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पत्रकारिता में पतन का दौर

विचार

 

पत्रकारिता में पतन का दौर

रघु ठाकुर


मैनें 31 दिसंबर 2014 को, सागर में कुछ पत्रकार मित्रों से चर्चा की थी तथा मध्य प्रदेश में, किसान खाद की पूर्ति के अभाव तथा उनकी तकलीफ के बारे में कुछ बातें कहीं थी. प्रदेश के व देश के ऐक बड़ी प्रसार संख्या वाले अखबार ने, 1 जनवरी 2015 के अखबार में, मेरी चर्चा की ऐक भी पंक्ति नहीं छापी, यद्यपि अन्य कई अखबारों ने प्रमुखता से समाचार छापा था.

मीडिया


अगले दिन 1जनवरी 2015 के उक्त अखबार के सागर संस्करण के प्रथम पृष्ठ पर एक सूचना नुमा समाचार छपा था कि ’’आज नये दिन हम कोई नकारात्मक समाचार नही छापगे’’, और मेरा अनुमान है कि शायद इसी वजह से उस दिन के अखबार में मेरा ब्यान नही छापा होगा. क्योकि मेरे ब्यान में उन घटनाओं का जिक्र था जो किसानों की पीड़ा को व्यक्त करती है और राज्य शासन की लापरवाही पूर्ण उपेक्षा का खुलासा करती है.

नया वर्ष और नया वर्ष ही क्या मानव का हर दिन सुखद हो यह कौन नही चाहता? परन्तु क्या पत्रकारिता का दायित्व सुखद समाचारो के नाम पर तथ्यों को दृष्टि ओझल करना है? उस सूचना में यह भी लिखा गया था कि जो जरुरी सूचनायें है उन्हें छापा जा रहा है, और कतिपय दुर्घटनाओं के समाचार या शोक समाचार भी छापे गये थे.

मैं जानता हूं कि पत्रकारिता की जो नई भूमिका कार्पोरेट और उघोग जगत तय कर रहा है उसमें सच्चाई का स्थान बहुत कम है या अगर कटु न माना जाये तो यह भी कहा जा सकता है, कि लगभग नही है. नकारात्मकता से क्या तात्पर्य है? तथ्य-तथ्य होते है न नकारात्मक होते है न सकारात्मक. नकारात्मक या सकारात्मक तो दृष्टि होती है और वह देखने वाले की या सुनने वाले की समझ पर निर्भर करती है.

अगर समाचार पत्रों के लिये यह समाचार है कि 31 दिसंम्बर को राजधानी भोपाल में पांच करोड़ की शराब बिकी, अगर सत्ताधीशो के द्वारा दी जा रही शुभकामनायें समाचार है, अगर नाचते-गाते, हॅसते-मुस्कुराते, खाते-पीते, संपन्न वर्ग के चित्र समाचार है तो उन पीड़ित किसानों की पीड़ा जिन्हें पैसा देने के बाद भी दिन-दिन भर लाइन में खड़े होने के बाद भी मात्र दो बोरी यूरिया प्रति किसान की दर से खाद दिया जा रहा है, हजारो की भीड़ जमा होने पर पुलिस के डंडो से व्यवस्था बनाई जा रही है, कही-कही किसान लाचार होकर यूरिया के रैक लूटने को लाचार हो रहा है, पांच डिग्री के तापमान में किसान खुले आसमान के नीचे धरने पर बैठने को लाचार है.

 

यह समाचार क्यों नहीं है? या यह समाचार क्या सूचनायें नहीं है या क्या इन्हें नकारात्मक कहा जा सकता है? परन्तु यह दुर्भाग्य पूर्ण है कि मीडिया सत्ता का  भोपू और विज्ञापन दाताओं का सेवक बन गया है. उसे अमूमन वही समाचार नजर आते है उन्हीं की खबरो में सुख और प्रसन्नता नजर आती है भले ही वह चन्द लोगो की हो. पंरतु जो सत्ता या व्यवस्था का नकाव न उठायें. ऐसा भी नहीं है कि सभी पत्रकार इस ’’सत्य की नकारात्मकता’’ के सोच से ग्रस्त हो. आज भी देश और दुनिया में ऐसे पत्रकार व अखबार है जो अपने दायित्वपूर्ण आजादी के प्रति इतने समर्पित है कि वे जान भी दे रहे है.

फ्रांस में 7 जनवरी 2015 को आंतकवादियो ने 11 पत्रकारो को फ्रांस की ’’शार्ली एब्दो’’ मेगजीन के दफ्तर में गोलीवारी करके मार दिया. आंतकवादियों के शार्ली एब्दो मेगजीन के ऊपर यह हमला इसीलिये हुआ, क्योंकि 2006 में इस मैगजीन ने पैंगबर साहब का कार्टून छापा था. यह मैगजीन दुनिया में व्यंग और काटूॅन के लिये मशहूर है. भले ही हमारी या किसी की इस खबर या चित्र से असहमति हो पर यह उनकी आजादी का प्रष्न था. इस पत्रिका के अखबार नवीसो को तभी से लगातार आंतकवादियों के द्वारा धमकिया दी जा रही थी. परन्तु पत्रिका के पत्रकारो ने इन धमकियों के आगे झुकना कबूल नही किया.

