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अव्यवहारिक है मप्र विशिष्ठजन कानून

विचार

 

अव्यवहारिक है मप्र विशिष्ठजन कानून

रघु ठाकुर


मध्यप्रदेश सरकार ने पिछले दिनों अतिविशिष्टजनों को सताने का विरोधी कानून बनाने की तैयारी की. इस कानून का प्रारूप म.प्र. मंत्रीमंडल ने 18 मार्च 2015 को स्वीकृत कर दिया तथा संभावना है कि आगामी विधानसभा सत्र में इसे प्रस्तुत कर पारित किया जायेगा.

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मध्यप्रदेश सरकार ने पिछले दिनों अतिविशिष्टजनों को सताने का विरोधी कानून बनाने की तैयारी की. इस कानून का प्रारूप म.प्र. मंत्रीमंडल ने 18 मार्च 2015 को स्वीकृत कर दिया तथा संभावना है कि आगामी विधानसभा सत्र में इसे प्रस्तुत कर पारित किया जायेगा.

यह अपने आप में आश्चर्यजनक है कि व्यवस्था की नजरों में जो अतिविशिष्टजन है उन्हें कोई सामान्य व्यक्ति सता सकता है. हमारे देश में हमारी सरकारें और व्यवस्था विशिष्टजन परक है. यह सारा तंत्र इन विशिष्टजनों के लिए समर्पित रहता है, नतमस्तक रहता है. और कायदे कानून को उनके लिए ताक पर रख देता है. ऐसी घटनाओं के हम लोग अमूमन भुक्तभोगी भी होते है.

दरअसल हमारे देश में जो प्रशासनिक ढांचा बना है वह ब्रिट्रिश प्रशासनिक ढांचे की ही नकल है और चूंकि भारत में अंग्रेज साम्राज्यवादी शासक थे अतः उन्होंने अपने हुकूमती आतंक और विशिष्टता को प्रदर्शित करने के लिए यह अतिविशिष्ट संस्कृति शुरू की थी. जो ब्रिट्रिश प्रधानमंत्री ब्रिटेªन में सामान्यजनों में से एक निर्वाचित प्रशासनिक मुखिया होता था वही और उसके अफसरान भारत आकर अतिविशिष्ट या विशिष्टतम नये विदेशी राजे-महराजे जैसे बन जाते थे. और इसलिए जब इस “अतिविशिष्टजनों को सताने के विरूद्ध कानून“ के निर्माण का समाचार पड़ा तो प्रतिहिंसात्मक सुकुन मिश्रित आश्चर्य हुआ.

इस कानून के माध्यम से अतिविशिष्टजनों को सूचना के अधिकार से मुक्ति दी गयी है. और ये अतिविशिष्टजन कौन है? इसकी पहचान तो सत्ता व्यवस्था ही करेगी? यह प्रश्न भी सामयिक पर निरूत्तरित है कि इन विशिष्टजनों को किसी सूचना से देने से क्यों परहेज है या आपत्ति है? बल्कि इन्हें तो स्वतः होकर सूचना देने आगे आना चाहिए. परन्तु अगर वे वांछित सूचना नहीं देना चाहते तो क्या इसका अर्थ यह नहीं है कि उनके पास छिपाने को बहुत कुछ है- बताने को कम. सूचना के अधिकार को सीमित व नियंत्रित कर पंगु बनाने के लिए इस कानून के प्रावधान व उनके लिए निम्नानुसार तर्क दिये गये है - जिस पर चर्चा जरूरी है.

1. कहा गया है कि एक ही जानकारी बार बार मांग कर तंग किया जाता है. परन्तु इस छोटी सी समस्या के लिए किसी पृथक कानून की क्या आवश्यकता है. यह तो चीटी को मारने के लिए हाथी दौडा़ना है. सूचना के अधिकार में यह संशोधन या नियमों में यह संशोधन हो सकता था कि, एक ही जानकारी एक ही अधिकारी से उसी अवधि के लिए दुबारा नहीं मांगी जायेगी. अगर कोई ऐसा करता है (हालांकि कोई व्यक्ति बार बार पैसे व कागज क्यों खर्च करेगा.) तो उसे कुछ आर्थिक दण्ड दिये जाने का प्रावधान बनाया जा सकता था.

