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नई अर्थ नीति 2015

विचार

 

नई अर्थ नीति 2015

रघु ठाकुर


नई अर्थ नीति लागू होने के बाद याने वैश्वीकरण के औपचारिक दौर की शुरुआत के बाद से निजीकरण और भारी वेतन का सिलसिला तेज हुआ है. वैश्वीकरण के नियंत्रक जो दुनिया की पूंजी के मालिक है, मीडिया के मालिक है और राजसत्ता के निंयत्रक तथा उच्च नौकरशाही के यार है अपने उद्देष्य को पूरा करने के लिये बहुत बारीकी के साथ दीर्घकालिक योजना रुपी षडयंत्र करते है. जब डंकल प्रस्ताव केवल प्रस्ताव थे, और स्वीकृत नही हुये थे.

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देश में डंकल प्रस्तावों के प्रति विदेशी आर्थिक गुलामी की तीव्र भावना और विरोध था, तभी से वैश्विक पूंजीवाद ने यह रणनीति बना ली थी, कि वैश्वीकरण के पक्ष में देश में जनमत तैयार किया जाये, वह इस योजना का एक हिस्सा था-
1.देश पूंजी पतियों के साथ विदेशी पूंजी के मालिकों की सहभागिता

2.विदेशी पूंजी निवेश को देश के आर्थिक स्वास्थ और विकास के लिये प्रचार माध्यमों से व खरीदे हुये बुद्धिजीवियों और अर्थशास्त्रियों के माध्यम से अलग वातावरण तैयार करना.

3. आउटसोर्सिग के माध्यम से भारत के शिक्षित और उच्च वर्गीय तबके के नौजवानों को अमेरिकी और यूरोपीय देशों में ले जाकर काम देना यह वैश्विक पूंजीवाद का भारतीय युवकों को फॅसाने के साथ-साथ एक आर्थिक लाभ का जाल भी था. क्योंकि भारत के योग्य से योग्य इंजीनियर या टेक्नोक्रेट के वेतनमानों और अमेरिका, यूरोप के उनकी नस्ल और नागरिकों के वेतनमानों में भारी फर्क था. जिन्हें भारत में मात्र 25-30 हजार रुपये का वेतन ही बहुत माना जाता था उन्हें अगर अमेरिका या यूरोप में लाख दो लाख प्रतिमाह का वेतन मिलने लगे तो वह भारतीय युवकों के लिये भारी आकर्षण का मामला था, साथ ही वैश्विक पूंजीपतियों के लिये फायदेमंद था. क्योंकि उसी काम के लिये उनके इंजीनियर, वैज्ञानिक और टेक्नोक्रेट को औसतन महीने का 50 लाख का वेतन देना पड़ता.

4. अपने प्रचार माध्यम से, आक्रामक प्रचार के द्वारा देश की मध्यम वर्गीय आबादी को तकनीक उपभोक्ता का नशैलची बनाना ताकि उनके मन में विदेशी का विरोध समाप्त हो जाये. इसी प्रकार उपभोक्ता, वस्तुओं के उपभोग के प्रति भी उन्हें आकर्षित करना और स्थायी उपभोक्ता बनना इसी रणनीति के तहत 1990 के बाद से भारतीय मध्यम वर्ग खान-पान में अंकल चिप्स, मिनरल वाटर, मैगी और ऐसे ही अन्य खाद्य पदार्थो के अंध-भक्त बन गये. चलित फोन, टी.वी., विदेशी कारें, इनके नये-नये स्वरुप जो मंहगे और आकर्षण दोंनों थे.

भारतीय उच्च और मध्य वर्ग के लिये सुबह से लेकर शाम तक, याने, जागने से लेकर सोने तक उपभोग और हैसियत का पर्याय बन गये हम भारतीय किन विदेशी ब्रांडो के उपभोगकर्ता दास बन गये यहॉ तक कि गॉव में शादी विवाह कार्यक्रम के दौरान मिर्च, पानी या नींबूपानी की जगह पेप्सी और कोका-कोला पहॅुच गया. वैश्वीकरण की सबसे बड़ी प्रेरणा लालच है. वह उपभोग का हो, वेतन का हो, पूंजी का हो, या भोग का हो, इन चारो प्रकार के लालच ने हमारे देश की युवा पीड़ी को मृग तृष्णा के जाल में फॅास लिया है.

इसका एक परिणाम निकला विदेश के आर्थिक और सत्ता तंत्र के नियंत्रको ने अपने बच्चों को विदेशों में बड़े-बडे वेतन के लिये भेजना शुरु कर दिया. संयुक्त परिवार टूटना शुरु हो गये. भारी वेतन और पेंशन पाने वाले वृद्ध जन बच्चों के अभाव में पूर्णतः मशीन तकनीक और विदेशी ब्रांड नामधारी वस्तुओं के आशक्त बन गये. यह लोग भूल गये कि यह कम्पनियों बड़े-बड़े वेतन के पैकेज के नाम से जाल फैंक रही है, जिसमें भारत को फांस कर उसे मानसिक और आर्थिक दास बनाना इनका उद्देष्य है.

