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धर्म, राजनीति और हिंसा

मुद्दा

 

धर्म, राजनीति और हिंसा

राम पुनियानी


पाकिस्तानी तालिबानियों द्वारा पेशावर में सैंकड़ों बच्चों की हत्या, इस्लामवादी संगठन ‘बोको हरम’ द्वारा किये जा रहे अत्याचार, हत्याएं और अपहरण व पेरिस की कार्टून पत्रिका ‘शार्ली हैबो’ पर हुये हमले में 16 लोगों की मौत-ये सभी घटनाएं पिछले चंद महीनों में हुईं हैं. इनसे इस्लाम के हिंसक धर्म होने की जनमान्यता को और मजबूती मिली है. ‘‘इस्लामिक आतंकवाद’’ शब्द, जिसे अमरीकी मीडिया ने 9/11 की घटना के बाद गढ़ा था, को मानो जबरदस्त बूस्टर डोज का इंजेक्शन लगा दिया गया है.

धार्मिक हिंसा


अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शरीयत, लड़कियों की शिक्षा आदि जैसे मुद्दों पर इस्लाम के संदर्भ में बहुत कुछ लिखा जा रहा है. कुछ लेखक इस तरह की कायराना हरकतों से इस्लाम को जोड़ने का विरोध कर रहे हैं तो कुछ इस बात पर जोर दे रहे हैं कि मुसलमान, अपने ही धर्मावलंबियों को क्रूरतापूर्वक मौत के घाट उतारने में तनिक भी संकोच नहीं करते. ये सभी मुद्दे टीवी और प्रिंट मीडिया में छाए हुए हैं.

इन आतंकी हमलों में जो लोग मारे जा रहे हैं, वे निर्दोष हैं. कुरान के अध्याय पांच की आयत 32 कहती है, ‘‘जिसने किसी इंसान को कत्ल कर डाला, उसने मानो सारे ही इंसानों को कत्ल कर दिया और जिसने किसी की जान बचाई, उसने मानो सारे इंसानों को जीवनदान दिया.’’ इसके बाद भी, यह मान्यता बनी हुई है कि हर भयावह आतंकी हमले के पीछे कोई न कोई मुस्लिम संगठन या गुट होता है. सन् 2011 में एंड्रेस बेहरिंग ब्रेविंग नामक ईसाई ने नार्वे में 77 लोगों को जान से मार डाला था. ऐसी ही अकारण हिंसा, आशिन विराथू नाम के बौद्ध ने म्यानामार में की थी.

स्वामी असीमानंद, जो कि हिंदू हैं, ने यह स्वीकार किया है कि समझौता एक्सप्रेस व अन्य आतंकी हमलों में उनका हाथ था. क्या हम इस्लाम-मुसलमानों और आतंकी घटनाओं के बीच संबंध को कम करके बताना चाहते हैं? क्या हम मुसलमानों द्वारा की जा रही हिंसा को नकारना चाहते हैं? इसमें कोई संदेह नहीं कि कुरान की शिक्षाओं के बावजूद, कुछ मुसलमान, वहशियों की तरह, निर्दोष इंसानों की निर्मम हत्यायें कर रहे हैं. परंतु प्रश्न यह है कि क्या इस तरह की घटनाओं के लिए इस्लाम या सभी मुसलमानों को दोशी ठहराया जा सकता है? हम धर्म और हिंसा व आतंकवाद के परस्पर संबंध को कैसे समझें?

मोटे तौर पर कहा जा सकता है कि लगभग सभी धर्मों के पैगम्बरों ने समाज में व्याप्त अन्याय का विरोध किया और अपने-अपने ऐतिहासिक संदर्भों में शांति और अहिंसा पर जोर दिया. अधिकतर पैगम्बरों के युग में समाज या तो पशुपालक था या कृषक और कबीलों या बादशाहों द्वारा शासित राज्यों के रूप में संगठित था. शुरूआत में जो धर्म केवल नैतिकता का संदेश देते थे वे भी धीरे-धीरे सामाजिक व सामुदायिक जीवन में हस्तक्षेप करने लगे. सभी धर्मों में पुरोहित वर्ग का उदय हुआ.


धर्मों ने संस्थागत स्वरूप ले लिया और वे एक सामाजिक परिघटना के रूप में उभरने लगे. धर्म से जुड़ी संस्थाएं, धर्म का महत्वपूर्ण भाग बन गईं. सत्ताधारियों ने धार्मिक संस्थाओं से गठजोड़ बनाने शुरू कर दिये और धार्मिक संस्थाओं को शासकों का संरक्षण मिलने लगा.

