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प्रीतीश नंदी | Pritish Nandi | अमरीका चुनाव ओबामा

विचार

 

अमरीकी बयार यहां भी पहुंचे

प्रीतीश नंदी

 

 

अमेरिका में हुए राष्ट्रपति चुनाव में हमारी दिलचस्पी इसलिए नहीं रही कि भारत और अमेरिका दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र हैं. ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि तकरीबन प्रत्येक भारतीय बराक ओबामा को समर्थन दे रहा था, जबकि यह देखकर बहुत अजीब लगता है कि जॉर्ज डब्ल्यू. बुश अपनी तमाम कमियों के बावजूद भारत के लिए बेहतर थे.

हमने भले ही उनकी भूगोल की कम जानकारी के बारे में मजाक उड़ाया हो लेकिन यह बुश ही थे जिन्होंने कुछ अलग करते हुए भारत को दुनिया के नक्शे पर खास पहचान दिलाई और एशियाई अर्थव्यवस्था तथा आतंकवाद के खिलाफ अमेरिकी सहयोगी के तौर पर हमारी भूमिका पर जोर दिया. इस लिहाज से उनकी पार्टी के उम्मीदवार जॉन मैक्केन का चुनाव संभवत: भारत के लिए बेहतर होता. वे बुश की नीतियों को आगे भी जारी रखते. हम यहां ओबामा का समर्थन कर रहे हैं, जबकि हो सकता है कि पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की तरह वे भी बातें तो बड़ी-बड़ी करें लेकिन भारत के लिए कुछ करें ही नहीं.

आखिर हम ओबामा को जीतते हुए देखने के लिए इतने बेकरार क्यों थे? इसका एक कारण तो बिलकुल साफ है. ओबामा अश्वेत हैं और हम खुश हैं कि एक अश्वेत व्यक्ति अब व्हाइट अमेरिका पर राज करेगा.

दूसरा कारण भी स्पष्ट है. हममें से कई लोगों की तरह ओबामा की भी मिश्रित पृष्ठभूमि है. वे आधे अमेरिकी और आधे कीनियाई हैं. इसी तरह वे आधे ईसाई और आधे मुसलमान हैं और वास्तव में उन्होंने मदरसों में कुछ समय पढ़ाई भी की है. इसी वजह से उनके नाम के साथ हुसैन जुड़ा, इसलिए स्वाभाविक तौर पर भारतीय मुसलमान उनकी जीत पर जश्न मना रहे हैं.

उन्हें उम्मीद है कि ओबामा की विदेश नीति बुश के मुकाबले ज्यादा समावेशी होगी. बुश को हमेशा मुस्लिम-विरोधी के तौर पर देखा गया, जबकि मुझे नहीं लगता कि वे वास्तव में ऐसे थे.

हां, वे सद्दाम-विरोधी, ओसामा-विरोधी, कट्टर इस्लाम विरोधी, आतंकवाद विरोधी और (हमारे सौभाग्य से) अपने आखिरी वर्षों में पाकिस्तान विरोधी थे, जिसे उन्होंने आतंकवाद की पनाहगाह के तौर पर देखा, लेकिन वास्तव में वे इस्लाम के विरोधी नहीं थे. सऊदियों के साथ उनके रिश्ते असाधारण रूप से मधुर थे, जिसकी वजह से बिन लादेनों के साथ उनके पिता की व्यावसायिक घनिष्ठता की कहानियों को भी हवा मिली, लेकिन ओबामा इस सबसे काफी आगे निकल चुके हैं. वे बदलाव का प्रतिनिधित्व करते हैं, न सिर्फ अमेरिका में बल्कि दुनिया में.

आखिरकार कोई बदलाव होगा या नहीं, यह कोई नहीं जानता, फिर भी हम इस पर दांव लगा रहे हैं. हम इस पर भी दांव लगा रहे हैं कि यह बदलाव दुनिया को और बेहतर, सुरक्षित और साफ-सुथरा बना सकता है- ऐसी दुनिया जिसे हम अपने बच्चों को सौंपने में शर्मिंदा नहीं होंगे.

