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एजाज अहमद | आज का दौर | aijaz ahamad

आज के दौर की तस्वीर: चार | किसकी सदी, किसकी सहस्त्राब्दि ?

 

उपनिवेशवाद, फासीवाद और अंकल शाइलॉक

एजाज अहमद

अनुवादः श्री प्रकाश

 

 

 

 

लेखों की इस श्रृंखला के पहले हिस्सों में समाजवाद, राष्ट्रीय मुक्ति और मानवीय जीवन के हर पहलू के जनवादीकरण की बात उठाई गयी है और इनसे ही 20वीं सदी की मूल कहानी बनती है. क्रांति व मुक्ति की इन ताकतों के खिलाफ जानलेवा आक्रमण (जो अधिकतर कारगर भी रहे) की कथा भी उतनी ही मौलिक व महत्वपूर्ण है. इस दूसरे परिपेक्ष्य से देखने पर 20वीं सदी की कहानी को प्रतिस्पर्धी औपनिवेशिक व साम्राज्यवादी राष्ट्र-राज्यों के बीच विभाजित दुनिया के पूंजी-शासित एकीकृत विश्व साम्राज्य में बदलने की प्रक्रिया के रूप में भी देखा जा सकता है.


19वीं सदी की कसौटी यह है कि इसने उन्नत पूंजी के राष्ट्र-राज्यों और उसके उपनिवेशों पर आधारित एक विश्व अर्थव्यवस्था बनाने की प्रक्रिया पूरी की, जबकि 20वीं सदी की कसौटी यह रही कि इसने औपनिवेशिक साम्राज्यों की व्यवस्था को ढहते हुए देखा. फिर नव उत्तर-औपनिवेशिक विश्व की संरचना आर्थिक, सामाजिक, वैचारिक और सौंदर्यशास्त्रीय आधार पर कैसे हो, इसे लेकर समाजवाद और पूंजीवाद के बीच हुई संघातिक प्रतिस्पर्धा हुई, जिसकी गवाह भी 20वीं सदी रही है. इस प्रतिस्पर्धा के अंत में सोवियत संघ के ढहने के बाद जो व्यवस्था आयी, उसे ढीले-ढाले अर्थो में 'भूमंडलीकरण' कहा जाता है.

औपनिवेशिक युग की शुरुआत 15वीं सदी से मानी जा सकती है. 19वीं सदी के शुरु होने से पहले एशिया और खासतौर पर अफ्रीका का काफी हिस्सा औपनिवेशिक संप्रभुता से बाहर ही रहा. फिर गति तेज हुई. 19वीं सदी के पहले 75 वर्शों में औपनिवेशिक शक्तियों ने 210,000 वर्ग किलोमीटर प्रति वर्ष की रफ्तार से गैर-यूरोपीय धरती को अपने कब्जे में लिया. 1970 के दशक के मध्य से और प्रथम विश्व युध्द (1914-18) के बीच में जमीन हथियाने की यह रफ्तार 620,000 वर्ग किलोमीटर प्रति वर्ष रही. 1914 तक आते-आते भूमंडल का 85 प्रतिशत हिस्सा औपनिवेशिक शक्तियों, उनके उपनिवेशों और पूर्व उपनिवेशों का हो गया. इस 20वीं सदी की शुरुआत ऐसे मोड़ पर हुई, जहां विश्व का औपनिवेशिक विभाजन पहले से ही पूरा हो चुका था.

 

औपनिवेशीकरण की इस त्वरित गति को 19वीं सदी के अंतिम दशकों में हुई दूसरी औद्योगिक क्रांति से पैदा हुई प्रौद्योगिकी से आंशिक तौर पर सहयोग मिला. जैसे भारी मात्रा में इस्पात निर्माण, औद्योगिक रसायन, आंतरिक-दहन इंजन, ऊर्जा के स्रोत के रूप में बिजली व तेल, रेलवे-टेलीग्राफ का प्रसार. इस अपूर्व औद्यौगिक रूपांतरण के दो पहलुओं का स्थायी असर पड़ा. ऐसे उद्योगों की खातिर निवेश के लिए पूंजी का इतना केन्द्रीकरण हुआ कि वित्तीय पूंजी और औद्योगिक पूंजी में एक नये किस्म का विभाजन पैदा हो गया. कई मर्तबे तो वित्तीय पूंजी, औद्योगिक पूंजी पर ही भारी पड़ गयी. दूसरा पहलू था, इन नये किस्म के उद्योगों का पश्चिमी यूरोप के कई हिस्सों, अमरीका और जापान तक भी फैलाव, जिसके कारण अमरीका, जर्मनी, इटली और बेल्जियम जैसे कुछ अन्य देशों में भी अतंर-औपनिवेशिक शत्रुता बढ़ गई.

