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हिन्दू राष्ट्र, गाय और मुसलमान-2

स्मृति शेष

 

हिन्दू राष्ट्र, गाय और मुसलमान-2

इरफान इंजीनियर


सन 1966 के आसपास, हिन्दू राष्ट्रवादियों ने गाय के मुद्दे पर एक बार फिर अपना ध्यान केन्द्रित किया. तत्समय नवगठित विश्व हिन्दू परिषद् ने गौवध-विरोधी आंदोलन शुरू कर, हिन्दुओं को लामबंद करने की कोशिश की, यद्यपि यह प्रयास अधिक सफल न हो सका. सन 1967 में हजारों साधुओं ने संसद पर प्रदर्शन कर गौवध को पूरी तरह प्रतिबंधित करने की मांग की.
 

cow

उशनैः-शनैः, गाय और बोतलबंद गंगाजल, हिन्दू राष्ट्रवादी संगठनों के मुसलमानों को गौहत्यारा बताने के अभियान के स्थायी प्रतीक बन गए. गाय को पवित्र और ईश्वरीय दर्जा दिया जाने लगा. गौमूत्र और गाय के गोबर का जबरदस्त महिमामंडन किया गया और उन्हें कई रोगों का रामबाण इलाज बताया जाने लगा. लाखों की संख्या में ऐसे पोस्टर देश भर में लगाये गए, जिनमें विभिन्न देवताओं का वास, गाय के शरीर में बताया गया था.

सन 2010 में दो प्रतिष्ठित समाचारपत्रों में यह खबर छपी कि आरएसएस से जुड़े ‘गौ विज्ञान अनुसंधान केंद्र’ ने गौमूत्र से एक ऐसी दवा बनाई है, जिससे कैंसर ठीक हो सकता है और इस दवा का अमरीका में पेटेंट भी करा लिया गया है.

विभिन्न राज्यों में बड़ी संख्या में गौशालाएं स्थापित हो गयीं और सरकारी धन से बूढ़ी गायों की देखभाल का प्रबंध होने लगा. हरियाणा में ऐसी बहुत-सी गौशालाएं हैं, जिन्हें राज्य सरकार से अनुदान प्राप्त होता है और दान के रूप में भी भारी-भरकम राशि मिलती है. परंतु फिर भी, बूढी गायों को न तो भरपेट भोजन मिलता है और ना ही उनकी उचित देखभाल की जाती है.

यही हालत, कुछ अपवादों को छोड़कर, देश के सभी हिस्सों में चल रहीं गोशालाओं की है. इन गोशालाओं के संचालकों के लिए, अधिक संख्या में गायों का अर्थ होता है ज्यादा अनुदान. जाहिर है कि उनकी रूचि इसी में रहती है की गौवध पर पूर्ण प्रतिबन्ध लग जाए और इसलिए ही वे बूढी गायों की उपयोगिता का अतिश्योक्तिपूर्ण प्रचार करते हैं.

गौरक्षक दल और हिन्दू राष्ट्रवादी
विभिन्न प्रदेशों में 4-6 सदस्यीय गौरक्षक दल गठित हो गए हैं. इनकी संख्या, भाजपा-शासित राज्यों में ज्यादा है, जहाँ उनका मजबूत जाल है और उन्हें अनौपचारिक रूप से सरकार का संरक्षण प्राप्त है. ये दल सड़कों पर डेरा जमाये रहते हैं और मवेशी ले जा रहे ट्रकों को रोक लेते हैं. ये ट्रक सामान्यतः केवल मवेशियों को विक्रेता से क्रेता तक पहुंचाने का काम कर रहे होते हैं.

अगर ट्रक का ड्राईवर या मालिक मुसलमान हो, तब तो उनकी खैर नहीं. अगर वाहन में सभी जरूरी कागजात उपलब्ध हों तब भी ये लोग ड्राईवर की बेतहाशा पिटाई लगाते हैं और अगर उन्हें मुंहमांगी रकम नहीं दी जाती तो वे मवेशियों पर कब्जा कर लेते हैं. ड्राईवर को मीडिया के सामने प्रस्तुत किया जाता है ताकि मुसलमानों को गौहत्यारा बताया जा सके. बाद में ड्राईवर को पुलिस के हवाले कर दिया जाता है. पुलिस, गौरक्षक दल के सदस्यों की बजाए, ड्राईवर पर मुकदमा कायम कर देती है.

इस लेखक ने गुजरात के कच्छ इलाके में कई ऐसी घटनाओं की जांच और राजस्थान के मेवात और मध्यप्रदेश के अनेक शहरों में हुईं इस तरह की घटनाओं की विस्तृत जानकारी एकत्रित की है. अकेले अहमदाबाद में कम से कम 64 ऐसे दल हैं. मीडिया में लगातार मुसलमानों को कसाईयों के रूप में प्रस्तुत किए जाने और सोशल मीडिया साईटों पर फोटोशॉप इत्यादि का इस्तेमाल कर रूपांतरित किये गये फोटो अपलोड करने के नतीजे में, देश में कई स्थानों में सांप्रदायिक दंगे हुए हैं.

अहमदाबाद में सन् 1969 में सांप्रदायिक हिंसा इस अफवाह के बाद शुरू हुई कि मुसलमानों द्वारा बेरहमी से गायों की पिटाई की जा रही है. महाराष्ट्र के धुले में 5 अक्टूबर 2008 को दंगे तब शुरू हुए जब हिंदू रक्षक समिति ने शहर में बड़ी संख्या में ऐसे पोस्टर चिपकाये जिनमें मुस्लिम टोपी पहने एक दाढ़ी वाला आदमी, बड़ी क्रूरता से एक गाय को काट रहा है.

पुलिस के जिस डीएसपी से हमने बात की उसने बताया कि पोस्टर में जो चित्र लगाया गया था, वह बम धमाके में मारी गई एक गाय का था. पोस्टर में अत्यंत भड़काऊ और आपत्तिजनक बातें थीं परंतु पुलिस ने पूरे पोस्टर को हटाने की बजाए केवल उस हिस्से पर कागज की पर्चियां चिपकवा दीं.

हिंदू राष्ट्रवादी, गाय के प्रतीक का इस्तेमाल मवेशियों को ढोने वाले ट्रांसपोटरों से अवैध वसूली करने, मुस्लिम समुदाय के विरूद्ध घृणा फैलाने और सांप्रदायिक दंगे करवाने के लिए तो करते ही हैं, वे इसका इस्तेमाल अपने एक वृहद राजनैतिक लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए भी करते हैं और वह है ऊँची जातियों के हिंदुओं और ओबीसी के एक हिस्से को एकसूत्र में बांधना. ऊँची जातियां, हिंदू आबादी का 15 प्रतिशत से भी कम हैं.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Gulam gaus [gulamgaush.013@gmail.com] Dhanbad - 2015-06-21 11:12:23

 
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