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एक निराशाजनक रेल बजट

विचार

 

एक निराशाजनक रेल बजट

रघु ठाकुर


संबहुप्रतीक्षित रेल बजट, रेल मंत्री श्री सुरेश प्रभु ने संसद में, 26 फरवरी 2015 को पेश कर दिया है. व्यक्तिशः श्री सुरेश प्रभु एक नेक इंसान है, तो अभी तक किसी आर्थिक या अन्य प्रकार के आरोपो से मुक्त रहे है. वे श्री अटल बिहारी वाजपेयी के भी, प्रिय थे, तथा भा.ज.पा. शिवसेना में मतभेद का एक कारण श्री सुरेश प्रभु भी है.

indian rail


चूंकि श्री सुरेश प्रभु लोकसभा में भी नही पहुंच सके थे, तथा, उन्हें मंत्री बनाकर श्री नरेन्द्र मोदी राज्यसभा में लाऐ थे, अतः यह स्वाभाविक ही है कि वे श्री नरेन्द्र मोदी के, प्रभाव व दबाब में कुछ ज्यादा ही रहे तथा, इस रेल बजट में ऐसा प्रतीत होता है कि यह श्री नरेन्द्र मोदी की प्रति छाया है. तथा रेल्वे के निजीकरण को लेकर जो कल्पनायें मोदी जी करते रहे है, उन्हें, क्रियान्वित करने के लिये, शाब्दिक प्रयास इस बजट में किया गया है, हांलाकि कई रुप में उसे फिलहाल लंबित किया गया है.


यह शायद इसलिये भी जरुरी था, कि दिल्ली विधानसभा चुनाव परिणाम तथा भूमि अधिग्रहण अध्यादेश के व्यापक राजनैतिक विरोध के बाद, श्री मोदी जी का अति आत्मविश्वास फिर डिग गया है तथा गुजरात और देश का फर्क उन्हें कुछ-कुछ समझ आया है इसलिये, वे अपने, संसदीय प्रंबधन को दुरुस्त करने के लिये समय चाहते है. इस हेतु उनके कई प्रयास है:-

1. श्री शरद पवार के कार्यक्रम में जाकर पवार को साथ लेने तथा, शिवसेना को डराने का प्रयास.
2. श्री मुलायम सिंह के पोते व लालू यादव की बेटी के लगुन फलदान कार्यक्रम में सैफई (इटावा) जाना तथा उसके कुछ ही दिनों के बाद, दिल्ली में, विवाह समारोह में शामिल होना.
3. रेल बजट के अप्रिय निर्णयों को, विलंबित रखना ताकि तत्काल विरोध न हो.
4. राज्यों को केन्द्रीय करों में, हिस्सेदारी की प्रतिशत को बढ़ाकर 42% करना ताकि राज्य, इस बढ़े हुए आंवटन की चुसकी चूसते रहे.
5. श्री शरद पवार, सुश्री मायावती, श्री मुलायम सिंह, श्री लालू तो वैसे भी केन्द्र सरकार से, खौफ जदा रहते है क्योंकि, श्री शरद पॅवार के भतीजे श्री अजीत पॅवार, मुलायम-मायावती - लालू, सी.बी.आई व अदालतों के शिकजे में है तथा केन्द्र सरकार कभी-भी इन्हें, कृष्ण जन्मस्थली के दर्शन करा सकती है.

दरअसल 2015 के इस रेल बजट को बजट कहना ही गलत होगा, यह तो रेल मंत्री की प्रेस विज्ञप्ति जैसी है जिसमें, प्रशासनिक निर्णयों या आदेषों को बजट बता दिया गया है. बजट तो, आय-व्यय के लेखा-जोखा के साथ, नीतिगत् निर्णयों की घोषणा भी होता है. परंतु इस रेल बजट में, नीतिगत घोषणाओं को टाल दिया गया है.
यह बजट रेल्वे नौकरशाहों को, बहुत ही संतोषप्रद बजट है क्योंकि, रेल लाइनों के निर्माण, रेलों के परिचालन में, उन्हें कुछ तार्किक व कुछ आराम में खलल डालने वाला परिश्रम करना होता है इसीलिये, श्री सुरेश प्रभु को समझा कर उन्होंने, कुछ बजट का तानावाना, मित्तल कमेटी व सिन्हा कमेटी के आस-पास बुन दिया है. बजट के निम्न बिन्दुओं में किसी की भी असहमति नही होगी:-

