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नीति आयोग में कुछ अलग नहीं

मुद्दा

 

नीति आयोग में कुछ अलग नहीं

रघु ठाकुर


केन्द्र सरकार ने योजना आयोग के स्थान पर नीति आयोग का गठन किया है. योजना आयोग संविधानिक संस्था नही थी केवल राजकीय आदेश की संतुति थी तथा उसका स्वरुप भी धीरे-धीरे योजना आयोग से बदल कर निंयत्रण आयोग जैसा हो गया था. इसीलिये मैने योजना आयोग की समाप्ति को उचित माना था, परन्तु साथ में यह भी सुझाव दिया था कि योजना आयोग के स्थान पर जो संस्था बने वह संविधानिक संस्था बनाई जाये. याने भारतीय संविधान में उसे स्थापित किया जाये. ताकि वह निष्पक्षता पूर्वक अपना कार्य कर सके.

नीति आयोग


परन्तु जिस प्रकार से वर्तमान केन्द्र की मोदी सरकार ने योजना आयोग के स्थान पर नीति आयोग का गठन किया है, और उसका जो प्रारुप सामने आया है उससे कोई बड़ी उम्मीदें नहीं बनती. बल्कि नई बोतल में पुरानी शराब जैसी स्थिति लगती है. कागजों, फाइलों और दस्तावेजों में या नाम पदों पर आयोग को नीति आयोग याने प्लांनिग कमीशन की जगह पालिसी कमीशन लिख देने मात्र से कोई बदलाव नहीं होता है.

नीति आयोग के गठन से केवल एक ही बात झलकती है कि श्री मोदी कुछ नया नहीं करना चाहते, केवल नया करते दिखना चाहते है. जैसे भारत के प्रथम प्रधानमंत्री श्री नेहरु ने मुख्य मंत्रियो को समय समय पर मार्ग दर्षक पत्र लिखना शुरु किया था और इन पत्रों के माध्यम से जहॉ वे एक तरफ संघीय ढ़ाचे का सम्मान करते थे याने राज्य में दखल के बजाय उन्हें सलाह रुपी मार्गदर्षन करने का प्रयास करते थे, वही दूसरी तरफ अपने विचारों या कल्पनाओं को पहुंचाते थे.

श्री मोदी ने आकाशवाणी के माध्यम से मन की बात कार्यक्रम शुरु किया है और इसके माध्यम से आम लोगों को अपने ख्यालात से अवगत् कराना शुरु किया है निसंदेह जनता से संवाद का यह एक बेहतर माध्यम है, परन्तु इस प्रयोग में उन्होंने निष्पक्षता नहीं बरती तथा केन्द्र सरकार के दायित्वों को दृष्टि ओझल कर केवल चिंता प्रगट करने तक सीमित रहे हैं. जैसे पिछले मन की बात की शुरुआत करते हुऐे उन्होंने सतना के एक भाई के पत्र का उल्लेख किया जिसमें रेलगाड़ियों में स्वतः यात्रियों ने सफाई को अपनी आदत का हिस्सा बना लिया है, उसको सदर्भित करते हुऐ शुरु किया.

मैं महीने में औसतन 20-25 दिन यात्रा पर रहता हॅू और रेलगाड़ियों की प्लेटफार्म की, स्टेशनों की, गंदगी को देखता भी हॅू, सहता भी हॅू, लिखता भी हॅू, यथा संम्भव सफाई रखने का प्रयास भी करता हूं. स्वतः भारत की राजधानी दिल्ली और अन्य स्थानों पर सफाई के नाम पर कुछ नाटकीय घटनायें हुई. मैं समझता हॅू कि प्रधान मंत्री ने सफाई का अभियान शुरु कर एक अच्छा काम किया है, और कम से कम देश में एक चर्चा और जागृति लाने का प्रयास किया है. परन्तु उन्होंने इसे केवल जन पहल बनाने का प्रयास किया है सरकारी या प्रशासनिक दायित्व के प्रति कोई चितां प्रगट नहीं की न चेतावनी दी.

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में एक निजी कम्पनी किवार को सफाई का टेका दिया गया था. यह कम्पनी कर्नाटक की थी और यह कहा जाता है कि इस कम्पनी के मालिक के रिष्ते भाजपा नेताओं के साथ बहुत मधुर है इसलिये सफाई जैसे काम के लिये कर्नाटक से कम्पनी बुलाई गई वर्ना छत्तीसगढ़ में इतनी गरीबी और बेरोजगारी है कि वह काम की तलाश में बाहर जाने वालों का पलायन प्रदेश बन गया है.