अगर कोई किसी को ब्लेकमेल करने या आपराधिक भावना से इस कानून का प्रयोग करता सिद्ध हो तो उसे सूचना का अधिकार आयोग समुचित जांच के पश्चात् ब्लेक लिस्टेड किया जा सकता था. परन्तु इस कानून बनाने वालो की भावना ही दूषित व विषाक्त है. वे तो अपने काले कारनामों पर या अवैधानिक कार्यों पर पर्दा डालने के लिए सूचना के अधिकार को सीमित कर रोकना चाहते है. मैं अपने स्वतः के कुछ अनुभव रखना चाहूंगा कि तंत्र किस प्रकार जानकारियों को छिपाता टालता व दोषमुक्त होना चाहता है, उसका अनुभव हो सके.

अ- दिल्ली में निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन से दिल्ली मथुरा मार्ग को जोड़ने वाली सड़क बहुत पुरानी है. इस सड़क के आजू बाजू निजामुद्दीन ईस्ट आवासीय कालोनी विकसित हुई है. जिसमें अनेकों पूर्व मुख्यमंत्रियों के व अफसरशाहों के मकान है. कुछ दिनों पूर्व इस सड़़क के ऊपर एक बेरियर लग गया जिस पर लिखा हुआ है कि डी.सी.पी. के आदेशानुसार. तथा रात्रि 8.00 बजे से सुबह 6.00 तक के इस सड़क को आम जनता को बंद कर दिया गया. अब नई दिल्ली तरफ से निजामुद्दीन स्टेशन जाने वालो को दो तीन कि.मी. का चक्कर काटकर जाना होता है. मैंने के सूचना के अधिकार के अन्तर्गत जानकारी चाही कि यह सड़क किस विभाग की है तथा किस अधिकारी के आदेश से यह बेरियर लगाया गया. लोक निर्माण विभाग- पुलिस विभाग तथा अन्य कई विभागों से मेरे पास निरन्तर अनेकों रजिस्टर्ड पत्र आये कि आपके द्वारा मांगी गई जानकारी हेतु उक्त पत्र किसी अन्य विभाग को भेज दिया है. और कुल मिलाकर शासन याने जनता का 400-500 रूपया रजिस्टर्ड डाक पर खर्च करने के बाद भी मुझे यह जानकारी नहीं मिल पाई. अब जरा सोचे कि इस सूचना से किस अधिकारी को खतरा था.

ब- एक साथी प्रो. बद्री प्रसाद ने सूचना के अधिकार में जिला दण्डाधिकारी सागर से सूचना मांगी थी कि श्री रघु ठाकुर को किस तिथि को मीसा में गिरफ्तार किया गया और उन्हें कब रिहा किया गया. जिला दण्डाधिकारी कार्यालय ने सागर जिले से प्राप्त सूचना के आधार पर निर्धारित अवधि के निकल जाने के बाद जानकारी दी कि श्री रघु ठाकुर 25.06.1975 की रात्रि गिरफ्तार किये गये तथा 28.06.1975 को जबलपुर जेल भेजे गये. परन्तु मैं कब कहां से रिहा हुआ ये जानकारी नहीं दी गयी. जबकि मैं 1977 में लगभग 21 माह बाद इन्दौर जेल से रिहा हुआ था.

इस अपूर्ण जानकारी देने के विरूद्ध डॉ. बद्रीप्रसाद ने राज्य सूचना आयोग की अपील की. परन्तु वहां से भी कोई विशिष्ट निर्देश व अपूर्ण जानकारी देने के लिए जिला दण्डाधिकारी पर कोई शास्ति नहीं लगायी गई. आखिर अधिकारियों को इस जानकारी छिपाने का क्या औचित्य था? क्या इसलिए कि राज्य के सत्ताधीशों के अलिखित आदेश उन अधिकारियों को थे कि संघ के या भाजपा के मीसाबंदियों को छोड़कर अन्यों को प्रमाणपत्र न दिये जाये ताकि वे कोई सम्मान निधि आदि के लिए कोई आवेदन न कर सके. इन्दौर-गुना आदि में ऐसा हुआ है.

स- छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले के नगरी सिहावा क्षेत्र में लंबे समय से आदिवासी जमीन के पट्टे को लेकर लड़ रहे है. यह अब तीसरी पीढ़ी है जो आन्दोलन में है इस आन्देालन की शुरूआत समाजवादी नेता स्व. डॉ. राममनोहर लोहिया ने की थी. मैंने मुख्यमंत्री छत्तीसगढ़ को जो इस आन्दोलन के बारे में स्वतः जानते है लिखा तथा उनके कार्यालय के नौकर तथा अधिकारियों से जानकारी मांगी गई तो धमतरी के वर्तमान अधिकारियों ने न केवल झूठी जानकारी दी बल्कि एक अधिकारी ने तो मुझे ही आदतन शिकायत करने वाला बता दिया.