1. पुरानी घोषित योजनाओं एंव रेलों के परिचालन को पहले पूर्ण किया जाये. क्योंकि अक्सर रेल मंत्री इतनी घोषणायें कर जाते हैं, जिन्हें वे स्वतः अपने कार्य-काल में पूरा नहीं कर पाते. तथा बाद वाले मंत्रियों को उन्हें पूरा करना होता है. परिणाम स्वरुप, वे अपनी जरुरतों के अनुसार घोषणाये नही कर पाते .
2. रेल के भाड़े में वृद्वि नहीं की, यह इसलिये भी उचित है कि, मई 2014 में, सरकार बनने के बाद ही इसी भा.ज.पा. सरकार के रेलमंत्री श्री सदानंद गोड़ा ने एकमुष्त 14% भाड़ा बढ़ाया था. तथा इस वृद्धि को अभी 1 वर्ष भी नही हुआ.
3. रेल यात्रियों की सुविधाओं का विकास तथा सुरक्षा.
4. रेल मंत्री को भारत सरकार के द्वारा यह सहमति दी गई की, रेल की जरुरतो की पूर्ति के लिये, पच्चीस हजार करोड़ रुपया सरकार देगी.
5. रेल के आधार भूत संरचना के विकास पर 2030 तक 8.5 लाख करोड़ का खर्च,

परंतु जब इन घोषणाओं का बारीकी से विष्लेषण करेगें तेा निम्न बिन्दु इस रेल बजट में, अनुतरित है:-

1. 8.5 लाख करोड़ का पूंजी निवेश किसके द्वारा होगा व किन शर्तो पर होगा, उसका वार्षिक ब्याज कितना होगा.
2. विज्ञापन की आय के लिये रेल गाड़ियॉ या स्टेशनों के नाम कंम्पनियों के नाम पर करने को कोई उचित ठहरायेगा. यह तो देश को, वैष्वीकरण में रुपांतरित करने वाला कदम होगा. अब अगर रेलगाड़ियॉ पेप्सी रेल, कोका स्टेशन होगे तो क्या यह देश के लिये शर्मनाक नहीं होगा. कल कोई कंपनी वाला कहेगा कि भारत देश का नाम, उसकी कंपनी के नाम पर कर दो, वह 100-150 करोड़ बदले में दे देगा तो क्या यह उचित होगा? क्या इससे देश के लिये कोई आर्दश स्थापित होगा?
इसके बजाय उचित यह होता कि सरकार रेलगाड़ियों व स्टेशनों के नाम, देश के आदर्श पुरुषों के नाम पर करती. फुले स्टेशन, महू को अंबेडकर के नाम पर, सीमांत गांधी, जय प्रकाश एक्सप्रेस, लोहिया एक्सप्रेस या दीनदयाल स्टेशन आदि तो इससे देश का ज्यादा भला होता. वैसे भी इन विज्ञापनो से कितनी मामूली राशि मिलना है.

