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बड़ी खबर की छोटी आहट

विचार

 

बड़ी खबर की छोटी आहट

प्रीतीश नंदी


तीस साल पहले पत्रकार के रूप में कॅरिअर शुरू करने के लिए मैं बॉम्बे आया था. यहां आकर सबसे पहले मुझे गॉसिप की अहमियत का पता चला. मैंने कभी इसे नीची निगाहों से नहीं देखा क्योंकि मेरे कई संपादक मित्र भी ऐसा करते थे. घटिया दर्जे की पत्रकारिता समझकर मैंने कभी इसका उपहास नहीं उड़ाया.

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विमेरे लिए गॉसिप बड़ी ब्रेकिंग न्यूज़ के पैदल सैनिक की तरह थे. ब्रेकिंग न्यूज बड़े युद्ध की तरह होते हैं. वे ऐसे ही नहीं मिलते. जिस तरह बड़े पैमाने पर लड़ाई से पहले छोटी-छोटी झड़पें होती हैं, वैसे ही बड़ी खबर से पहले उससे संबंधित तमाम तरह की अफवाहें होती हैं. युद्ध में एक सामान्य सैनिक की भूमिका बड़े अधिकारियों से अलग होती है. बड़े अधिकारी बड़ी लड़ाइयां लड़ते हैं और जीत-हार का श्रेय भी उन्हें ही मिलता है.

नाम गोपनीय रखकर गॉसिप कॉलम लिखने वाले लोग परदे के पीछे होने वाली घटनाओं का पहला वास्तविक विवरण सामने लाते हैं. संभव है कि वे कभी-कभी अपनी दिशा से भटक जाएं, कभी घटनाओं को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करें, लेकिन विरले ही कभी देखने को मिलता है कि गॉसिप पूरी तरह झूठ पर आधारित हो.

खबरों के प्रकाशन की प्रक्रिया में हर स्तर पर निगरानी की व्यवस्था होती है और गलत जानकारियां छपना असंभव जैसा होता है. फिर भी यदि कभी ऐसा हो जाए, जैसा कि सेंट किट्स मामले में हुआ, तो इसका एक ही मतलब है कि जिम्मेदार अधिकारियों की शह पर ऐसा जानबूझकर किया गया है. (आमतौर पर सत्ता में बने लोग ही ऐसा करते हैं.)

अधिकतर गॉसिप उकसाने का काम करते हैं. इसके बाद नए तथ्य सामने आने लगते हैं. इनमें से कुछ पुरानी धारणाओं के विपरीत होते हैं, लेकिन वे खबर को आगे ले जाने का काम करते हैं. अब तक हुए कुछ सबसे बड़े घोटाले, स्कैंडल और राजनीतिक चालबाजियों की पहली खबर ऐसे ही किसी अनजाने अखबार में गॉसिप के रूप में छपीं. फिर उन पर किसी की नजर पड़ी और वह बड़ी खबर बन गई.

बोफोर्स का मामला ऐसे ही सामने आया था. स्वीडन में रेडियो पर प्रसारित खबर को मध्य-पूर्व के किसी देश के अखबार ने छापा. इसके बाद यह सबसे बड़े घोटाले के रूप में सामने आया. इसका नतीजा यह हुआ कि लोकसभा में 411 सीटें जीतकर प्रचंड बहुमत से सत्ता में आए प्रधानमंत्री की विदाई हो गई. (इसकी तुलना मौजूदा भाजपा सरकार की 282 सीटों से कर सकते हैं.)

केवल बोफोर्स ही अकेला मामला नहीं है. इंटरनेट के आने से पहले जितने घोटाले हुए, वे ऐसे ही खबर बने. चाहे वो एचडीडब्ल्यू सबमरीन, वेस्टलैंड हेलिकॉप्टर या मिग विमानों की खरीदी का मामला हो,

अंतुले का सीमेंट घोटाला हो या बिहार का चारा घोटाला, हवाला कांड हो या नरसिम्हा राव की शह पर चंद्रास्वामी की करतूतें, संसद में कैश फॉर वोट का मामला हो या हर्षद मेहता का शेयर घोटाला. पहला टेलीकॉम घोटाला जिसके चलते सुखराम को जेल जाना पड़ा या दूसरा जिसके चलते ए. राजा को तिहाड़ जेल की उसी कोठरी में रहना पड़ा.

