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हिन्दू राष्ट्र, गाय व मुसलमान

समाज

 

हिन्दू राष्ट्र, गाय व मुसलमान

इरफान इंजीनियर


उच्च जातियों के हिन्दुओं और हिन्दू राष्ट्रवादी संगठनों का गाय के प्रति - एक पशु बतौर व हिन्दू राष्ट्र के प्रतीक बतौर - ढुलमुल रवैया रहा है. कभी वे गाय के प्रति बहुत श्रद्धावान हो जाते हैं तो कभी उनकी श्रद्धा अचानक अदृश्य हो जाती है. हाल के कुछ वर्षों में, हिन्दू राष्ट्रवादियों ने गाय को एक पवित्र प्रतीक के रूप में प्रस्तुत करना शुरू कर दिया है. ऐसा इसलिए नहीं है कि सनातन धर्म की चमत्कृत कर देने वाली विविधता से परिपूर्ण धार्मिक-दार्शनिक ग्रंथ ऐसा कहते हैं, बल्कि इसलिए क्योंकि गाय, हिन्दुओं को लामबंद करने और मुसलमानों को खलनायक के रूप में प्रस्तुत करने के लिए अत्यंत उपयोगी है. 

गाय


ऐसा क्यों? क्योंकि मुसलमानों के गौमांस भक्षण पर कोई धार्मिक प्रतिबंध नहीं है और इस धर्म के मानने वालों का एक तबका मांस व मवेशियों के व्यापार में रत है. मुस्लिम शासकों और धार्मिक नेताओं का भी गाय के प्रति ढुलमुल रवैया रहा है. कभी उन्हांेने हिन्दुओं के साथ षांतिपूर्ण सहअस्तित्व की खातिर गौवध को प्रतिबंधित किया तो कभी अपने सांस्कृतिक अधिकारों और अपनी अलग पहचान पर जोर दिया.

दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास के प्रोफेसर डीएन झा की पुस्तक ‘द मिथ ऑफ होली काऊ‘ (पवित्र गाय का मिथक) कहती है कि प्राचीन भारत में न केवल गौमांस भक्षण आम था वरन् गाय की बलि भी दी जाती थी और कई अनुष्ठानों में गाय की बलि देना आवश्यक माना जाता था. कई ग्रंथों में इन्द्र भगवान द्वारा बलि दी गई गायों का मांस खाने की चर्चा है. चूंकि उस समय समाज, घुमंतु से कृषि-आधारित बन रहा था इसलिए मवेशियों का महत्व बढ़ता जा रहा था, विषेषकर बैलों और गायों का. मवेशी, संपत्ति के रूप में देखे जाने लगे थे जैसा कि ‘गोधन‘ शब्द से जाहिर है. शायद इसलिए, गाय की बलि पर प्रतिबंध लगाया गया और उस प्रतिबंध को प्रभावी बनाने के लिए उसे धार्मिक चोला पहना दिया गया. सातवीं से पांचवी सदी ईसा पूर्व के बीच लिखे गए ब्राहम्ण ग्रंथों, जो कि वेदों पर टीकाएं हैं, में पहली बार गाय को पूज्यनीय बताया गया है.

इसके बाद, भारत में बौद्ध और जैन धर्मों का उदय हुआ और सम्राट अशोक ने सभी पशुओं के प्रति दयाभाव को अपने राज्य की नीति का अंग बनाया. यहां तक कि उन्होंने जानवरों की चिकित्सा का प्रबंध तक किया और उनकी बलि पर प्रतिबंध लगा दिया, यद्यपि यह प्रतिबंध मवेशियों पर लागू नहीं था. कौटिल्य के ‘अर्थशास्त्र‘ में मवेशियों के वध को आम बताया गया है.

इंडोनेशिया के बाली द्वीपसमूह के हिन्दू आज भी गौमांस खाते हैं. कुछ आदिवासी समुदायों में आज भी उत्सवों पर गाय की बलि चढ़ाई जाती है. कुछ दलित समुदायों को भी गौमांस से परहेज नहीं है. हिन्दुओं के गौमांस भक्षण पर पूर्ण प्रतिबंध, आठवीं सदी ईस्वी में लगाया गया, जब आदि षंकराचार्य के अद्वैत वेदांत दर्शन का समाज में प्रभाव बढ़ा.

