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ऐसा हो मोदी के सपने का भारत

समाज

 

ऐसा हो मोदी के सपने का भारत

प्रीतीश नंदी


भारत ने पिछली बार कैमलॉट (अमेरिका में जॉन एफ कैनेडी के कार्यकाल को कैमलॉट यानी बदलाव के वर्ष कहा जाता है. यह शब्द मूल रूप से इंग्लैंड में किंग ऑर्थर के युग का है, जो इंग्लैंड का सर्वश्रेष्ठ समय माना जाता है. कैमलॉट वह जगह थी जहां किंग आर्थर का महल व दरबार था.) का सपना तब देखा था जब ताजगीभरे चेहरे वाले राजीव गांधी सत्ता में आए थे. पुरानी दुनिया की कांग्रेस के चापलूसी तौर-तरीकों से चिड़े हुए राजीव.

modi


राजीव 404 सांसद लेकर संसद में दाखिल हुए, खेल के सारे नियम बदलने के साथ भारत को 21वीं सदी में ले जाने के वादे के साथ. यह 30 साल पुरानी बात है. फिर बोफोर्स घोटाला सामने आया. सबकुछ बदल गया. तब से हम गठबंधन राजनीति से गुजरे. सांप-सीढ़ी जैसा चिंता पैदा करने वाला खेल. बाज़ वक्त हम ऊपर उठे तो और भी तेजी से नीचे आए. यूपीए-2 तो गड्‌ढे में गिरने जैसा है. यही वक्त था जब सार्वजनिक नैतिकता सहित हर बात में गिरावट आ गई.

जब स्थिति हद से ज्यादा खराब हो जाती है तो राजनीति अपना समाधान लेकर आती है. हमने यह आपातकाल के दौरान देखा. यूपीए-2 के आखिर में हमने इसे फिर देखा. घबराए, कुंठित व क्रोधित राष्ट्र ने गठबंधन राजनीति को अलविदा कह दिया और पिछले साल एक ही दल को स्पष्ट बहुमत देकर सत्ता में भेज दिया. इससे भी महत्वपूर्ण बात यह थी कि राष्ट्र ने उस पार्टी को इसके नेता के लिए वोट दिया, जिसमें उसे पूरा भरोसा था. यह फिर कैमलॉट था.

युवा, ताजगीभरे चेहरे वाली पीढ़ी और ताकत देने वाले नए सोशल मीडिया ने भावनाओं को उद्वेलित कर नरेंद्र मोदी की ताजपोशी कर दी, जिनके भूतकाल को लेकर कुछ गंभीर चिंता के बावजूद वे उसी 21वीं सदी में देश को आगे ले जाने के लिए चुने गए, जिसका वादा राजीव गांधी ने किया था. अब मोदी का पहला साल खत्म होने वाला है और हमारे सामने क्या है? क्या हम उससे ज्यादा खुश हैं, जितने हम 26 मई 2014 को थे?

क्या हमारे हाथ निराशा लगी है? क्या भारत आगे बढ़ा है? या यह फिर ठहराव नज़र आ रहा है? हमारे बारे में दुनिया क्या सोचती है? क्या उभरते भारत की कहानी पर अब भी उसे भरोसा है या अब उसे लगता है कि इसका जरूरत से ज्यादा डंका पीटा जा चुका है? रुपया क्यों गिरता जा रहा है? क्यों परियोजनाओं की मंजूरी में अब भी देरी हो रही है? क्यों टैक्स का आतंक अब भी जारी है? क्यों नितिन गडकरी जैसे हाई रैंक के मंत्री हमें बताते हैं कि हम किसानों की आत्महत्याओं को अपने बगीचे में यूरिनेशन करके मात दे सकते हैं?

हमने पिछले एक साल में कई बार रीइमेजिंग इंडिया के बारे में सुना है. बेशक, मोदी ने भारत की पुनर्कल्पना की है. इसमें तो कोई संदेह ही नहीं है. परंतु कल्पना और उसे हकीकत में उतारने के बीच क्या हमें संदेह की छाया और नाकामी दिखाई देती है? सबसे महत्वपूर्ण तो यह है कि एक राष्ट्र के रूप में क्या हम सबको, सिर्फ वे भाजपा को वोट देने वाले 31 फीसदी नहीं, हम सबको भरोसा है कि हम सही दिशा में जा रहे हैं? क्या हम सबको यकीन है (या कम से कम हममें से ज्यादातर को) मोदी ही भारत के कैमलॉट हैं, जिसका हमने कभी सपना देखा था?

