विशाल आबादी को भुखमरी की ओर ढकेलेंगे. हम ग्राम व ग्रामीण किसी सभ्यता को नष्ट कर औद्योगिक असभ्यता के दौर को लायेंगे.

क्या देश की जनता व राजनीतिक दल इन आसन्न खतरों पर विचार करेंगे या केवल कुर्सी.कुर्सी खेलते रहेंगेए इस प्रश्न का उत्तर 21वीं सदी को देना होगा और अन्त में यह कि 29 दिसम्बर 2014 को केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने उपरोक्त अध्यादेश को स्वीकृति दी तथा 30 दिसम्बर को ही राष्ट्रपति जी ने इसे स्वीकृति प्रदान की. अच्छा होता कि राष्ट्रपति जी इन बिन्दुओं पर निर्णय के पूर्व विचार करते..

1. 23 दिसम्बर 2014 को संसद का सत्र समाप्त हुआ है और अगर सरकार उनमें उन्हें पारित नहीं करा सकी तो क्या यह अध्यादेश संसद की भावनाओं के अनुकूल है तथा संसद के द्वारा अनिर्णीत मुद्दों पर अध्यादेश लाना लोकतांत्रिक परम्परा होगी.

2.जब भूमि अधिग्रहण एवं पुनर्वास विधेयक 2013 पारित हुआ था जिसे संसद ने लगभग सर्वसम्मति से स्वीकृत किया था जिसमें भाजपा का भी समर्थन था और जिसे कानूनी शक्ल देकर जारी करने का आदेश राष्ट्रपति जी के रुप में स्वतः प्रणव बाबू के हस्ताक्षर से हुआ था तब क्या यह संशोधन वैधानिक संवैधानिक परम्पराओं और राष्ट्रपति जी के पद और संसद के सम्मान के अनुकूल होगा.

स्वतः राष्ट्रपतिजी ने अध्यादेश का प्रारुप लेकर आने वाले मंत्रियों से यह पूछा कि इतनी षीघ्रता क्या हैए अब लोग जानना चाह रहे हैं कि राष्ट्रपति जी को हस्ताक्षर करने की भी शीघ्रता क्या थी. अगर कोई आवश्यकता होती भी तो क्या यह उचित नही होता कि राष्ट्रपतिजी अपनी पहल पर संसद का दो दिवसीय विशेष अधिवेशन आमंत्रित करातेए इन प्रस्तावों पर बहस कराते और फिर निर्णय करते.

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6.01.2015, 17.20 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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