बम धमाके, गंभीर और भयावह मंदी, लुढ़कता शेयर बाजार, गिरता रुपया, तेजी से घटता विदेशी मुद्रा भंडार, बढ़ती मुद्रास्फीति, बढ़ता क्षेत्रवाद, जोर पकड़ती जातीय और सांप्रदायिक हिंसा और जहां-तहां पनपते आतंकवाद के काले साए के बीच जहां भारत अगले साल आम चुनाव में जाने के लिए तैयार है, ऐसे में हर भारतीय यह प्रार्थना कर रहा है कि इन सारी त्रासदियों के बीच कोई ओबामा उभरे और हमें उम्मीद की नई किरण दिखाए.

नहीं, यह सिर्फ सरकार में बदलाव की बात नहीं है. हमने सरकारों को आते-जाते देखा है. हम सब इसके द्वारा लाए गए असहनीय भ्रष्टाचार और नफरत की राजनीति से ऊब चुके हैं. हम जिस तरह से हिंसा के बढ़ते चक्रवात में उलझते जा रहे हैं, उससे भी काफी व्यथित हैं. हम ऐसा नेता चाहते हैं जो हमें भारतीयों के तौर पर एक साथ जोड़ सके, न कि अपना वोट बैंक बनाने के लिए हमें विभाजित करे.

हम ऐसे राजनेताओं से ऊब चुके हैं जो देशभक्ति का चोला धारण किए रहते हैं और इसके बावजूद अपना पूरा समय देश को तहस-नहस करने में लगे रहते हैं. हम अलग-अलग लॉबियों द्वारा सरकार चलाने से ऊब चुके हैं, जहां हर कोई अपने हितों को आगे बढ़ाता है जबकि आप और हम इन नीतियों के घावों को सहते हैं जो हमें हर दिन कंगाल कर रही हैं.

भारत को शीर्ष स्तर पर प्रतिभाओं की एक नई टीम की बेहद जरूरत है. एक नया नेता, प्रशासन को लेकर एक नई सोच, नई राजनीति, मूल्यों का एक नया सेट जो लोक-जीवन का मार्गदर्शन कर सके. ओबामा ने ठीक इसी के बारे में बात की. वास्तव में इसका कोई खास मतलब नहीं है कि वह अपनी बातों पर खरे उतरते हैं या नहीं. वैसे उम्मीद यही है कि वे इस पर खरे उतरेंगे. जो बात मायने रखती है वह यह कि उन्होंने ऐसे देश को उम्मीद जगाई, जिसे इसकी बेहद जरूरत है.

हमें भी ऐसी ही उम्मीद की जरूरत है. हम अतीत से पूरी तरह पीछा छुड़ाना चाहते हैं. हमें ऐसा बदलाव चाहिए जो हमें फिर से नया बना दे, फिर से युवा कर दे. हम उन्हीं स्लोगनों, उन्हीं पोस्टरों पर उन्हीं चेहरों, उसी तरह की चुनावी मुहिम, उसी तरह की फूट डालो और राज करो की नीति जो ईस्ट इंडिया कंपनी के बाद से आज तक नहीं बदली, इस सबको देखते-देखते बेजार हो चुके हैं.

जो भी इस चुनाव में जीत हासिल करे, हम तो संसद में नए चेहरों को देखने के लिए बेकरार हैं, जो राजनीति की नई भाषा बोलें, नए भारत को संबोधित करें. हम सब जानते हैं कि राजनीति आखिरकार हम सबको निराश करती है- इसके बारे में यह अजीब-सी संभाव्यता है. खैर, चाहे कोई भी सत्ता में आए- लेकिन कोई प्रतीकात्मक बदलाव भी, जैसा अमेरिका के लिए ओबामा हैं, हमारे भीतर उम्मीद की किरण जगा सकता है.

इसी वजह से हम उनकी जीत पर इतने खुश हैं. यह जीत एक उम्मीद लेकर आई, ऐसी उम्मीद जो तकरीबन खत्म हो चुकी थी. इसने हममें भरोसा जगाया, विश्वास बदलाव के सत्याभास में. इसने हमें यकीन दिलाया कि देश में बदलाव अब भी मुमकिन है ताकि इसे हम सबके, युवा व बुजुर्ग, अमीर व गरीब, हिंदू, मुस्लिम या ईसाई, महाराष्ट्रियन या बिहारी, दलित या सवर्ण जातियों के रहने के लिहाज से बेहतर बनाया जा सके.

23.11.2008, 01.46 (GMT+05:30) पर प्रकाशि


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