एक के बाद एक अलग-अलग राज्यों में लोग यह कहने के लिए आगे आ रहे हैं कि वे अलग सोचते हैं. इसमें कुछ भी गलत नहीं है, क्योंकि भारत एक जीवंत लोकतंत्र है और विभिन्न मसलों पर हम सबका अपना दृष्टिकोण है. सर्वसम्मति एक नामुमकिन-सी उम्मीद है. मोदी ने इस एक साल में देखा है कि (एक राज्य से अलग) देश को चलाना बिल्कुल भिन्न है. इसके केंद्र में भिन्न (और प्राय: विरोधी) विचार व राजनीति की धाराओं को साथ लाने की कला है.

यह तब बिल्कुल आसान नहीं है जब आपके पास भारत पर शासन करने का अपना विज़न हो. किंतु जैसे इतिहास में हर शासन ने पाया है, भारत को शासित नहीं किया जा सकता. यहां तो सिर्फ बुद्धिमत्ता, अंतर्दृष्टि, समझ-बूझ, लेन-देन से शासन किया जा सकता है. और सुनने में यह जितना आसान लगता है, कोई मजबूत शासक इसे करने के काबिल साबित नहीं हुआ है. केवल बुद्धिमान व्यक्ति ही विजयी होने के लिए झुकता है. और शायद मोदी ने पहली गलती यही कि उन्होंने खुद को ऐसे शक्तिशाली शासक के रूप में पेश किया, जिसे देश हमेशा से चाहता था.

सच यह है : हम शक्तिशाली शासक के बारे में चाहे जिन मिथकों पर भरोसा करते हों, वास्तविकता यह है कि हम उदारता, सरलता की तलाश कर रहे हैं. एक ऐसा नेता चाहते हैं जो इतनी सारी असहमतियों को एकसाथ ला सके. यह तो चुनौती है. हम विचार में ही एक राष्ट्र हैं. वास्तव में हम सब अलग-अलग दिशाओं में जाते दिखाई देते हैं. इसमें भी कुछ भी गलत नहीं है. हम एक साथ हैं ही इसलिए कि हम सब एक-दूसरे से इतने भिन्न हैं. यह हमारी विविधता, हमारी बहुलता, हमारी रहस्यवादी बहुलता ही है, जिन्होंने हमें जोड़ रखा है, उस असंदिग्ध राष्ट्रभक्ति ने नहीं, जैसाकि कुछ लोग प्रचारित करते हैं.

मोदी की गलती नहीं है. हम जिस चीज की आतुरता से आकांक्षा करते हैं, वास्तव में यह वह नहीं होता, जिसकी हमें दरकार होती है. भूतकाल के नेता को समर्पित स्टेच्यू ऑफ यूनिटी बनाने के लिए एल एंड टी को आधा अरब डॉलर देने की बजाय हम अनीश कपूर से हमारी विविधता को श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए कुछ निर्मित करने को कह सकते थे ताकि हम उन खास मूल्यों को सहेज सकें, जिन्होंने अाधुनिक भारत के निर्माण में हमारी मदद की है और खुद को फिर से वह होने के लिए अपने को फिर से समर्पित कर सकते थे, जिसमें हम सर्वश्रेष्ठ हैं : बहस करने वाले, झगड़ालू व जटिल और फिर भी सुसंगत व सामन्जस्यपूर्ण.

हममें से हर व्यक्ति अनोखी पहचान का प्रतिनिधित्व करता है : अलग संस्कृति, अलग पृष्ठभूमि अलग अास्था, जाति, भाषा, समुदाय और फिर भी हम इस अद्‌भुत देश का निर्माण करने के लिए एकसाथ आए हैं. क्योंकि भविष्य के महान देशों का निर्माण एकरूपता पर नहीं होगा. बलपूर्वक मतभेदों को खत्म करके नहीं, उन्हीं मतभेदों का उत्सव मनाकर होगा. यदि मोदी इस एक स्वप्न को आकार दे सकें तो हमें वह भारत मिलेगा, जो हम चाहते हैं, जहां हम सबकी बात सुनी जाएगी.

यह हमारा कैमलॉट होगा. एक ऐसा भारत जो हम सबकी वह होने में मदद करेगा, जो हम होना चाहेंगे. फिर चाहे हमारी अास्था कोई क्यों न हों, हम किसी भी जगह के क्यों न हों. हम क्या खाते, पहनते, कौन-सी भाषा बोलते, कौन-सी जाति या समुदाय के हैं, कौन-से देवी-देवता पूजते हैं या किस लिंग के हैं, इसका कोई अर्थ नहीं होगा. एक ही वास्तविकता होगी कि हम सब गर्व से एक झंडे के नीचे खड़े होंगे, इस तथ्य से बेखौफ कि हम क्या हैं. मेरी तरह हर भारतीय फॉर्म भर-भरकर तंग आ गया है. श्रेणियों में बांटे जाने से ऊब गया है. हमारी भाषा क्या है, समुदाय क्या है, कितनी बार विदेश जाते हैं और क्यों? हम भारतीय हैं, क्या इतना पर्याप्त नहीं है?

15.05.2015, 19.59 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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