3. रेल की आय बढ़ाने के लिये अच्छा होता कि रेल मंत्री निम्न कदम भी उठातेः-

(अ.) रेल्वे में फिजूलखर्ची व फिजूल निर्माणों पर रोक. आज रेलवे में फिजूल खर्ची चरम पर है. रेल्वे के बड़े नौकरशाह राजाओं जैसे घरनुमा सेलू्नों में यात्रा करते है. उनके औपचारिक दौरों पर समूचा रेल तंत्र कार्य छोड़ कर उनके आगे-पीछे घूमता है.
(ब.) पूर्व सांसदों तथा सभी कम्पलीमेन्टरी पासों पर रोक.
(स.) अनुपयोगी निर्माणों तथा सौदर्यीकरण के कामों पर रोक, अच्छा होता अगर रेल मंत्री यह निर्णय करते कि, जो भी निर्माण ऐसे (पुल व रेल्वे टेªक को छोड़कर) होगे उन्हें आगामी 10-15 वर्षो तक नवीनीकृत या परिवर्तित नही किया जायेगा और वे इसका अध्ययन करे तो पायेगे कि प्रति वर्ष सैकड़ों करेाड़ रुपये, रेलवे के उच्चाधिकारी निरर्थक निर्माण कार्यो पर खर्च करते है. क्योंकि ये, वेतन से इतर आय या भ्रष्ट्राचार के लिये मुफीद कदम होते है.
(द.) रेलवे की खरीद व स्क्रेप ब्रिकी को नियंत्रित करके भी सैकड़ों करोड़ रुपया आसानी से बचाया जा सकते थे.
(ई.) रेल्वे के काम जो की रक्षा के लिये, उत्तदायित्व निर्धारित करने तथा, सामान की चोरी के लिये या टूट-फूट के लिये, उन जिम्मेवारों पर दायित्व बोझ डालते, इससे भी भारी राशि की बचत हो सकती थी या वसूल हो सकती थी.
(फ.) रेलमंत्री पूर्व के निर्धारित लक्ष्य, 1100 किलोमीटर रेललाईन के निर्माण को पुनः प्रस्तुत कर क्रियान्वियन करने का प्रयास करते., अभी तो भारतीय रेल्वे औसतन 100 किलोमीटर रेल लाईन ही प्रति वर्ष डालती है तथा कई बार वह भी नहीं. अगर रेल मंत्री जी ने, चीन की रेल का अध्ययन किया होता तो उन्हे मालूम होता कि 1949 में, चीन में मात्र 600 किलोमीटर रेल लाईन थी जो अब बढ़कर 110000 किलोमीटर हो चुकी है याने औसत 2000 किलोमीटर प्रतिवर्ष. और भारत ने 1947 से अभी तक के 67 वर्षो में बमुश्किल 10 हजार किलोमीटर रेल लाईन ही डाली, याने 100-125 किलोमीटर प्रति वर्ष. चीनी रेल लाइनों में कोई विदेषी पूंजी निवेश नहीं है. अच्छा होता कि, रेलमंत्री श्री श्रीधरन से पूछते कि, इतने कम समय में उन्होंने दिल्ली जैसे महानगर में इतनी लंबी मेट्रो रेल देने का चमत्कार कैसे कर दिया.

रेल मंत्री की प्रशंसा करने वालों में, मुख्यतः रेल्वे के सेवानिवृत्त नौकरशाह या पूंजीपति ही है, जिसकी कल्पना व संभावनाओं का यह रेल बजट है. नौकरशाहों को जनता की सुविधायें पसंद भी नहीं है. अधिकांश नौकरशाह तो रेल्वे को केवल महानगरों तथा बड़े लोगो को ही चलाना चाहते है. प्रीमियम ट्रेन, बुलेट ट्रेन आदि इसी के उदाहरण है. उन्हें तो देश का आम गरीब आदमी शत्रु व बोझ जैसा नजर आता है.

हमने रेल मंत्री को सुझाव दिया था कि वे प्रधानमंत्री स्तर पर पहल कर मनरेगा की राशि नई रेल लाइनों के निर्माण पर खर्च करने का प्रावधान बनवायें. अभी यह पता नहीं कि भारत सरकार ने उन्हें जो 25000 करोड़ देने का वायदा किया है, वह मनरेगा का पैसा है या अन्य किसी स्रोत का पर यह पता करना जरुरी भी नहीं है.

इस रेल बजट में, यात्री सुविधाओं के विकास की बहुत चर्चा है पर निर्णय नगण्य है. किराया देने वाले को एक सीट की व्यवस्था, 45000 रेल्वे कोच की व्यवस्था, पर बजट मौन है. वाई-फाई जैसी सुविधाये तो केवल सम्पन्न तबको के लिये है, न कि गरीब को. कभी रेल मंत्री जी यात्रियों के आर्थिक, षैक्षणिक वर्ग का अध्ययन करायें कि कितने प्रतिशत यात्री लेपटाप, कम्प्यूटर आदि को लेकर चलने वाले होते है, जो इस सुविधा का इस्तेमाल कर सकेगे.

