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कृषि से पक्षपात बंद हो

समाज

 

कृषि से पक्षपात बंद हो

देविंदर शर्मा


हाल ही में मैं सतीश वर्मा की लिखी किताब ‘रूरल क्रेडिट एंड फाइनेंशियल पेनीट्रेशन इन पंजाब’ पढ़ रहा था. वह चंडीगढ़ में सेंटर फॉर रिसर्च इन रूरल एंड इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट (सीआरआरआइडी) में आरबीआई प्रोफेसर हैं.
 

poverty

इस किताब में बताया गया है कि पंजाब में प्रति किसान परिवार के औसत नकद लोन में पिछले एक दशक में करीब 22 गुना भारी बढ़ोतरी हुई है. गत 10 वर्षों में प्रति किसान औसतन ऋण 0.25 लाख से बढ़कर 5.6 लाख हुआ. उल्लेखनीय है कि ये आर्थिक सुधारों के वर्ष रहे हैं. 


कृषि ऋण में पंजाब का देश में तीसरा स्थान है. सतीश वर्मा के एक अन्य अध्ययन में बताया गया है कि पंजाब में 98 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों पर कर्ज है. औसतन एक परिवार पर 4.79 लाख रुपये का कर्ज है जोकि इसकी वार्षिक आय का 96.73 प्रतिशत है. यदि यह राशि 97 प्रतिशत परिवारों की वार्षिक आय है तो पंजाब के ग्रामीण तबके के कम आय की कल्पना की जा सकती है. यदि यह बदतर तस्वीर खेती के मामले में एडवांस माने जाने वाले पंजाब जैसे राज्य की है तो देश के अन्य हिस्सों के हालात का अनुमान लगाया जा सकता है.

सामाजिक-आर्थिक सर्वे ने भयावह तस्वीर की पुष्टि की है. 52 प्रतिशत ग्रामीण आबादी प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से खेती से जुड़ी है. यह स्याह तस्वीर प्रमुख रूप से खेती की लगातार उपेक्षा को उजागर करती है. इसको 1970-2015 के दौरान पिछले 45 वर्षों में विभिन्न क्षेत्रों के कर्मचारियों की आय में बढ़ोतरी को सरकारी खरीद की कीमतों की तुलना से समझा जा सकता है.

1970 में गेहूं की सरकारी खरीद की कीमत 76 रुपये प्रति क्विंटल थी. 2015 में यह 1450 रुपये प्रति क्विंटल हो गई है. यानी कि इस दौरान इसकी कीमत में करीब 19 गुना की बढ़ोतरी हुई.

इसी अवधि में केंद्रीय सरकारी कर्मचारियों के औसत बेसिक वेतनमान समेत डीए में करीब 110-120 गुना, स्कूल टीचरों के मामले में 280-320 गुना, कॉलेज-यूनिवर्सिटी शिक्षकों के वेतनमान में 150-170 गुना और कारपोरेट सेक्टर के मध्यम या हाई क्लास कर्मचारियों के वेतनमान में 350-1000 गुना वृद्धि हुई. इसी अवधि में स्कूल फीस में 200-300 गुना वृद्धि, मेडिकल उपचार लागत में 200-300 गुना और शहरों में मकान किराया औसतन 350 गुना बढ़ा.

यदि अन्य सेक्टरों के वेतन में बढ़ोतरी की तरह कृषि आय में भी बढ़ोतरी होती तो ग्रामीण भारत चमक रहा होता. इस कड़ी में और आर्थिक सुधार समस्या का समाधान नहीं है. इसके उपाय के रूप में तात्कालिक रूप से किसानों को अधिक आय प्रदान करने के साथ इन क्षेत्रों में और अधिक सार्वजनिक निवेश किए जाने की जरूरत है.

11वीं और 12वीं पंचवर्षीय योजना के 10 वर्षों के दौरान केवल 2.5 लाख करोड़ रुपये कृषि के लिए दिए गए. इसी 10 वर्षों की अवधि में उद्योग क्षेत्र को 42 लाख करोड़ रुपये की कर रियायतें दी गईं. इस प्रकार योजना में ग्रामीण भारत से पक्षपात साफ झलकता है.

15.07.2015, 11.30 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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