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असली रूप में लौट रहा बाज़ार

विचार

 

नफरत फैलाने का साल

राम पुनियानी


नरेन्द्र मोदी के सत्ता में आते ही मानों आरएसएस के सभी संगी-साथियों को धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ नफरत फैलाने का लाईसेंस मिल गया है. जहर उगलने के इस अभियान का उद्देश्य सांप्रदायिक धु्रवीकरण को बनाये रखना है.

योगी आदित्यनाथ


एमआईएम के अकबरुद्दीन ओवेसी का घृणा फैलाने वाला भाषण निश्चित तौर पर घिनौना था और इस साल जनवरी में उनकी गिरफ्तारी के बाद अगर उन्हें 40 दिन जेल में बिताने पड़े तो यह बिलकुल ठीक हुआ. उनपर मुकदमा चलना चाहिए और उन्हें कानून के अनुसार सजा मिलनी चाहिए. परन्तु प्रवीण तोगड़िया, सुब्रमण्यम स्वामी, गिरिराज सिंह, साध्वी निरंजन ज्योति, साध्वी प्राची, साक्षी महाराज, योगी आदित्यनाथ, संजय राउत आदि का क्या, जिन्होंने सार्वजनिक मंचों से निहायत बेहूदा, कुत्सित और गैर-जिम्मेदाराना टिप्पणियां की हैं? क्या ओवेसी की तरह उन्हें भी गिरफ्तार नहीं किया जाना चाहिए था?

हिन्दुओं के स्व-घोषित दक्षिणपंथी रक्षक आरएसएस से जुड़े संगठनों के अलावा, अन्य कई व्यक्ति भी समाज को बांटने वाली बातें कह रहे हैं और सांप्रदायिक तनाव को हवा दे रहे है. उनकी हिम्मत बढ़ गयी है क्योंकि वे जानते हैं कि अब सैयां कोतवाल बन गए हैं और उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता. उन्होंने धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ नफरत फैलाने का अभियान और तेज कर दिया है.

सर्वविदित है कि मोदी सरकार के सत्ता में आने के पहले से ही, भाजपा के साथियों-सहयोगियों ने लवजिहाद और घरवापसी जैसे मुद्दों को उछाल कर माहौल गर्म करना शुरु कर दिया था. और यह अभियान चुनाव में मोदी की जीत के बाद भी अनवरत चलता रहा. मोदी के सत्ता सम्हालने के कुछ ही समय बाद, पुणे में मोहसिन शेख नामक एक मुस्लिम आईटी कर्मचारी की हिन्दू जागरण सेना के गुंडों ने सड़क पर पीट-पीट कर हत्या कर दी थी. यह घटना बाल ठाकरे और शिवाजी के रूपांतरित चित्र सोशल मीडिया पर अपलोड किये जाने के बाद हुई. दिल्ली व हरियाणा के अलावा, मुंबई के पास पनवेल और आगरा में चर्चों पर हमले हुए.

साक्षी महाराज ने न केवल यह कहा कि गोडसे देशभक्त था वरन् उन्होंने हिंदू महिलाओं को चार बच्चे पैदा करने की सलाह भी दे डाली क्योंकि उनके अनुसार, मुसलमानों की आबादी हिंदुओं से ज्यादा होने वाली है. साध्वी प्राची ने हिंदू महिलाओं को आठ बच्चे पैदा करने की सलाह दी. उन्होंने यह आह्वान भी किया कि आमिर खान, शाहरूख खान और सलमान खान जैसे मुसलमान फिल्मी सितारों का बहिष्कार किया जाना चाहिए. घृणा फैलाने वाले भाषण देने में प्रवीण तोगड़िया सबसे आगे हैं. उन पर इस सिलसिले में सबसे अधिक संख्या में प्रकरण दर्ज हैं.

भाजपा सासंद योगी आदित्यनाथ भी रूक-रूक कर जहर उगलते रहते हैं. उनका कहना है कि अगर लवजिहाद के अंतर्गत एक हिंदू लड़की को मुसलमान बनाया जाता है तो उसके बदले सौ मुसलमान लड़कियों को हिंदू बनाया जाना चाहिए. लवजिहाद के मुद्दे पर दुष्प्रचार जारी है और कई छोटे-बड़े नेता इसका इस्तेमाल समाज को बांटने के लिए करते आ रहे हैं. योगी आदित्यनाथ ने यह भी कहा कि मस्जिदों में सुअर पाले जाने चाहिए और यह भी कि मुसलमानों को हिंदू तीर्थस्थलों में प्रवेश नहीं मिलना चाहिए.