शताब्दी-राजधानी जैसी गाड़ियों में मनोरंजन की व्यवस्था, के नाम पर टी.वी. दिखाना, उस पर फिल्में दिखाना, इससे यात्रियों को असुविधा ज्यादा होगी. जो लोग यात्रा में, आराम करना चाहते है या अध्ययन आदि करना चाहते है वे इस टी.वी. की भड़भड़ में अपना काम नहीं कर सकेगें. युवा पीढ़ी को असभ्य बनाने का ऐक नया प्रयोग इस माध्यम से शुरु होगा. वैसे भी सभ्य यात्री कई बार अपने सह-यात्रियों के, मोबाईल, लेपटाप व फिल्मों की या गानों की आवाज से, देररात्रि तक सो नहीं पाते. अब इसमें एक कदम और जुड़ जायेगा.

बजट में रेल कर्मचारियों के लिये, लगभग कुछ भी नहीं है. लाखों वर्ग 3 व 4 के कर्मचारियों के क्वाटर्स, टूटे व गंदे है. जिनकी वर्षो से मरम्मत नहीं हुई. बरसात ठंड-गर्मी उन्हें पीड़ा दायक है. मालगाड़ियों वगैर गार्ड के चल रही है. रेल कर्मचारियों के विश्रामग्रहों की हालत दयनीय है, जहॉ सीलन, मच्छर, उमस का संगम होता है.
इन प्रश्नों पर रेल बजट चुप है. क्या रेल के विकास में इनका कोई अर्थ नहीं होता है? रेल्वे के तंत्र का याने कार्य-व्यापार का विकास हो रहा है. परंतु कर्मचारी कम हो रहे है. उनके ऊपर जो मानसिक दबाब होता है वह अवर्णनीय है. परंतु रेल कर्मचारियों की संख्या बढ़ाने के बारे में रेल बजट चुप है. नई रेलों की घोषणा व नये रेल लाइनों की सर्वे क्षणों की घोषणा नहीं की गई है. यह ठीक है कि पुराने कार्य अभी अपूर्ण है. परंतु नई रेलों और रेल लाइनों की घोषणा निम्न कारणों से जरुरी थीः-

1. आबादी की बृद्वि के अनुपात में रेलो की मांग में वृद्वि अपेक्षित है.
2. पिछले वर्षो में देश का बड़ा हिस्सा जो रेल मंत्रियो के पक्षपात और क्षेत्रवाद का शिकार हुआ है उसे न्याय देना जरुरी है. बुन्देलखण्ड सहित देश के अनेक ऐसे अंचल है, जो आजादी के 68 वर्षो बाद भी रेल लाइन और रेल सुविधाओं से वंचित है. पिछले अन्याय की भरपाई के लिये कुछ उपाय करना क्या सरकार का दायित्व नहीं था. मैं रेल मंत्री की इस बात के लिये प्रशंसा करूंगा, कि उन्होंने क्षेत्रीयता के संक्रीण मानस से काम नहीं किया है वर्ना पहले के रेल मंत्री तो केवल अपने जिलो और राजनैतिक कर्म क्षेत्रो में सिकुड़े रहे है. परन्तु इस सरकार से उम्मीद है, कि वह पुराने अन्याय की भरपाई करेगी परन्तु उसने नये अन्याय के ही कुछ भाव दे दिये है.
3. रेलमंत्री ने गति के बढ़ाने पर जोर दिया है और कुछ रेल खण्डों में 200 किमी.प्रति घन्टा की रफ्तार से गाड़ी चलाने की घोषणायें की है. 200 किलोमीटर की रफ्तार वाली गाड़ियों का प्रयोग वही करेगें जिन्हें 1000 किलोमीटर से आधिक की यात्रा करनी होगी. परन्तु जिन 3 करोड़ यात्रियों को अपनी दिने-दिन की रोजी-रोटी और जीवन के कामों के लिये यात्रा करना है वे अल्प दूरी वाले यात्री क्या करेगे. याने देश के यात्रियों के 90 प्रतिशत को स्थिर बनाकर मात्र 10 प्रतिशत यात्रियों को गति प्राप्त होगी?

कुल मिलाकर यह रेल बजट रेल मंत्री की प्रेस विज्ञप्ति है जिसमें यह कहा गया है. कि देश की जनता 15 वर्ष इंतजार करे, उसके बाद उसके लिये रेल की चर्चा होगी.

दरअसल रेल बजट बजट नहीं , बल्कि योजना आयोग का प्रस्ताव प्रपत्र है, जिसे, रेल मंत्री की जबान में पढ़ दिया गया है.

3.11.2014, 19.59 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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