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मोदी सरकार का एक साल

विचार

 

मोदी सरकार का एक साल

रघु ठाकुर


श्री नरेन्द्र मोदी जी की सरकार का एक वर्ष पूरा हो चुका है और लगभग देश के सभी समाचार पत्रों में उनके कार्यकाल की समीक्षा हो रही है. कतिपय समाचार पत्रों ने तो उनके कामकाज पर सर्वेक्षण करके उसके परिणाम भी छापे है, और लगभग अधिकांश ने उन्हें अभी, अगर सफल भी नही तो असफल नहीं माना है.

नरेंद्र मोदी


जो सर्वेक्षण हुये है, उनके बारे में कुछ कहना समय की बरबादी है क्योंकि सर्वेक्षण करने वाले लोगों ने किन लोगों से सवाल पॅूछे हैं यह महत्वपूर्ण है. आज भी देश की 80 फीसदी आवादी जिसमें गॉव का किसान मजदूर शामिल है, इन्टरनेट और उच्च संचार तकनीक से अभ्यस्त उपभोक्ता नहीं है. अमूमन यह देखने में आया है कि ऐसे सर्वेक्षण शहरी, महानगरीय और उच्च मध्यम वर्गीय व्यक्तियों से ही होते है.

श्री नरेन्द्र मोदी जी का प्रधानमंत्री चुना जाना मतदान करने वाले मतदाताओं के बहुमत का समर्थन था, और भिन्न-भिन्न कारणों से इन लोगो ने श्री नरेन्द्र मोदी में अपनी-अपनी कल्पना के अनुसार उपयुक्त व्यक्ति देखा था. देश के हिन्दू मानस के लिये मोदी एक बहादुर प्रधानमंत्री थे जो आंतकवाद का सफाया कर सकते थे, कार्पोरेट जगत के लिये श्री मोदी एक ऐसे दुःसाहसी प्रधानमंत्री थे, जो क्रूरतापूर्वक उनके हितांे की पूर्ति कर सकते है, पिछड़ी जातियों के लिये वे अपने बीच के आदमी थे जो अति पिछड़ी जातियों के लिये विशेष स्वीकार्य ऐसी सब अपेक्षाओं के माध्यम से श्री मोदी एक विकास पुरुष के रुप में जनमत द्वारा चुने गये थे.

अपने कार्यकाल के प्रारम्भ में उन्होंने कुछ ठीक बातें कही थी. उन्होंने प्रधानमंत्री बनते ही पहले सम्बोधन में गांधी, लोहिया, का नाम लिया, तथा सबका साथ लेने की बात कह कर अपने ऊपर गुजरात में मुख्यमंत्री के पद के दौरान लगे दागों को धोने का प्रयास किया था. प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने कुछ अच्छे कार्यक्रम घोषित किये जैसे सफाई अभियान (स्वच्छ भारत ), नदियों और गंगा की सफाई, जनधन योजना, प्रधानमंत्री बीमा योजना, अटल पेंशन योजना, आदि.

मोदी जी ने बंगलादेश के साथ परस्पर भूमि का आदान-प्रदान कर भूमि विवाद को हल करने की पहल की तथा योजना आयोग को जो वैश्वीकरण का केन्द्र बन गया था को समाप्त करने का काम किया. शासकीय अनुदान भी सीधे आधार के माध्यम से उपभोक्ताओं के खातों में पहॅुचाने का प्रयास किया. उन्होंने साइकिल के उपयोग की भी चर्चा की तथा अपने मन की बात में नशे के बारे में चिंता जाहिर की.

परन्तु एक कार्पोरेट की सेवा को छोड़कर उन्होंने इन अच्छी बातों को अन्जाम तक पहॅुचाने का प्रयास नहीं किया. जो पहला बजट उनकी सरकार ने पारित किया उसमें उन्होंने षिक्षा के क्षेत्र में आबंटन में भारी कमी कर दी तथा चिकित्सा जैसे क्षेत्र में भी उनसठ सौ करोड़ राषि की कमी कर दी. जबकि षिक्षा और चिकित्सा दोनों क्षेत्र ज्यादा धन की जरुरत वाले क्षेत्र थे. यह एक प्रकार से शिक्षा और चिकित्सा के निजीकरण को और आगे ले जाने वाला निर्णय था. यूपीए सरकार के जमाने में कार्पोरेट को औसतन पांच लाख करोड़ रुपयों के टैक्स की छूट दी गई थी, जिसे उन्होंने बढ़ाकर छः लाख करोड़ रुपये कर दिया.

लोगों को उम्मीद थी, कि मोदी सरकार महंगाई को कम करेगी और अच्छे दिन लायेगी परन्तु सरकार बनते ही रेल भाड़ा एक मुश्त 14 प्रतिशत बढ़ा दिया, प्लेटफार्म टिकिट 10 रुपये कर दिया और बाजार को लूट के लिये खुला छोड़ दिया. आज हालात यह है कि अरहर की दाल का दाम 130 रुपये किलो तक पहॅुच गया है, याने दाल के दामों में लगभग 100 % की वृद्धि हुई. यह और भी दुःखद है, कि सरकारी आंकड़े कहते है कि मंहगाई घट गई है इसका मतलब है कि सरकार के तंत्र और जनता की सच्चाई के बीच कोई सम्बध नहीं है.

मोदी सरकार ने रेल को आम आदमी की रेल सेवा मानने के बजाय उसे विशिष्ट और उच्च तबके का ही माध्यम मान लिया. 45 हजार यात्री कोच की कमी को पूरा करने की बजाय वे चीन और जापान से कर्ज लेकर बुलेट ट्रेन चलाना चाहते है. विदेशी पूंजी निवेशक की मृग मरीचिका में इतने फॅसे हैं, कि उनके अपने कामों के परिणामों को भी वे न देख पा रहे है, और न ही विशेष ध्यान दे पा रहे है. जनधन योजना के अन्तर्गत जो कई करोड़ खाते देश में खुले व बगैर किसी बाध्यता के गरीब लोगो ने अपनी स्वेच्छा से लगभग 11 हजार करोड़ रुपया बमुश्किल 5-6 माह में ही जमा कर दिया.

अगर वे अपने ही इस काम का अध्ययन करते तेा वे समझ सकते थे कि उन्हें विदेशी पूंजी निवेश के पीछे भागने की कोई आवष्यकता ही नहीं है, बल्कि अपने ही देश की पूंजी से भारत का निर्माण हो सकता है. परन्तु उन्होंने बीमा के क्षेत्र में निवेश की सीमा बढ़ा कर 49% कर दी स्टील अथारिटी ऑफ इण्डिया (सेल) के 5% सरकारी अंश पूंजी को बेचने का फैसला किया. भूमि अधिग्रहण अध्यादेश लाकर उन्होंने किसानों की जमीनों को कार्पोरेट को देने का मार्ग अपनाया और कार्पोरेट की सेवा में इतनी तत्परता दिखाई कि संसदीय परम्पराओं को भी नहीं माना यह जानते हुये भी कि राज्य सभा में उनका बहुमत नहीं है तथा भूमि अधिग्रहण अध्यादेश वे पारित नहीं कर सकेगें उन्होंने जिस संसद की सीढ़़ी पर लोकतंत्र का मंदिर कह कर माथा टेका था उसी मंदिर को ठोकर मारकर अपमानित किया.
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