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मुस्लिम नेताओं से बातचीत का मायाजाल

मुद्दा

 

मुस्लिम नेताओं से बातचीत का मायाजाल

राम पुनियानी


लगभग एक सप्ताह पहले, नरेन्द्र मोदी ने विभिन्न मुस्लिम समूहों के लगभग 30 प्रतिनिधियों से बातचीत की. यद्यपि इस सम्बन्ध में विस्तृत जानकारी उपलब्ध नहीं है तथापि कहा जाता है कि मोदी ने इन नेताओं से कहा कि वे उनके लिए हमेशा उपलब्ध हैं. “आप लोग आधी रात को भी मेरा दरवाजा खटखटा सकते हैं”, उन्होंने कहा. जो मुस्लिम नेता मोदी से मिले, उनमें से कई आरआरएस के नजदीक हैं और संघ द्वारा स्थापित ‘मुस्लिम राष्ट्रीय मंच’ से जुड़े हुए हैं. इस बैठक का खूब प्रचार हुआ परन्तु यह मोदी की अल्पसंख्यक समुदाय के नेताओं के साथ पहली मुलाकात नहीं थी. 

modi


सवाल यह है कि यह संवाद केवल एक दिखावा था या मुस्लिम समुदाय की समस्याओं को सुलझाने का संजीदा प्रयास. क्या मोदी के शब्दों को गंभीरता से लिया जा सकता है? क्या वे सचमुच देश के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय की बेहतरी के बारे में चिंतित हैं? क्या वे देश की बहुवादी संस्कृति की रक्षा करना चाहते हैं? मुस्लिम समुदाय में भी कई ऐसे नेता हैं जो पुराने अनुभवों को भुला कर एक नयी शुरुआत, एक नया संवाद शुरू करना चाहते हैं. क्या यह संभव है?

मोदी, आरएसएस के प्रशिक्षित प्रचारक हैं, जिन्हें डेप्युटेशन पर भाजपा में भेजा गया है. उनकी विचारधारा क्या है, वे यह कई बार साफ कर चुके हैं. लोकसभा के 2014 चुनाव के प्रचार के दौरान उन्होंने कहा था कि वे जन्म से हिन्दू हैं और राष्ट्रवादी हैं, इसलिए वे हिन्दू राष्ट्रवादी हैं! वे समय-समय पर आरएसएस के मुखिया से विचार-विनिमय करते रहते हैं. कहने की आवश्यकता नहीं कि दोनों के बीच कुछ मामूली मतभेदों के बावजूद, संघ ही भाजपा की नीतियों का अंतिम निर्धारक है.

गुजरात के मुख्यमंत्री बतौर, मोदी ने उनकी राजनीति की प्रकृति एकदम स्पष्ट कर दी थी. उनके मुख्यमंत्रित्वकाल में गुजरात को ‘हिन्दू राष्ट्र की प्रयोगशाला’ कहा जाता था. उन्होंने गुजरात कत्लेआम को औचित्यपूर्ण ठहराने के लिए न्यूटन के ‘क्रिया-प्रतिक्रिया’ के गतिकी के तीसरे नियम का हवाला दिया था. दंगों के बाद पीड़ितों के लिए स्थापित राहत शिविरों को बहुत जल्दी बंद कर दिया गया और मोदी ने उन्हें ‘बच्चे पैदा करने वाली फैक्ट्रियां’ बताया था.

दंगों के फलस्वरूप, गुजरात के समाज का सांप्रदायिक आधार पर जो धु्रवीकरण हुआ, उसकी मदद से मोदी ने लगातार तीन चुनावों में विजय हासिल की. दंगों के घाव भरने और दोनों समुदायों के बीच सौहार्द कायम करने की इस बीच कोई कोशिश नहीं हुई. अल्पसंख्यक अपने मोहल्लों में सिमटते गए. अहमदाबाद का मुस्लिम-बहुल जुहापुरा इलाका, मोदी की बाँटनेवाली राजनीति का प्रतीक है.

इन दंगों में जिन लोगों ने निर्दोषों का खून बहाया था उन्हें महत्वपूर्ण पदों से नवाजा गया. मायाबेन कोडनानी को मंत्री पद मिला. उस दौर में फर्जी मुठभेड़ें आम थीं और इन्हें अंजाम देने वाले, सत्ता के गलियारों में सम्मान की दृष्टि से देखे जाते थे. धीरे-धीरे मोदी ने अपनी भाशा और अपने शब्दों को “स्वीकार्य” स्वरुप देना शुरू किया. वे हिंदुत्व के जिस अतिवादी संस्करण के प्रणेता थे, उसे “मोदित्व’ कहा जाने लगा.

सन 2014 के लोकसभा चुनावों के दौरान, एक ओर तो वे विकास की बातें करते रहे तो दूसरी ओर बड़ी चतुराई से सांप्रदायिक सन्देश भी देते रहे. उन्होंने बीफ के निर्यात की निंदा की और उसे “पिंक रेवोल्यूशन’ बताया. इसका उद्देश्य मुस्लिम अल्पसंख्यकों को बीफ से जोड़ना था. उन्होंने यह आरोप भी लगाया कि असम की सरकार, बांग्लादेशी घुसपैठियों को बसाहट के लिए वहां पाए जाने वाले एक सींग वाले गेंडों को मार रही है. यह बांग्लाभाषी मुसलमानों पर हमला था.

उन्होंने यह भी कहा कि बांग्लाभाषी मुसलमानों को 16 मई को - जिस दिन वे देश के प्रधानमंत्री बन जायेंगे - अपना बोरिया-बिस्तर लपेटने के लिए तैयार रहना चाहिए. यह साम्प्रदायिकता फैलाने का खुल्लमखुल्ला प्रयास था. भाजपा के प्रवक्ता लगातार यह कहते रहे हैं कि बांग्लाभाषी हिन्दू शरणार्थी हैं और मुसलमान, घुसपैठिये. सन् 2014 का चुनाव अभियान मोदी के नेतृत्व में चलाया गया था. उनके चेले अमित शाह ने मुजफ्फरनगर का ‘बदला’ लेने की बात कही तो गिरिराज सिंह ने फरमाया कि जो मोदी के विरोधी हैं, उन्हें पाकिस्तान चले जाना चाहिए.

आरएसएस ने पिछले (2014) चुनावों में अपनी पूरी ताकत झोंक दी ताकि प्रचारक मोदी प्रधानमंत्री बन सकें. सत्ता में आने के बाद, परोक्ष व अपरोक्ष ढंग से ऐसे कई सन्देश दिए गए जिनसे विभाजनकारी राष्ट्रीयता के प्रति उनकी प्रतिबद्धता जाहिर होती थी. आरएसएस से सम्बद्ध विभिन्न संगठन, जो अलग-अलग तरीकों और रास्तों से संघ के लक्ष्यों को हासिल करने के लिए काम करते हैं, आक्रामक होने लगे और उनकी गतिविधियों में तेजी आई. चर्चों और मस्जिदों पर हमले बढ़ने लगे.

दक्षिणपंथी ताकतों को यह लगने लगा कि चूंकि अब देश में उनकी सरकार है इसलिए वे चाहे जो करें, उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता. मोदी के शासनकाल के पहले छह महीनों में मोदी की नाक के नीचे चर्चों पर हमले हुए और वे चुप्पी साधे रहे. उनका मौन तब टूटा जब अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने उन्हें धार्मिक स्वतंत्रता और सहिष्णुता के महत्व की याद दिलाई.
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