इसके बदले, धार्मिक संस्थाओं ने राजाओं की सत्ता को वैध और तर्कसंगत बताना शुरू कर दिया. अलग-अलग धर्मों ने अलग-अलग तरीकों से राजाओं को ईश्वर से जोड़ा, ताकि दोनों की सत्ता बरकरार रह सके. राजाओं और पुरोहित वर्ग के गठजोड़ के उदाहरण हैं सम्राट-पोप, नवाब-शाही इमाम और राजा-राजगुरू. इस समय पाकिस्तान और म्यानामार में धार्मिक संस्थाएं और प्रभुत्वशाली सेना का गठबंधन मनमानी कर रहा है. एक मराठी उक्ति ‘‘शेठजी-भट्टजी’’ (जमींदार-पुरोहित) इस संबंध को परिभाषित करती है.

जैसे-जैसे धर्म संस्थागत स्वरूप ग्रहण करते गये, राजाओं और पुरोहित वर्ग की सहभागिता ने एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था की नींव रखी जिसमें राजा की सत्ता और पुरोहित वर्ग की वैचारिकी की संयुक्त शक्ति के समक्ष किसानों, कारीगरों और अन्य मेहनतकशों ने समर्पण कर दिया. पैगम्बरों की शिक्षाएं भुला दी गईं. जहां तक संस्थागत पुरोहित वर्ग का प्रश्न है, वह ईसाई धर्म में सबसे अधिक संगठित और हिंदू धर्म में सबसे अधिक विकेंद्रित है. इस्लाम में पुरोहित वर्ग के लिए कोई जगह नहीं है परंतु फिर भी वहां इमामों और मुल्ला-मौलवियों की एक बड़ी फौज खड़ी हो गई है.

इसके बाद शुरू हुआ सत्ताधारियों द्वारा धर्म का दुरूपयोग. शासकों ने सत्ता हासिल करने के लिए धर्म का लबादा ओढ़ना शुरू कर दिया. जो राजा अपने साम्राज्य को बढ़ाना चाहते थे वे इसके लिए किए जाने वाले युद्ध को क्रूसेड, धर्मयुद्ध या जिहाद कहने लगे. यह करके वे यह बताना चाहते थे कि वे अपने लिए नहीं वरन् धर्म के लिए लड़ रहे हैं.

धार्मिक पहचान या लेबिल का उपयोग साम्राज्यवादी दौर में और बढ़ा. अधिकांश दक्षिण एशियाई देशों, विषेशकर भारत में, साम्राज्यवादी दौर में उद्योगों, आधुनिक शिक्षा, संचार व यातायात के विकास के साथ सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन आए और व्यापारियों, उद्योगपतियों, श्रमिकों और शिक्षित मध्यम वर्ग का उदय हुआ. इन वर्गों ने धर्मनिरपेक्ष संगठन बनाये जिनका लक्ष्य था प्रजातांत्रिक धर्मनिरपेक्ष भारतीय राष्ट्र का निर्माण. ऐसे संगठनों में शामिल थे हिंदुस्तान सोशलिस्ट आर्मी (भगत सिंह) व इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी व शिड्यूल्ड कास्ट फेडेरेशन (बी.आर अंबेडकर) और सबको साथ लेकर चलने वाली भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (मौलाना अबुल कलाम आजाद व महात्मा गांधी).

इन नये उभरते वर्गों के विपरीत जमींदारों और राजाओं के अस्त होते वर्गों ने अंग्रेजों के प्रति वफादारी जतानी शुरू कर दी और मुस्लिम लीग, हिंदू महासभा व आरएसएस जैसे संगठन बनाये, जिनका एजेण्डा इस्लामिक या हिंदू राष्ट्र की स्थापना था. धार्मिक राष्ट्रवादी संगठनों में शुरूआत में केवल राजा व जमींदार थे. परंतु बाद में कुछ पढ़े-लिखे उच्च जातियों के श्रेष्ठि वर्ग और उसके पश्चात् मध्यम वर्ग के कुछ सदस्य भी इन संगठनों के साथ हो लिये.

अस्त होते वर्गों ने धर्मों की सामुदायिक पहचान का इस्तेमाल अपने सामाजिक-राजनैतिक हितों की रक्षा के लिए करना शुरू कर दिया. जब वे कहते थे कि ‘‘मेरा धर्म खतरे में है’’ तो उसका असली अर्थ यह होता था कि ‘‘मेरे राजनैतिक हित खतरे में हैं’’. उन्होंने दूसरे धर्मों के प्रति घृणा फैलाना भी शुरू कर दी जिसके नतीजे में सांप्रदायिक दंगे शुरू हो गये और अंततः देश का विभाजन हो गया. इन वर्गों और संगठनों ने धर्म का इस्तेमाल धार्मिक राष्ट्रवाद और जातिगत व लैंगिक पदानुक्रम के अपने सामंतवादी मूल्यों को ढंकने के लिए किया. इसी तरह, बौद्ध धर्म का इस्तेमाल कुछ राजनैतिक ताकतों द्वारा श्रीलंका व म्यानामार में अपने हित साधने के लिए किया जा रहा है.