इस कम्पनी के कार्य अविधि के दौरान रायपुर शहर गंदगी के ढेर में बदल गया और कुछ दिनों पूर्व यह कम्पनी भी सरकार से पैसा लेकर भाग गई. प्रधानंमत्री ने अपने मन की बातों में युवको में बढ़ते हुये नशे की प्रवृत्ति पर चिंता प्रगट की, परन्तु उन्होंने अपनी सरकार की और से इसको रोकने के लिये कोई कदम नहीं उठाया और उनकी पार्टी भाजपा ने जिस प्रकार पंजाब में नशे को लेकर उनकी सहयोगी पार्टी अकाली दल को घेरना शुरु किया, उससे यही संकेत मिला कि प्रधानमंत्री पंजाब के अगले चुनाव के पूर्व पंजाब में नशा वृद्वि को चुनाव का ऐजेन्डा बनायेगें और अपने राजनैतिक दल भाजपा की ताकत बढ़ाने के लिये अकाली दल से गठबंधन तोड़ कर प्रथक चुनाव लड़ने का प्रयास करेगे. जिस प्रकार महाराष्ट्र में हुआ है, भले ही बाद में शिवसेना के साथ गठबंधन किया हो.

भाजपा की नीयत और प्रधानमंत्री की नीयत देश में एक छत्र राज्य स्थापित करने की है तथा सभी क्षेत्रीय या विरोधी दलों को क्रमषः समाप्त करने की नजर आती है. वे मन की बात और मुद्दों का प्रयोग किसी सुधार के लिये नहीं बल्कि केवल दलीय ताकत बढाने के लिये कर रहें हैं. अगर मुद्दों के प्र्रति जिम्मेदारी होती तो उन्हें अकाली दल गठबंधन सरकार से अलग हो जाना चाहिये और दूसरे भाजपा शासित राज्यों को पूर्णतः शराबबंदी लागू करने को कहना चाहिये, तीसरे केन्द्र सरकार की ओर से नशा मुक्ति के लिये आवश्यक राष्ट्रीय और अंतर राष्ट्रीय पहल सम्ंबधित कदम उठाना थे.

नीति आयोग निम्न आधार पर दिशाहीन लगता हैः-
1. नीति आयोग को भी केवल कानूनी रुप दिया गया है संवैधानिक सस्थां नहीं बनाया गया. और इसीलिये उसकी निष्पक्षता संदिग्ध रहेगी तथा वह सरकारी चंगुल से शायद ही मुक्त हो सके.
2. नीति निर्माण का काम निर्वाचित सरकारों का होता है. आयोग कुछ कल्पनाओं के प्रारुप प्रस्तुत कर सकता है. अतः उचित होता की सरकार इसका नाम ’’भावी भारत’’ रखती ताकि देश के समक्ष एक बेहतर और खुबसूरत भारत की कल्पना प्रस्तुत होती.
3. नीति आयोग में कुछ मुख्य मंत्रियों को सदस्य बनाया गया है. यह इस अर्थ में अच्छा कदम है कि राज्यों के निर्वाचित मुखिया पूर्व के योजना आयोग के समय के समान भिखारी नहीं रहेंगें. कुछ हिस्सेदार बनेगे. यह भूमिका भारतीय संविधान के संघीय ढ़ाचे के अनुकूल ठीक है परन्तु जिस प्रकार निर्वाचित सरकारे चाहे वे केन्द्र की हो या राज्यों की क्षेत्रीय भेदभाव कर रही है उससे मुक्ति मिलनी नीति आयोग से सम्भव नहीं लगता.

प्रधानमंत्री का मानस भी अपने सूबे गुजरात से ऊपर उठकर या अपने ससंदीय क्षेत्र बनारस और उसके ससंदीय गणित से ऊपर नजर नहीं आता. पिछले लगभग आठ माह में उन्होंने अपने कार्यो से यही संकेत दिया हैं कि उनके लिये पहले गुजरात, फिर बनारस और आखिरी में भारत. चीनी राष्ट्र प्रमुख के दौरे की शुरुआत भारत की राजधानी के बजाय गुजरात की राजधानी अहमदाबाद से शुरु हुई. अभी 11.12 जनवरी को वायब्रेन्ट गुजरात के नाम से जो पूंजी निवेशकों का वैष्विक आयोजन हुआ वह पूर्णतः गुजरात केन्द्रीत था जिसमें भारत सरकार केन्द्र के प्रभारी मंत्रियो और उनकी पार्टी के मुख्यमंत्रियों को हिस्सेदारी करना, राजनैतिक मजबूरी थी. बनारस को लेकर भी वे लगातार घोषणायें करते रहते है.