2011 में भी मैगजीन के कार्यालय पर हमले का प्रयास हुआ था. इसके बावजूद भी अखबार नवीसो ने अपनी आजादी और विचार के साथ कोई समझौता कबूल नहीं किया, तथा अपने पत्रकारिता के दायित्व का निर्वहन करते हुये शहीद हो गये. उनकी शहादत को दुनिया को तस्लीम करना होगा और आज नही तो कल वे आजाद पत्रकारिता और स्वंतन्त्र लेखन की दुनिया के आधार स्तंम्भ होगे. एब्दो के पत्रकारों ने तो आंतकवाद की इस चुनौती को स्वीकार कर तथा उसे साहसिक उत्तर देने के लिये उक्त कार्टून 14-1-15 को पुनः घोषित कर छापा, तथा एब्दों की जो पहले 50 हजार प्रतियॉ छपती थी, उस दिन 50 लाख प्रतियॉ छपी जो आधा घंटे में बिक गई.

दुनिया में ऐसी और भी बहुतेरी घटनायें और उदाहरण मिल जायेगें, जहॉ पत्रकारो ने अपने कर्तव्य की पूर्ति के लिये बलिदान दिया है. ईराक और अफगानिस्तान में अनेको पत्रकार अपने कर्तव्य को अजंाम देते हुये मौत के शिकार हुये है. जिनके सिर काटकर, सोशल मीडिया पर प्रचारित किये गये है, ताकि पत्रकार व लोग भयभीत हो. पंरतु पत्रकार जगत के अनेक साहसी मित्रों ने, जान की जोखिम की परवाह नहीं की तथा अपने कर्त्तव्य का निर्वहन किया.

मैं यह इसलिये नही लिख रहा हूं कि हमारे पत्रकार मित्रों ने एक तथ्य या मेरा एक कथन नही छापा बल्कि इसलिये लिख रहा हॅू कि कभी-कभी छोटी घटनाओं में भी बड़े संदेश छिपे रहते है. ऐसे अनुभव मुझे कोई पहली बार नही हुये है बल्कि अपने लम्बे राजनैतिक जीवन में अमूमन होते रहे है. जो लोग आज कलम की कीमत या अपनी आजादी की कीमत वसूल रहे है हो सकता है उन्हें आज अपने पद और आधिकार से संतोष मिल रहा हो. वे अपने मालिको को खुश भी कर रहे हो परन्तु वे यह भूल रहे है कि वे अपने और अपनी भावी पीढ़ी के लिये स्वतःमकड़जाल बुन रहे है.

आज यह आम चर्चा का विषय है कि पत्रकारिता में पतन और गिरावट का दौर आया है और यह बहस स्वतः पत्रकार जगत के भीतर से ही ज्यादा तेजी के साथ और ऊंची आवाज में सामने आई है. जिन पत्रकारो ने अपने पेशे की ईमानदारी और पत्रकारिता जगत के सामने पैदा हो रहे, इन खतरो के विरुद्व आवाज उठायी है उन्हें आज नही तो कल समाज अवश्य सम्मान का पात्र मानेगा. हमारा विश्वास सदैव पत्रकारिता की आजादी में रहा है और हम यह मानते रहे है कि पत्रकारो की आजादी को बाहर से खतरा कम है, बल्कि अंदर से खतरा ज्यादा है.

हम लोग लगातार पत्रकारो की आर्थिक और पेशागत सुरक्षा याने नौकरी की सुरक्षा के लिये आवाज उठाते रहे है. मजीठिया बेज बोर्ड को लागू करने की मॉग करते रहे है. जहॉ कही भी पत्रकारो को छॅटनी का शिकार बनाया गया, उसके खिलाफ आवाज उठाते रहे है और यह हमारा दायित्व और जीवन धर्म का कर्तव्य है यह मानकर ही यह करते रहे है तथा भविष्य में भी बगैर किसी स्वार्थ या अपेक्षा के करते रहेगे. अगर पत्रकार हमारे विरुद्व हमले या हमारी उपेक्षा भी करेगे, तब भी हम अपने विचार के आधार पर उनकी आजादी के लिये लड़ेगे और उनके साथ खड़ें भी होगें.

मेरा तो 1 जनवरी की घटना का उल्लेख करने का उदेश्य मात्र पत्रकार जगत को सावधान करना और अपने दायित्व के प्रति सचेत करना है. यह अब किसी से छिपा नहीं है कि पत्रकारिता अब एक दुरुह व कठिन कार्य हो गया है. प्रंबधकीय या मालिकी हस्तक्षेप, तो इस नये दौर का चलन ही बन गया है.

05.02.2015, 13.20 (GMT+05:30) पर प्रकाशित