पहला पन्ना प्रतिक्रिया   Font Download   हमसे जुड़ें RSS Contact
larger
smaller
reset

इस अंक में

 

क्यों बढ़ रहा भूख का आंकड़ा

हमारे कुलभूषण को छोड़ दो

भारत व अमेरिका में केमिकल लोचा

सवाल विकास की समझ का

प्रतिरोध के वक्ती सवालों से अलग

गरीबी उन्मूलन के नाम पर मज़ाक

जनमत की बात करिये सरकार

नेपाल पर भारत की चुप्पी

लोहिया काल यानी संसद का स्वर्णिम काल

स्मार्ट विलेज कब स्मार्ट बनेंगे

पाकिस्तान आंदोलन पर नई रोशनी

नर्मदा आंदोलन का मतलब

क्यों बढ़ रहा भूख का आंकड़ा

हमारे कुलभूषण को छोड़ दो

भारत व अमेरिका में केमिकल लोचा

युद्ध के विरुद्ध

किसके साथ किसका विकास

क्या बदल रहा है हिन्दू धर्म का चेहरा?

मोदी, अमेरिका और खेती के सवाल

 
  पहला पन्ना >इरफान इंजीनियर Print | Share This  

उद्देशिका, धर्मनिरपेक्षता और संविधान

मुद्दा

 

उद्देशिका, धर्मनिरपेक्षता और संविधान

इरफान इंजीनियर
 

केंद्र सरकार द्वारा गणतंत्र दिवस पर जारी एक विज्ञापन पर विवाद खड़ा हो गया था. इस विज्ञापन में संविधान की उद्देष्यिका की जो छायाप्रति छापी गई थी, उसमें से ‘समाजवाद’ व ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द गायब थे. इस संबंध में भाजपा नेताओं का स्पष्टीकरण यह था कि वह, मूल संविधान की उद्देष्यिका की फोटो प्रति थी, जिसमें ये दोनों शब्द नहीं थे.

वेयह सही है कि ‘समाजवाद’ व ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द उद्देष्यिका में 42वें संषोधन के जरिये सन् 1976 में जोड़े गये थे. यह एक रहस्य बना रहेगा कि मूल संविधान की उद्देष्यिका का विज्ञापन में प्रकाशन सकारण था (क्योंकि वह वर्तमान शासक दल की विचारधारा से मेल खाती है) या फिर ऐसा केवल भूल से हुआ. संभावना यही है कि यह गलती नहीं थी क्योंकि शासक दल, समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों में विष्वास नहीं करता और उसने इन संवैधानिक मूल्यों की कई अलग-अलग मौकों पर निंदा की है और मजाक बनाया है. जब प्रधानमंत्री मोदी ने जापान के सम्राट को गीता की प्रति भेंट की थी तब उन्होंने धर्मनिरपेक्षतावादियों का मखौल बनाते हुए कहा था कि वे इस मुद्दे पर तूफान खड़ा कर देंगे और टीवी पर बहसों का तांता लग जायेगा.

गुजरात, मध्यप्रदेश, राजस्थान और हरियाणा की भाजपा सरकारें, स्कूलों के पाठ्यक्रमों में हिंदू धार्मिक पुस्तकों के अंश शामिल कर रही हैं और सरस्वती वंदना व सूर्य नमस्कार जैसे हिंदू धार्मिक अनुष्ठानों को अनिवार्य बना रही हैं. यह संविधान के अनुच्छेद 28 व 29 का उल्लंघन है. हिंदू राष्ट्रवादी संगठन, ऊंची जातियों की परंपराओं को देश पर लादने की कोषिश कर रहे हैं और भाजपा सरकारें इस प्रयास को अनदेखा कर रही हैं. ये संगठन उन सभी कलात्मक अभिव्यक्तियों, फिल्मों, विचारों व सोच पर हिंसक हमले कर रहे हैं, जिनसे वे सहमत नहीं हैं.

वे अल्पसंख्यकों को जबरदस्ती हिंदू बनाने का प्रयास कर रहे हैं और हिंदुओं द्वारा अन्य धर्मों को अंगीकार करने के प्रयासों को बल प्रयोग से रोक रहे हैं. वे वैलेंटाइन डे सहित कई त्योहारों और उत्सवों के विरोधी हैं. वे अल्पसंख्यकों के खिलाफ घृणा फैला रहे हैं, जिसके कारण छोटे-बड़े शहरों में अलग-अलग धर्मों के लोगों के अलग-अलग मोहल्ले बसने लगे हैं. वे हिंदू ऊँची जातियों की खानपान की आदतों को जबरदस्ती पूरे देश पर लादने का प्रयास कर रहे हैं. इस अभियान के तहत वे मवेषियों को ढोने वाली गाड़ियों को जबरदस्ती रोकते हैं, मवेषियों को अपने कब्जे में ले लेते हैं व बूचड़खानों के सामने प्रदर्षन आदि करते हैं. वे चाहते हैं कि देश में विवाह और मित्रता भी हिंदू सामाजिक पदानुक्रम के अनुरूप हों. हिंदू राष्ट्रवादी संगठन, गैर-हिंदुओं के बारे में दुष्प्रचार कर समाज को सांप्रदायिक आधार पर विभाजित कर रहे हैं. अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए वे युवाओं को उनकी पसंद के जीवनसाथी और मित्र चुनने के अधिकार से भी वंचित करने की कोषिश कर रहे हैं और षिक्षा संस्थानों, मीडिया व खाप पंचायतों आदि की मदद से एक विषिष्ट संस्कृति का प्रचार कर रहे हैं और उसे श्रेष्ठतम बता रहे हैं. यह सब संविधान की मूल आत्मा के खिलाफ है और धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत का उल्लंघन है.