साम्राज्यवाद के उदय के साथ ही, अमरीका, विश्व महाशक्ति के रूप में उभरा. सोवियत संघ और अमरीका के बीच शीत युद्ध शुरू हो गया. अमरीका ने समाजवादी देशों के गुट का मुकाबला करने के लिए इस्लाम का इस्तेमाल करने की सुनियोजित रणनीति बनाई. उसने युवाओं के दिमागों में इस्लाम के कट्टरवादी संस्करण के मूल्य भरना शुरू कर दिये. इन युवकों का इस्तेमाल सोवियत रूस के खिलाफ लड़ने के लिए किया गया और यही युवक अब पूरी दुनिया के लिये एक मुसीबत बन गये हैं.

धर्म का इस्तेमाल राजनैतिक लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए करने का एक उदाहरण द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद इजराईल का निर्माण है, जिसके लिए 14 लाख फिलस्तीनियों को उनके घरों से खदेड़ दिया गया. अमरीका और ब्रिटेन ने कच्चे तेल के स्त्रोतों पर अपना कब्जा बनाये रखने के लिए ईरान की प्रजातांत्रिक ढंग से चुनी हुई सरकार को गिरा दिया. इस घटनाक्रम के नतीजे में अयातुल्ला खोमैनी सत्ता में आए. इसके बाद अमरीकी मीडिया ने इस्लाम को दुनिया के लिए नया खतरा बताना शुरू कर दिया. उसका मतलब यह था कि समाजवाद के अस्त के बाद, इस्लाम, स्वतंत्र दुनिया के लिए नए खतरे के रूप में उभर रहा है.

अफगानिस्तान में सोवियत संघ से लड़ने के लिए अमरीका ने पाकिस्तान में ऐसे मदरसों की स्थापना की जहां इस्लाम के वहाबी संस्करण के आधार पर वाशिंगटन में तैयार किये गये प्रशिक्षण कार्यक्रम को लागू किया गया. इस्लाम के इस संस्करण का इस्तेमाल सऊद परिवार करता आ रहा था, जिसके नाम पर सऊदी अरब का नाम है.

सऊद परिवार ने इस्लाम के वहाबी संस्करण का उपयोग, क्षेत्र के तेल संसाधनों पर कब्जा करने के लिए किया. सऊद वंश और अमरीका ने मिलकर पाकिस्तान में स्थित मदरसों में वहाबी संस्करण को बढ़ावा देना शुरू कर दिया. इस संस्करण के अनुसार जो भी व्यक्ति इस्लाम की वहाबी विवेचना से सहमत नहीं है, वह काफिर है और काफिरों को मारना, जिहाद है. जिहाद करते हुए मर जाने वालों को जन्नत नसीब होती है जहां 72 हूरें उनका इंतजार करती होती हैं.

वहाबी संस्करण के जहर को युवाओं के दिमाग में भरने के नतीजे में मुजाहिदीन, तालिबान, अलकायदा और अब आईसिस जैसे संगठन अस्तित्व में आए. बोको हरम जैसे संगठन भी इस्लाम की इसी तोड़ीमरोड़ी गई व्याख्या से प्रेरित हैं. कई मौकों पर मुसलमानों के बड़े धार्मिक नेताओं और जानेमाने मौलानाओं ने फतवे जारी कर साफ शब्दों में यह कहा है कि आतंकवाद, इस्लाम के मूल सिद्धांतों के विरूद्ध है. परंतु आम लोगों की नजर में अभी भी मुसलमान और इस्लाम का अर्थ तालिबान, आईसिस, अलकायदा और बोको हरम हैं.

दुनिया के सबसे बड़े धार्शनिक कार्ल मार्क्स ने बिल्कुल ठीक कहा था कि ‘‘शासक वर्ग के विचार ही समाज पर शासन करते हैं.’’ आज इस्लाम के प्रति घृणा और उसका डर सब ओर छाया हुआ है. यह विडंबना ही है कि जो धर्म शांति का संदेश देने के लिए अस्तित्व में आया था उसकी छवि एक ऐसे धर्म की बन गई है जो हिंसा और खून-खराबे में विश्वास करता है.

हमें आज पूरी मानवता के लिए सिरदर्द बन चुके वहशी आतंकवादियों के उदय को समझने के लिए राजनैतिक ताकतों, अतीत के राजाओं, साम्राज्यवादी शक्तियों और कच्चे तेल के खेल को समझना होगा. किसी भी धर्म को आतंकवाद से जोड़ना सभी धर्मों के नैतिक मूल्यों का अपमान करना है.

24.01
.2015, 19.39 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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