ऐसे विश्व में जो पहले से ही बड़े-बड़े औपनिवेशिक ताकतों में विभाजित था, किसी किस्म के नये युध्द दुनिया को फिर से विभाजित करने वाले युध्द ही साबित होते. अब प्रतिस्पर्धा सिर्फ नियंत्रण से बाहर वाले उस क्षेत्र को हथियाने के लिए न होकर निर्यात बाजार, कच्चे माल के स्रोतों, व उस निवेश के अवसरों के लिए थी, जो क्षेत्र पहले से ही स्थापित औपनिवेशिक ताकतों के कारण संकटग्रस्त था. इस तरह 20वीं सदी की अंतिम बेला में औपनिवेशिक प्रसार व अंतर औपनिवेशिक शत्रुता में एक नये किस्म की तेजी आयी जो एक क्रूर कांड में तब्दील हो गयी. इतिहास में ऐसा कोई युध्द नहीं हुआ, जिसमें इतने सारे देश शामिल हों और इतना व्यापक भूमंडलीय दांव लगा हो और जिसे 'विश्व युध्द' कहा जा सकता हो. 20वीं सदी की यह खास बात रही कि इसकी शुरुआत ,कम या अधिक, एक ऐसे ही युध्द से हुई.

इतिहास में ऐसा कोई युध्द नहीं हुआ, जिसमें इतने सारे देश शामिल हों और इतना व्यापक भूमंडलीय दांव लगा हो और जिसे 'विश्व युध्द' कहा जा सकता हो.


लेकिन 1870-1914 के समय ने ही सारे मुख्य पूंजीवादी देशों में औद्योगिकीकरण के नये रूपों व चढावों को देखा. साथ ही एशिया और अफ्रीका में औपनिवेशीकरण की तेज गति को देखने के साथ ही यूरोप में मजदूरों की पहली पार्टियों के उभार और औपनिवेशिक महादेशों में नये किस्म के पहले उपनिवेश-विरोधी आंदोलनों की भी गवाह 20वीं सदी बनी. प्रथम विश्व युध्द और उसके कारण यूरोपीय व्यवस्था के ढहने से यूरोप में और पूरी दुनिया के स्तर पर खास एवं बड़े नतीजे निकले.

इस पतन ने ही यूरो-एशियाई धरती में चुपचाप पड़े भौगोलिक अर्थो में सबसे बड़े देश यानी रूस में क्रांति की राह बनाने में मदद की. इससे यूरोप के इटली, जर्मनी, ऑस्ट्रिया, हंगरी और स्पेन जैसे कई देशों में महान क्रांतिकारी उथल-पुथल हुए. यूरोप से बाहर कई देशों में, खास तौर पर भारत, चीन और पूर्व व दक्षिण-पूर्व के कई अन्य देशों में कम्यूनिस्ट पार्टियों की नींव इसी समय पड़ी. यूरोपीय व्यवस्था के इसी पतन ने वह वातावरण मुहैया कराया, जिसमें उभरते हुए उपनिवेश विरोधी आंदोलन जनांदोलनों में बदलना शुरु हो गये. और जब यही यूरोपीय तंत्र दो दशकों बाद फिर ढहा, जिसके कारण द्वितीय विश्व युध्द (1939-45) हुआ तो अगले तीस वर्ष (1945-75) यूरो-एशिया और अफ्रीका में औपनिवेशिक साम्राज्यों के पतन और पूर्वी एशिया से पूर्वी और मध्य यूरोप और लातिन अमेंरीका तक के दर्जनों देशों में समाजवादी सरकारों के उभार के गवाह बने.

यूरोपीय औपनिवेशिक तंत्र के संकट ने दो विश्व युध्द दिये और इस संकट से निकले समाजवाद और राष्ट्रीय मुक्ति के उभार की चर्चा इस श्रृंखला के पिछले लेखों (खास तौर पर लोकतांत्रिक मांग की सदी) में हो चुकी है.

लेकिन अन्य दो नतीजे भी उतने ही महत्वपूर्ण रहे: एक, फासीवाद का वैश्विक स्वरूप का हो जाना तथा कुछ देशों में उसका राज्य सत्ता तक पहुंच जाना. दूसरा, यूरोपीय व्यवस्था को दरकिनार करते हुए अमरीका का विश्व प्रभुत्व के स्तर तक टिके रहने वाला उभार और भूमंडलीकरण के रूप में साम्राज्यवाद की ऐतिहासिक तौर पर एक नयी अवस्था की नींव पड़ना.
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