मोदी सरकार के दो मंत्रियों साध्वी निरंजन ज्योति और गिरिराज सिंह ने गैर-हिंदूओं और यूपीए की मुखिया सोनिया गांधी की त्वचा के रंग के संबंध में अत्यंत अपमानजनक और निंदनीय बातें कहीं. निरंजन ज्योति ने कहा कि सभी गैर-हिंदू हरामजादे हैं. गिरिराज सिंह ने चुनाव के पहले कहा था कि जो लोग मोदी को वोट नहीं देना चाहते उन्हें पाकिस्तान चले जाना चाहिए परंतु इसके बाद भी उन्हें मंत्री बनाया गया. उन्होंने सोनिया गांधी के बारे में भी नस्लीय टिप्पणियां कीं.

साक्षी महाराज भी गोडसे को देशभक्त मानते हैं और उनकी पार्टी के एक अन्य नेता केरल के गोपालकृष्णन का कहना है कि गोडसे को गांधी को निशाना बनाने की बजाए नेहरू को मारना था. यह बात उन्होंने आरएसएस के मुखपत्र ‘केसरी’ में अपने एक लेख में कही. भाजपा के वरिष्ठ नेताओं में से एक सुब्रमण्यम स्वामी ने कहा कि ईष्वर केवल मंदिरों में रहता है, मस्जिदों और चर्चों में नहीं. इस वक्तव्य के निहितार्थ कितने खतरनाक हैं, यह कहने की आवश्यकता नहीं है.

ये सारी टिप्पणियां केवल कुछ उदाहरण हैं उन भड़काऊ बातों की, उन अनावश्यक टिप्पणियों की जो मोदी सरकार के पहले वर्ष में जिम्मेदार पदों पर बैठे भाजपा और संघ के नेताओं ने कीं. कहने की आवश्यकता नहीं कि इनसे धार्मिक अल्पसंख्यकों के मन में डर और असुरक्षा का भाव बढ़ा. भाजपा के गठबंधन साथी शिवसेना के सांसद संजय राऊत ने तो मुसलमानों से मत देने का अधिकार ही छीन लेने की मांग की.

यह साफ है कि घृणा फैलाने वाले भाषण और वक्तव्य, विभाजनकारी राजनीति का कारण और प्रभाव दोनों हैं. वे समाज में व्याप्त गलत धारणाओं की अभिव्यक्ति हैं. उन बातों को खुल्लम-खुल्ला और भद्दे ढंग से कहा जा रहा है जिन्हें सांप्रदायिक पार्टियां हमेशा से दबेछुपे शब्दों में कहती आई हैं. ऐसा नहीं है कि ये सारी बातें अचानक हवा में से पैदा हुई हैं. उनकी जमीन, राजनैतिक दलों के एक हिस्से द्वारा लंबे समय से तैयार की जा रही थी.

भारत के मामले में घृणा फैलाने वाले भाषण व टिप्पणियां, धर्म व भाषा के नाम पर की जाने वाली राजनीति का अंग रही हैं. इनका इस्तेमाल हिंसा भड़काने के लिए भी किया जाता है और वोट पाने के लिए समाज का धार्मिक आधार पर धु्रवीकरण करने के लिए भी. हम सबको याद है कि राम मंदिर आंदोलन के दौरान, साध्वी रितंभरा अचानक उभर आई थीं. वे अपने प्रवचनों में अल्पसंख्यकों के संबंध में घोर अपमानजनक और भड़काऊ बातें करती थीं.

इसी तरह की बातें विहिप के कई साधु, सांप्रदायिक गैंग के छोटे-बड़े सदस्य, कुछ मुस्लिम फिरकापरस्त और तोगड़िया जैसे लोग भी करते रहे हैं. कई लोग ऐसी ही या इससे मिलती-जुलती बातों को मीठी चाष्नी में लपेटकर परोसते रहे हैं. अपने राजनैतिक कैरियर के शुरूआती दिनों में मोदी भी बांटने वाली बातें किया करते थे परंतु समय के साथ उनकी रणनीति बदलती गई. वे अत्यंत चतुर राजनीतिज्ञ हैं और उन्हें अच्छी तरह से पता है कि उन्हें कब, क्या कहना चाहिए. गुजरात में दंगों के बाद मुसलमानों के लिए जो शरणार्थी शिविर लगाए गए थे उन्हें मोदी ने बच्चे पैदा करने वाली फैक्ट्रियां बताया था. स्पष्टतः, वे इस गलत धारणा को हवा देने की कोशिश कर रहे थे कि मुस्लिम दंपत्तियों के हिंदुओं की तुलना में अधिक बच्चे होते हैं.