बौद्ध धर्म-विरोधी प्रचार भी आठवीं सदी में अपने चरम पर पहुंचा, जब षंकर ने अपने मठों का ढांचा, बौद्ध संघों की तर्ज पर बनाया. ग्यारहवीं सदी तक उत्तर भारत में हिन्दू धर्म एक बार फिर छा गया, जैसा कि उस काल में रचित संस्कृत नाटक ‘प्रबोधचन्द्रोदय‘ से स्पष्ट है. इस नाटक में बौद्ध और जैन धर्म की हार का रूपक और विष्णु की आराधना है. तब तक उत्तर भारत के अधिकांश रहवासी शैव, वैष्णव या शक्त बन गए थे.

12वीं सदी के आते-आते, बौद्ध धर्मावलंबी केवल बौद्ध मठों तक सीमित रह गए और आगे चलकर, यद्यपि बौद्ध धर्म ने भारत के कृषक वर्ग के एक तबके को अपने प्रभाव में लिया, तथापि, तब तक बौद्ध धर्म एक विशिष्ट धार्मिक समुदाय के रूप में अपनी पहचान खो चुका था. वैष्णव, पशुबलि के विरोधी और शाकाहारी थे.

मुसलमानों का ढुलमुल रवैया

मुस्लिम शासक और धार्मिक नेता, वर्चस्वशाली उच्च जाति के हिन्दुओं की भावनाओं का आदर करने और अपने सांस्कृतिक अधिकारों पर जोर देने के बीच झूलते रहे. मुगल बादशाह बाबर ने गौवध पर प्रतिबंध लगाया था और अपनी वसीयत में अपने पुत्र हुमांयू से भी इस प्रतिबंध को जारी रखने को कहा था. कम से कम तीन अन्य मुगल बादशाहों-अकबर, जहांगीर और अहमद शाह-ने भी गौवध प्रतिबंधित किया था. मैसूर के नवाब हैदरअली के राज्य में गौवध करने वाले के हाथ काट दिए जाते थे.

असहयोग और खिलाफत आंदोलनों के दौरान गौवध लगभग बंद हो गया था क्योंकि कई मुस्लिम धार्मिक नेताओं ने इस आशय के फतवे जारी किए थे और अली बंधुओं ने गौमांस भक्षण के विरूद्ध अभियान चलाया था. महात्मा गांधी ने हिन्दुओं से खिलाफत आंदोलन का समर्थन करने की जो अपील की थी, उसके पीछे एक कारण यह भी था कि इसके बदले मुसलमान नेता गौमांस भक्षण के विरूद्ध प्रचार करेंगे. मुस्लिम धार्मिक नेताओं ने इस अहसान का बदला चुकाया और गौवध के खिलाफ अभियान शुरू किया . इससे देश में अभूतपूर्व हिन्दू-मुस्लिम एकता स्थापित हुई और पूरे देश ने एक होकर अहिंसक रास्ते से ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ मोर्चा संभाला.

हाल में कई राज्यो द्वारा गौवध पर प्रतिबंध लगाने संबंधी कानून बनाए गए हैं. इनका विरोध गौमांस व्यापारी व मांस उद्योग के श्रमिक कर रहे हैं. इनमें मुख्यतः कुरैशी मुसलमान हैं परंतु हिन्दू खटीक व अन्य गैर-मुसलमान भी यह व्यवसाय करते हैं. वे इस प्रतिबंध का विरोध मुख्यतः इसलिए कर रहे हैं क्योंकि इससे उनके व्यावसायिक हितों को नुकसान पहुंचेगा.

फिक्की और सीआईआई यह चाहते हैं कि उद्योगों और व्यवसायों पर सरकार का नियंत्रण कम से कम हो. अगर ये छोटे व्यवसायी भी ऐसा ही चाहते हैं तो इसमें गलत क्या है? और यहां इस तथ्य को नहीं भुलाया जाना चाहिए कि मांस के व्यवसायियों में हिन्दू और मुसलमान दोनों शामिल हैं परंतु मीडिया केवल मुसलमानों के विरोध को महत्व दे रहा है और गैर-मुसलमानों द्वारा किए जा रहे विरोध का अपेक्षित प्रचार नहीं हो रहा है.

गौवध पर प्रतिबंध और गौमांस के व्यवसाय के विनियमन को कई आधारों पर चुनौती दी जाती रही है, जिनमें से एक है संविधान के अनुच्छेद 19(1) द्वारा हर नागरिक को प्रदत्त ‘कोई भी वृत्ति, उपजीविका, व्यापार या कारोबार‘ करने का मौलिक अधिकार. इसके अतिरिक्त, अनुच्छेद 25, जो कि सभी नागरिकों को किसी भी धर्म को मानने और उसका आचरण करने की स्वतंत्रता देता है, के आधार पर भी इस प्रतिबंध को अनुचित बताया जाता रहा है.
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