4. हमारी अपेक्षा यह थी कि भारत सरकार इस नई सस्थां के गठन के साथ-साथ केन्द्रीय बजट के बंटवारे की नीति भी तय करे और उन्हें भी संविधान का हिस्सा बनाकर बाध्य कारी बनाये. अगर इसके साथ ही सरकार ने यह तय किया होता कि देश के बजट का आवॅटन आबादी के आधार पर किया जायेगा तथा केवल पिछड़े और आदिवासी अंचलों को ही विशेष अनुदान दिया जायेगा तो राजनीति ज्यादा विश्वनीय बनती और न्यायपरक भी.

5. भारत सरकार ने योजना आयोग का उपाध्यक्ष श्री पनगढ़िया को मनोनीति किया है. श्री पनगढ़िया विश्व बैंक और अंतर राष्ट्रीय मुद्रा कोष में काम कर चुके है तथा अब ऐशियन डवलमेन्ट बैंक जो विश्व बैंक जैसा है में कार्य कर रहे थे. यह सभी संस्थायें वैश्वीकरण की समर्थक संस्थायें है जो दुनिया के ताकतवर देशों के लिये रास्ता तैयार करते है.

श्री पनगढ़िया की योग्यता लगभग वहीं है जो श्री मनमोहन सिंह, श्री मोटेंक सिंह अहलूवालिया की थी. योजना आयोग का अध्यक्ष प्रधानमंत्री होते है परन्तु व्यवहार में उपाध्यक्ष उनके संकेतो और इशारों को समझ कर कार्य करते है. प्रधांनमत्री कार्पोरेट जगत के प्रथम पंसद भी है और मजबूत समर्थक भी है तथा इस नियुक्ति से यही आशंका बलवती हुई है कि यह नीति आयोग कहीं कार्पोरेट सर्पोट आयोग न बन जाये.

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ पिछले दो दंशको से स्वदेशी की चर्चा करता रहा है. उन्होंने स्वदेशी जागरण मंच जैसे अनुषांगिक संगठन खड़े किये और उसके माध्यम से स्वदेश का नारा लगाते रहे, परन्तु यह चिंता जनक अंर्तविरोध है कि उनके राजनैतिक अंग या उनके द्वारा बनाई गई उनकी अनुयायी सरकारें स्वदेशी को पीछे करती रही है और विदेशों का समर्थन करती रही है. जब श्री बाजपेयी प्रधानमंत्री बने तब उनकी सरकार ने 2500 प्रतिबंधित समानों को जो आयात के लिये प्रतिबंधित थे प्रतिंबध क्षेत्र से हटाकर आयात के लिये मुक्त कर दिया था बीमा के क्षेत्र में विदेशी पूंजीनिवेश की अनुमति दी थी. दिल्ली की स्वदेशी जागरण मंच के कार्यक्रम

में उन्होंने वैश्वीकरण का सम्मान किया था. तथा दिल्ली के प्रगति मैदान पर विदेशी कंपनियों के स्टाल लगे थे. एक व्यक्ति के तौर पर श्री दंत्तो पंत ठेगडी जी ने अवश्य इसकी खिलाफत की परन्तु स्वेदेशी जागरण मंच ने या संघ ने इसके विरुद्ध कोई अभियान नहीं चलाया. श्री मन मोहन सिंह सरकार के जमाने में जब फुटकर व्यापार में विदेशी पूंजीनिवेश का निर्णय हुआ, तब फिर संघ निर्मित संस्थाओं ने इसका विरोध किया परन्तु अब जब मोदी के कार्यकाल में विदेशी फुटकर व्यापार वाली कम्पनियों फिलिप कार्ड आदि ने आनलाइन व्यापार शुरु कर दिया तब संघ चुप क्यों है.

यह चुप्पी संघ की विश्वनीयता के ऊपर प्रभाव डालेगी. आज आम लोगों के जहन में यह प्रश्न है कि श्री पनगढ़िया को मनोनीत करने की अनुमति संघ ने कैसे प्रदान कर दी जब कि यह सुविदित तथ्य है कि भाजपा सरकारों में सारी नियुक्ति संघ के अनुमादेन से होती है. यहॉ तक की मंत्रियों के सचिव और निजी सहायको की भी. लोगो के मन में यह प्रश्न पैदा हो रहा है कि कही केवल भाजपा को राजनैतिक ताकत बनाने के लिये संघ उसी प्रकार स्वदेशी आभियान का हिस्सेदार तो नहीं बन रहा, जिस प्रकार राम मंदिर के आंदोलन में संघ ने हिस्सेदारी की भाजपा को ताकत मिली परन्तु राममंदिर टूट गया.

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