मुंबई में सन् 1992-93 के दंगों के दौरान, बाल ठाकरे भी अत्यंत भडकाऊ बातें किया करते थे और अपने शिवसैनिकों को मुसलमानों के विरूद्ध हिंसा करने के लिए उकसाते थे. वे भी इसलिए बच निकले क्योंकि वे अपनी जहरीली टिप्पणियों को बड़ी धूर्तता से प्रस्तुत करते थे और इसलिए भी क्योंकि हमारे देश के कानून इस तरह के हैं कि घृणा फैलाने वाली बातें कहने वाला यह तर्क देकर बच निकलता है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हर व्यक्ति का मूलाधिकार है.

यहां यह महत्वपूर्ण है कि हमें किसी समुदाय की निंदा करने और किसी राजनैतिक दल की निंदा करने में अंतर करना चाहिए. राजनैतिक दलों की आलोचना की जा सकती है और की जानी चाहिए परंतु किसी समुदाय विषेष का अपमान करना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं ठहराया जा सकता. दूसरे, कोई राजनैतिक संगठन, किसी धार्मिक समुदाय का प्रतिनिधि या रक्षक होने का दावा नहीं कर सकता.

यह सचमुच दुर्भाग्यपूर्ण और दुःखद है कि ‘दूसरे’ से घृणा करना सिखाने वाली विचारधारा और भाषण हमारी राजनीति का अंग बन गए हैं और किसी विषेष धार्मिक समुदाय को राष्ट्र-राज्य का पर्यायवाची बताना आम हो गया है. इस तरह की पहचान-आधारित राजनीति वो लोग करते हैं जो समाज का ध्यान मूल मुद्दों से भटकाना चाहते हैं.

भारत में नफरत फैलाने वाले भाषणों का सिलसिला एक ओर मुस्लिम लीग तो दूसरी और हिंदू महासभा और आरएसएस ने शुरू किया था. ये संगठन यह मानते थे कि राष्ट्र किसी एक धार्मिक समुदाय का है. धार्मिक राष्ट्रवाद एक संकीर्ण विचारधारा है और ‘दूसरों’ को राष्ट्र से बाहर धकेलना चाहती है. ये विष्वास, धीरे-धीरे दूसरे के प्रति घृणा में बदल जाते हैं. इसी घृणा के कारण स्वतंत्रता के पहले और पिछले दो दशकों में देश में भयावह दंगे हुए हैं.

भाजपा और संघ से जुड़े नेताओं द्वारा भड़काऊ बातें कहने पर पार्टी के अधिकृत प्रवक्ताओं की एक ही प्रतिक्रिया होती है और वह यह कि ये संबंधित व्यक्तियों के ‘व्यक्तिगत’ विचार हैं. भाजपा के पास अपने बचाव का एक दूसरा रास्ता यह है कि वह दावा करती है कि विहिप, वनवासी कल्याण आश्रम व बजरंग दल जैसे संगठन स्वायत्त और स्वाधीन हैं और उन पर उसका कोई नियंत्रण नहीं है.

सच यह है कि ये सभी संगठन आरएसएस द्वारा नियंत्रित संघ परिवार का भाग हैं और ये सभी भाजपा के साथ मिलकर संघ के हिंदू राष्ट्र के एजेंडे को साकार करने में जुटे हुए हैं. इन सब की कथनी और करनी का एक ही उद्देश्य है. कई लोग यह कहते हैं कि ये संगठन अतिवादी हैं जबकि सच यह है कि आरएसएस ने इन सब संगठनों को अलग-अलग जिम्मेदारियां दे रखी हैं जिन्हें वे पूरी प्रतिबद्धता से निभाते हैं. मोदी सरकार के आने के बाद से इन संगठनों की आक्रामकता में तेजी से बढ़ोत्तरी हुई है.

05.06.2015 10.30 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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