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दोराहे पर ठिठका प्रजातंत्र

विचार

 

दोराहे पर ठिठका प्रजातंत्र

राम पुनियानी


मैं अपने इस व्याख्यान की शुरूआत, अपने अभिन्न मित्र डॉ. अस़गर अली इंजीनियर को श्रद्धांजलि देकर करना चाहूंगा, जिनके साथ लगभग दो दशक तक काम करने का सौभाग्य मुझे मिला. डॉ. इंजीनियर एक बेमिसाल अध्येता-कार्यकर्ता थे. वे एक ऐसे मानवीय समाज के निर्माण के स्वप्न के प्रति पूर्णतः प्रतिबद्ध थे, जो विविधता के मूल्यों का आदर और अपने सभी नागरिकों के मानवाधिकारों की रक्षा करे. .

गणतंत्र


इस संदर्भ में वे उन चंद लोगों में से थे जिन्हें सबसे पहले यह एहसास हुआ कि सांप्रदायिकता की विघटनकारी राजनीति, देश और समाज के लिए कितनी घातक है. उन्होंने सांप्रदायिक हिंसा के कारकों के अध्ययन और विश्लेषण की परंपरा शुरू की. वे हर सांप्रदायिक दंगे का अत्यंत गंभीरता और सूक्ष्मता से अध्ययन किया करते थे. बोहरा समाज, जिससे वे थे, में सुधार लाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी. इस्लाम की शिक्षाओं की उनकी व्याख्या के लिए उन्हें दुनियाभर में जाना जाता है. अगर हम एक ऐसे समाज का निर्माण करना चाहते हैं जो शांति, सद्भाव, सहिष्णुता और करूणा पर आधारित हो, तो हम उनसे बहुत कुछ सीख सकते हैं.

राष्ट्र के रूप में हम आज कहां खड़े हैं? भारतीय प्रजातंत्र के समक्ष कौन-से खतरे हैं और क्या मोदी सरकार के आने के बाद से ये खतरे बढ़े हैं?

आमचुनाव में मोदी की जीत कई कारणों से हुई. उन्हें भारतीय उद्योग जगत का पूर्ण समर्थन मिला, लाखों की संख्या में आरएसएस के जुनूनी कार्यकर्ताओं ने उनके चुनाव अभियान को मजबूती दी, कार्पोरेट द्वारा नियंत्रित मीडिया ने उनका महिमामंडन किया और ‘‘गुजरात के विकास के मॉडल’’ को एक आदर्श के रूप में प्रचारित किया. समाज को धार्मिक आधार पर ध्रुवीकृत किया गया और अन्ना हजारे, बाबा रामदेव व अरविंद केजरीवाल के आंदोलनों के जरिये, कांग्रेस की साख मिट्टी में मिला दी गई. इस आंदोलन का अंत, आप के गठन के साथ हुआ.

मोदी का ‘अच्छे दिन‘ लाने का वायदा हवा हो गया है. कच्चे तेल की कीमतों में भारी कमी आने के बावजूद, भारत में महंगाई बढ़ती जा रही है. लोगों के लिए अपनी जरूरतें पूरी करना मुश्किल होता जा रहा है. मोदी ने वायदा किया था कि विदेशों में जमा कालाधन, छः माह के भीतर वापस लाया जायेगा और हम सब अपने बैंक खातों में 15-15 लाख रूपये जमा देखकर चकित हो जायेंगे. यह वायदा भुला दिया गया है. जहां तक सुशासन का सवाल है, मोदी की दृष्टि में शायद उसका अर्थ अपने हाथों में सत्ता केंद्रित करना है. केबिनेट प्रणाली की जगह, देश पर एक व्यक्ति का एकाधिकारी शासन कायम हो गया है. भारत सरकार के सचिवों को निर्देश दिया गया है कि वे सीधे प्रधानमंत्री के संपर्क में रहें. मंत्रियों की तो मानो कोई अहमियत ही नहीं रह गई है.

स्वयंसेवी संस्थाओं के लिए आर्थिक संसाधन जुटाना कठिन होता जा रहा है. ‘ग्रीन पीस’ सरकार की इस नीति का प्रमुख शिकार बनी है. पिछली सरकार द्वारा शुरू की गई कल्याण योजनाओं को एक-एक कर बंद किया जा रहा है. वे कुबेरपति, जिन्होंने मोदी के चुनाव अभियान को प्रायोजित किया था, अपने खजाने भरने में जुटे हुए हैं. पर्यावरणीय, सामाजिक और आर्थिक मुद्दों को परे रखकर, उन्हें देश का अंधाधुंध औद्योगिकरण करने की खुली छूट दे दी गई है. नये प्रधानमंत्री को न भूतो न भविष्यति नेता के रूप में प्रचारित किया जा रहा है और उनके चारों ओर एक आभामंडल का निर्माण करने की कोशिश हो रही है.

इन सब नीतियों और कार्यक्रमों से सबसे अधिक नुकसान समाज के कमजोर वर्गों को उठाना पड़ रहा है. ‘श्रम कानूनों में सुधार’ के नाम पर श्रमिकों को जो भी थोड़ी-बहुत सुरक्षा प्राप्त थी, उससे भी उन्हें वंचित करने की तैयारी हो रही है. उद्योगपतियों के लिए भूमि अधिग्रहण करना आसान बना दिया गया है. किसानों से येन-केन-प्रकारेण उनकी जमीनें छीनी जा रही हैं. गरीबों के लिए चल रही समाज कल्याण योजनाओं व भोजन और स्वास्थ्य के अधिकार को खत्म करने की तैयारी है.

धार्मिक अल्पसंख्यकों को आतंकित करने का सिलसिला जारी है. एक केंद्रीय मंत्री साध्वी निरंजन ज्योति की हिम्मत इतनी बढ़ गई कि उन्होंने सभी गैर-हिंदुओं को हरामजादे बता दिया. एक अन्य भगवाधारी भाजपा नेता, नाथूराम गोडसे को ‘देशभक्त’ बता रहे हैं और हिंदू महिलाओं से ज्यादा से ज्यादा बच्चे पैदा करने की अपील कर रहे हैं. हिंदुत्ववादी, महात्मा गांधी के हत्यारे गोडसे का महिमामंडन कर रहे हैं. वे हमेशा से गोडसे के प्रशंसक थे परंतु नई सरकार आने के बाद से उनकी हिम्मत बढ़ गई है. क्रिसमस पर ‘सुशासन दिवस’ मनाने की घोषणा कर इस त्योहार के महत्व को कम करने की कोशिश की गई. ऐसी मांग की जा रही है कि हिंदू धर्मग्रंथ गीता को देश की राष्ट्रीय पुस्तक घोषित किया जाये. चर्चों और मस्जिदों पर हमले हो रहे हैं. अनेक नेता बिना किसी संकोच या डर के चिल्ला-चिल्लाकर कह रहे हैं कि हम सब हिंदू हैं और भारत, एक हिंदू राष्ट्र है.
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