जब मैंने मुख्यमंत्री जी को इस अधिकारी के झूठ के बारे में लिखा तथा उनकी जानकारी में 1985 का म.प्र. सरकार व आन्दोलन कारियों के बीच के लिखित समझौते की प्रति भेजी तब भी मुख्यमंत्री जी ने बजाये इसके की उक्त अधिकारी के विरूद्ध कोई कार्यवाही करते स्वतः चुप्पी साध गये.

द- एक बार म.प्र. के सेवानिवृत डी.जी.पी. श्री एस.के. राउत जब पद पर थे तो सागर प्रवास पर किसी डकैती के जांच के लिए पहुंचे थे. उनके आगमन के पूर्व स्थानीय पुलिस ने लगभग 1 घंटे पूर्व से सड़को पर यातायात बंद कर दिया. मैं उस दिन सागर से भोपाल के लिए बस से यात्रा कर रहा था. मैं न केवल स्वतः इस सड़क बंदी का शिकार हुआ बल्कि मैंने सैकड़ो वाहनों की कतार सड़क पर लगी देखी.

मैंने इस घटना को लेकर मानव अधिकार आयोग को शिकायत की परन्तु आयोग की प्राथमिकता भी मीडिया प्रचारित समाचारों में ही ज्यादा होती है तथा उन्होंने बगैर किसी पूछताछ के ही केवल पुलिस रपट के आधार पर सूचना भेज दी कि शिकायत सही नहीं पाई गयी. मैंने आयोग को पुनः लिखा कि मैं स्वतः शिकायत करता हूं, मुझसे कोई पूछताछ नहीं हुई, तो आप कैसे कह सकते है कि शिकायत गलत पाई गयी. परन्तु आयोग ने चुप्पी साध ली.

जब आयोग जैसी संस्थायें जो कि एक अर्थों में स्वतंत्र मानी जाती है तथा जिनके गठन का उद्देश्य भी सरकारों को नियंत्रित करने वा कानून का पालन कराना है अगर विशिष्टजनों से इतनी प्रवाहित होती है तो सामान्यजन का क्या होगा? दरअसल पिछले दिनों सूचना के अधिकारियों के माध्यम से कई बड़े खुलासे हुए है जिन्होंने सरकारों पर भी प्रवाह डाला हैं तथा देश के अतिविशिष्टजनों के संबंधी सूचनायें या उनके कारनामों की सूचना आमजन तक पहुंची है. इसीलिए अतिविशिष्टजनों के नाम से स्वतः को भी सुरक्षित करने का यह नया कवच रूपी कानून नौकरशाही ने तैयार
कर दिया. हमारे देश के सत्ताधीश कितने कमजोर होते है इसका भी प्रमाण इस कानून की स्वीकृति से मिल जाता है.

दरअसल यह कानून सत्ताधीशों एवं नौकरशाहों को उनके अपराधों व त्रुटियों से बचाने के लिए है तथा आम आदमी को सताने के लिए है जिसका यह अधिकार होता है कि वह देश के सत्ता व प्रशासन तंत्रों के निर्णयों, उनके औचित्य की जानकारी पा सके. यह पारदर्शिता के सिद्धांत को निष्क्रिय व निष्प्रभावी बनाने के लिए है. अभी तक सत्ता व प्रशासन का शरीर सुरक्षा कवच में था अब उनके कारनामे भी सुरक्षा कवच में सुरक्षित हो जायेगे. यह कानून अदालतों के अधिकारों को भी सीमित करने वाला है तथा इस कानून के बारे में जो जानकारियां प्राप्त हुई है उनके अनुसार यह अदालतों को भी सुनवाई के अधिकार से वंचित कर देगा. अदालतों की स्वतंत्रता व सार्वभौमिकता संविधान ने तय की है.

हाईकोर्ट - सुप्रीमकोर्ट को अपने कार्य हेतु संपूर्ण अधिकार है. परन्तु इस कानून के माध्यम से सरकार ने न्यायपालिका के हाथ बांधने का भी प्रयास किया है. जिस प्रकार आपातकाल में तत्कालीन सरकार ने न्यायपालिका के सुनवाई के अधिकारों को निलंबित कर असंवैधानिक कदम उठाया था लगभग उसी तर्ज पर इस कानून की भी मंशा है.

यह कानून पारित हो सकेगा या नहीं न्यायपालिका अपने अधिकारों पर होने वाले इस हमले को किस रूप में लेगी. यह तो कहना अभी संभव नहीं है परन्तु इस कानून को बनाने की प्रक्रिया व हडबड़ी ने म.प्र. सरकार की चर्चित घोटालों में भागीदारी के संदेह को और अधिक विश्वसनीय व तार्किक बना दिया है.

21.05.2015, 19.39 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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