धर्मनिरपेक्षता का अर्थ है अल्पसंख्यकों की बेहतरी के लिए सकारात्मक प्रयास, जिसमें उन्हें सुरक्षा प्रदान करने के साथ-साथ उनकी संस्कृति की रक्षा करना भी शामिल है. भाजपा सरकार, समाज के वंचित तबकों, जो पारंपरिक रूप से जाति-आधारित हिंदू सामाजिक व्यवस्था से बाहर थे, कि बेहतरी के किसी भी प्रयास की विरोधी है. स्वतंत्र बाजार की अवधारणा में विष्वास रखने वाले ये लोग, संसाधनों के बंटवारे का नियंत्रण बाजार के हाथ में देकर, सामंती, जातिगत व लैंगिक ऊँचनीच को बढ़ावा देना चाहते हैं. जब संसाधनों का वितरण बाजार से नियंत्रित होता है तब उससे सबसे अधिक लाभ उन वर्गों को होता है जिनका बाजार पर प्रभुत्व है. ‘मेक इन इंडिया’ व ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ आदि जैसे अभियानों के जरिए और श्रम कानूनों में संषोधन कर, नियोक्ताओं के लिए कर्मचारियों को नौकरी से हटाना आसान बना दिया गया है. उद्योगों को बढ़ावा देने के नाम पर पर्यावरणीय मुद्दों की अनदेखी की जा रही है और बड़े व्यवसायिक घरानों को मजदूरों का षोषण करने और किसानों की जमीनों पर जबरदस्ती कब्जा करने की खुली छूट दे दी गई है. इसके लिए एक नये भूमि अधिग्रहण कानून को लागू करने की तैयारी चल रही है जिसके अंतर्गत किसानों को अपनी जमीन मिट्टी के मोल बेचने पर मजबूर होना पड़ेगा. इस तरह, भाजपा समाजवाद की विरोधी भी है.

यद्यपि यह तथ्य है कि ‘धर्मनिरपेक्ष’ व ‘समाजवाद’ शब्द संविधान सभा द्वारा स्वीकृत संविधान की उद्देष्यिका के हिस्से नहीं थे परंतु प्रष्न यह है कि क्या स्नातक परीक्षा पास करने के बाद, आप किसी से यह कहते हैं कि आपकी षैक्षणिक योग्यता 12वीं है? क्या आप अपने ड्रायविंग लायसेंस या पासपोर्ट पर अपने बचपन की फोटो चिपकाते हैं? इसी तरह, हमने, एक लंबी लड़ाई, जिसमें हजारों लोगों ने अपना जीवन खपा दिया, हजारों ने शारीरिक कष्ट भोगे और अपनी जानें गंवाईं, के बाद स्वतंत्रता हासिल की है. हम आज एक प्रजातांत्रिक, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र हैं. क्या अब हम अपने अतीत का कोई चित्र निकालकर यह घोषणा कर सकते हैं कि हम हिंदू राष्ट्र हैं और हमारा संविधान यह नहीं कहता कि हम समाजवादी व धर्मनिरपेक्ष हैं? हिंदू राष्ट्र, अनिवार्यतः धर्मनिरपेक्षता-विरोधी होगा. हम यह देख रहे हैं कि किस तरह हिंदू राष्ट्र की विचारधारा को हिंदू महिलाओं, आदिवासियों, दलितों, श्रमिकों और उदारवादियों पर जबरदस्ती थोपा जा रहा है.

यद्यपि धर्मनिरपेक्ष व समाजवादी शब्द हमारे संविधान में बाद में जोड़े गये थे तथापि हमारे संविधान निर्माताओं के मन में इस संबंध में कोई संदेह नहीं था कि वे एक धर्मनिरपेक्ष व समाजवादी संविधान का निर्माण कर रहे हैं. उन्होंने इन शब्दों का इस्तेमाल जानते-बूझते नहीं किया. उस समय धर्मनिरपेक्षता का अर्थ धर्म का विरोध नहीं तो कम से कम अधार्मिकता अवष्य समझा जाता था. इसके विपरीत, हमारे संविधान निर्माताओं के लिए धर्मनिरपेक्षता का अर्थ धार्मिक विष्वासों से दूरी बनाना या उनका विरोध करना नहीं बल्कि अपने पसंद के किसी भी धर्म को मानने, उसका आचरण करने व उसका प्रचार करने की स्वतंत्रता था. लोकनाथ मिश्र ने संविधान सभा की एक बैठक में पूछा था कि जब अनुच्छेद 19 (संविधान के अंतिम मसविदे का अनुच्छेद 25) नागरिकों को अपने धर्म का प्रचार करने का अधिकार देता है तब धर्मनिरपेक्ष शब्द का इस्तेमाल संविधान में कैसे किया जा सकता है! दक्षिणपंथी तत्वों के कड़े विरोध के बाद भी, संविधान में किसी भी धर्म को मानने व उसका आचरण करने के साथ-साथ उसका प्रचार करने का अधिकार भी नागरिकों को दिया गया.
आगे पढ़ें

Pages:

इस समाचार / लेख पर अपनी प्रतिक्रिया हमें प्रेषित करें

  ई-मेल ई-मेल अन्य विजिटर्स को दिखाई दे । ना दिखाई दे ।
  नाम       स्थान   
  प्रतिक्रिया
   


 
  ▪ हमारे बारे में   ▪ विज्ञापन   |  ▪ उपयोग की शर्तें
2009-10 Raviwar Media Pvt. Ltd., INDIA. feedback@raviwar.com  Powered by Medialab.in