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विभूतियों पर कब्जा करने की कवायद

विचार

 

विभूतियों पर कब्जा करने की कवायद

राम पुनियानी


पिछले कुछ वर्षों से, राजनैतिक और सामाजिक स्तरों पर कुछ राष्ट्रीय विभूतियों का महिमामंडन करने और कुछ का कद घटाने के सघन प्रयास हुए हैं. भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन के पिछले शासनकाल (1998-2004) में संसद परिसर में सावरकर के तैलचित्र का अनावरण किया गया था.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ


कुछ विभूतियों की भूमिका को बढ़ाचढ़ा कर प्रस्तुत करने और कुछ की छवि बिगाड़ने के खेल में आरएसएस पुराना उस्ताद है, यद्यपि अन्य राजनैतिक समूह भी ऐसा करते रहे हैं. संघ की मशीनरी, कुछ नेताओं का महिमामंडन, कुछ को नजरअंदाज करने और कुछ को बदनाम करने का काम दशकों से करती आई है.

मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से संघ परिवार के कई सदस्य महात्मा गाँधी के हत्यारे गोडसे की खुलकर तारीफ कर रहे हैं. एक भाजपा सांसद ने गोडसे को देशभक्त बताया तो दूसरे ने फरमाया कि गोडसे ने गलत व्यक्ति को निशाना बनाया था. उसे नेहरु की हत्या करनी चाहिए थी. कई लोगों ने माँग की है कि अलग-अलग स्थानों पर गोडसे की मूर्तियाँ स्थापित करने के लिए जमीन आवंटित की जाए.

सरदार पटेल को नेहरु के प्रतिद्वंद्वी के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है. अपने एक भाषण में मोदी ने कहा कि नेहरु की जगह पटेल को देश का पहला प्रधानमंत्री होना चाहिए था. नेहरु को कलंकित करने का मानों अभियान-सा छेड़ दिया गया है. हाल में, नेहरु को संकुचित मनोवृत्ति वाले व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत करने के लिए मोदी ने एक ऐसी बात कही जो कि सच नहीं है. उन्होंने कहा कि नेहरु, सरदार पटेल के अंतिम संस्कार में नहीं गए थे. तथ्य यह है कि नेहरू ने पटेल के अंतिम संस्कार, जो कि मुंबई में हुआ था, में भाग लिया था.

जहाँ तक गांधीजी का सवाल है, उन्हें केवल साफ-सफाई के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है. महात्मा गाँधी का कद इतना ऊंचा है कि उनके समावेशी राष्ट्रवाद में विश्वास न करने वाले भी उन्हें श्रद्धा और सम्मान की दृष्टि से देखते हैं. भारत ही नहीं वरन पूरी दुनिया में बापू श्रद्धा के पात्र हैं. अब चूँकि गांधीजी के कद को कम करना संघ परिवार के बस की बात नहीं है इसलिए उनके हिन्दू-मुस्लिम एकता के सन्देश को दरकिनार कर, राष्ट्रीय एकता की उनकी सीख को भुलाकर, उन्हें केवल स्वच्छता अभियान का शुभंकर बना दिया गया है.

अब संघ परिवार अम्बेडकर पर कब्जा करने की जुगत में है. यह कहा जा रहा है कि अम्बेडकर और आरएसएस के संस्थापक हेडगेवार की आस्था एक-से मूल्यों में थी. उदाहरण के लिए, दोनों अस्पृश्यता के खिलाफ थे. आरएसएस के अंग्रेजी और हिंदी मुखपत्र क्रमषः ‘‘आर्गनाइजर’’ व ‘‘पाञ्चजन्य’’ ने अंबेडकर पर केंद्रित विषेष परिशिष्ट निकाले, जिनमें उनकी शिक्षाओं को इस तरह से तोड़मरोड़ कर प्रस्तुत किया गया जिससे ऐसा प्रतीत होता है कि आरएसएस की हिंदुत्व की विचारधारा और अंबेडकर के मूल्यों में अनेक समानताएं हैं.

अंबेडकर ने सामाजिक न्याय और प्रजातांत्रिक मूल्यों की स्थापना में महत्वपूर्ण योगदान तो दिया ही था, उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि थी जाति के उन्मूलन के लिए उनका संघर्ष. यहां यह याद रखना समीचीन होगा कि जहां अंबेडकर जाति के उन्मूलन की बात कहते थे, वहीं संघ ने ‘सामाजिक समरसता मंच‘ की स्थापना की है, जो विभिन्न जातियों के बीच ‘समरसता‘ के लिए काम करता है. यह संस्था जाति की अवधारणा को चुनौती नहीं देती और ना ही जाति के उन्मूलन की बात करती है, जो कि अंबेडकर के प्रिय लक्ष्य थे.

संघ परिवार जो कवायद कर रहा है, उसके दो स्पष्ट उद्देष्य हैं. चूंकि आरएसएस ने कभी देश की स्वाधीनता की लड़ाई में हिस्सेदारी नहीं की इसलिए उसके पास खुद का कोई स्वाधीनता संग्राम सेनानी है ही नहीं. यही कारण है कि उसे सावरकर के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी होने के मिथक को गढ़ना पड़ा. सावरकर ने अपने जीवन के शुरूआती दौर में ब्रिटिश शासन के खिलाफ काम किया था परंतु अंडमान के सेल्युलर जेल में कुछ दिन सजा काटने के बाद वे ब्रिटिश-विरोधी क्रांतिकारी की जगह अंग्रेज सरकार के समर्थक बन गए.

सावरकर ने ब्रिटिश सरकार से लिखित माफी मांगी और फिर कभी किसी ब्रिटिश-विरोधी आंदोलन में हिस्सा नहीं लिया. आरएसएस का सावरकर के सिवा ऐसा कोई भी नेता नहीं है, जिसने अंग्रेजों का तनिक भी विरोध किया हो. वैसे तो सावरकर भी आरएसएस के सदस्य नहीं थे यद्यपि उनका और संघ का उद्देष्य एक ही था-हिंदू राष्ट्र की स्थापना.
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