क्रिकेट का मैच फिक्सिंग स्कैंडल, जिसके चलते अजहरुद्दीन का कॅरिअर खत्म हो गया और कपिल देव को टीवी चैनलों पर रोने को मजबूर होना पड़ा. इन सबकी शुरुआत गॉसिप कॉलम की कानाफूसी से ही हुई थी. धीरे-धीरे जब इनकी अहमियत का पता चला तो ये बड़े अखबारों की पहले पन्ने की खबर बन गईं.

वह एक दौर था जब भारत खबरों का भूखा था. आपातकाल का दौर खत्म हुआ था और मीडिया अपनी खोई हैसियत पाने की जद्दोजहद में लगा था. तकरीबन हर सप्ताह कोई बड़ी खबर सामने आती थी. यह शायद हमें याद दिलाने के लिए था कि आपातकाल के दौरान हमें किन चीजों से वंचित रहना पड़ा.

हम क्या पढ़ें, देखें, सुनें या किन बातों पर हंसें, इसका फैसला सरकार करती थी. किताबें प्रतिबंधित थीं, अखबार-पत्रिकाओं में लेख नहीं छपते थे. फिल्मों पर जमकर कैंची चलती थी और एक बार तो किसी फिल्म के निगेटिव तक को जला दिया गया था. आरके लक्ष्मण जैसे सज्जन कार्टूनिस्ट भी अखबारों के पहले पन्ने से गायब हो गए थे.

यह वह दौर था जब देश में पहली बार सरकार ने मीडिया को अपने हंटर से हांकने की कोशिश की थी. (रोचक तो यह है कि उस दौर के किसी भी राजनीतिज्ञ ने सुप्रीम कोर्ट के जज की आलोचना नहीं की, न ही तथाकथित फाइव स्टार एक्टिविस्ट्स से उनके मेल-जोल पर छींटाकशी की. फाइव स्टार एक्टिविस्ट का चाहे जो भी मतलब हो.)

हमेशा गॉसिप ही शुरुआत का कारण रहा है क्योंकि यह हमारी राजनीति के सार को पकड़ सकता था. अपराध, भ्रष्टाचार, पैसों का लेन-देन और सेक्स, वो भी ऐसे हालात और जगहों पर जिनकी कल्पना भी मुश्किल है. इसके साथ इन सबको छुपाने की कोशिश. उस समय गॉसिप भी मजेदार होती थी.

राजनेता उस दौर में अपने अपराध छुपाने में पारंगत नहीं हुए थे. वे जितना छुपाने की कोशिश करते, उतने ही गड़े मुर्दे सामने आते और गॉसिप जबर्दस्त खबर में तब्दील हो जाती. राजनीतिज्ञों के पास बचाव का हमेशा एक ही साधन रहा है- राष्ट्रीय हित. जो जितना ज्यादा राष्ट्रीय हित के दावे करता, उस पर इसके खिलाफ काम करने के उतने ज्यादा आरोप लगते. वे राष्ट्रविरोधी थे.

राजीव गांधी ने तो अपनी कैबिनेट में वित्तमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह तक को राष्ट्रविरोधी कह दिया था. उन्हें जल्द ही इसका जवाब भी मिल गया, जब देश ने उन्हें सत्ता से बेदखल कर दिया. वीपी सिंह अगले प्रधानमंत्री बने और मीडिया ही शुरुआत में उनका खेवनहार बना था. मंडल कमीशन लागू होने के बाद मची उथल-पुथल में वीपी सिंह उम्मीदों पर खरे नहीं उतर पाए तो इसी मीडिया ने उन्हें पद से हटाने के लिए अभियान छेड़ा था.

छोटी और अक्सर निरर्थक लगने वाली फुसफुसाहटें मीडिया का सबसे बड़ा हथियार थीं. यह सत्ता की अथाह ताकत को चुनौती दे सकती थीं, सबसे शक्तिशाली को जमीन पर गिराने में सक्षम थीं. किसी गलत काम का पहला संकेत होती थी फुसफुसाहट, जो किसी ब्रेकिंग न्यूज़ की ओर इशारा करती थी.

उद्देश्य पूरा होते ही गॉसिप गायब हो जाता था. इसे इतिहास की किताबों में जगह नहीं मिली, न ही इसे कभी कोई श्रेय मिला. वैसे ही जैसे लड़ाई खत्म होने के बाद सैनिक बैरकों में लौट जाते हैं, जबकि अधिकारी जीत की खुशियां मनाने लगते हैं.

21.04.2015, 19.59 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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