आखिर यह बड़ी कम्पनियॉ कोई धर्मार्थ या रोजगार के लिये रोजगार नहीं देती है बल्कि अपने मुनाफे के लिये देती है. रोजगार और बड़े-बड़े पैकेज देती है. उन्होंने इंसान के हाथ के रोजगार को छीन कर मशीनों के हवाले कर दिया और मशीन चलाने वाले व्यक्ति को लाखो रुपये के पैकेज का लालच देकर अपने ही भाईयों के रोजगार का हत्यारा बना दिया.

इसका परिणाम निकला कि देश की अर्थव्यवस्था के विकास सूचक मापदण्ड-
1. निर्यात उन्मुख,
2. शैयर सूचकांक को वृद्धि उन्न्मुख बनाना
3. 10 करोड़ के मध्यवर्ग को बढ़ाकर 20 करोड़ से आगे ले जाना तथा उसे उच्च मध्यवर्ग में बदलकर अपने बाजार और व्यवसाय को फैलाने का लक्ष्य बनाना.

एक बार इन जालों में फॅस जाने वाली युवा पीढ़ी का आर्थिक शोंषण उन्होंने बहुत चतुराई के साथ शुरु किया. उन्होंने वेतन के साथ-साथ उन्हें हवाई यात्राओं, विदेशी यात्राओं पॉच सितारा होटलों की जीवनषैली में फंासकर, फिर उन्हें कहकहे के साथ-साथ व्यवसाय का बड़ा लक्ष्य निर्धारित करना शुरु किया तथा मोबाईल, सी.सी.टी.वी., इंटरनेट टारगेट की चार दीवारी में जकड़ लिया.

अब यह बड़े पैकेज के कर्मचारी 24 घंटे अपने आर्थिक मालिकों की निगरानी में है. हर घंटे दो घंटे में बड़े प्रंबधक के अधिकारी अपनी मातहत से उनके स्थान की जानकारी लेता है उनके व्यापारिक काम का ऑकड़ा भेजा जाता है, इससे उन्हें निर्धारित लक्ष्य पूरा करने का दबाब बनता है और अप्रत्यक्ष रुप से मानसिक भय बनता है.

ये बड़े-बड़े पैकेज वाले कर्मचारी जिनके ऊपर उनके माता-पिता अपने समाज में बड़े गर्व से उनके वेतन और कारों, विदेशों में रहने का वर्णन करते है एक प्रकार से पैकेज देने वाले मालिकों के बंधुआ मजदूर जैसे बन गये है, जिसका हर क्षण अपने प्रंबधक की निगरानी में है. जिन्हें हर क्षण टारगेट की चिंता है, जिनका जीवन मशीनी निगरानी में है, और जिन्हें वातानुकूलित कमरों में खाना, दवा, बैक बेलेन्स आदि उपलब्ध है. उनका पारिवारिक जीवन या निजी जीवन लगभग समाप्त जैसा है. उनके पास न माता-पिता के लिये समय है, न पत्नि बच्चों के लिये समय है.

वे तो वैश्वीकरण की टीम के घोड़े के सामान है जिन्हें खाने को मोटा दाना और चना मिलेगा, परन्तु हर क्षण अपने आपको कसे रहना है. वैष्विीकरण के जाल ने नौजवानों को सम्पन्न्ा और सुविधा युक्त इंसान के बजाय सुविधा युक्त जानवरों में तबदील कर दिया और यही कारण है कि उनका निजी जीवन समाप्त होने से उनके परिवार बिखर रहे है, और अब तो वे आत्महत्या का रास्ता खोजने लगे है.

अभी हाल में 16 अप्रैल 2015 को सेनफ्रासिंको में काम करने वाले नौजवान सर्वश्रेष्ठ गुप्ता ने आत्महत्या कर ली. उसने अपने पिता को मृत्यु के दो दिन पहले लिखा था, कि मै गोल्डमेन सैंक्स कम्पनी के बिजनिस एनालिस्ट के पद को छोड़ना चाहता हॅू. क्याोंकि यहॉ काम बहुत ज्यादा है व समय बहुत कम. मुझे यहॉ एक हफ्ते में 100 घंटे तक काम करना पड़ता है. आफिस में सभी मेरे काम से खुश है लेकिन दबाब इतना ज्यादा है, कि कभी-कभी घर भी नही जा पाता. मैं नौकरी छोड़कर भारत वापिस आना चाहता हूं.

22 वर्षीय इस नौजवान ने 16 अप्रैल 2015 को अपने पिता सुनील गुप्ता को यह बात फोन पर कही थी. उसने यह भी कहा था, कि पापा मैं पिछले दो दिन से सो नहीं पाया, मेरी पत्नि भी नाराज है. श्री गुप्ता ने बेटे से कहा कि वह 15 दिन की छुट्टी लेकर भारत आ जाये, तो उसने कहा कि इतनी लम्बी छुट्टी नहीं मिलेगी. पिता श्री गुप्ता ने बेटे से कहा, कि नौकरी छोड़ देा कुछ दिनों बाद फिर सर्वश्रेष्ठ का फोन सुनील गुप्ता के पास आया, कि मैंने नौकरी छोड़ दी, और उसके कुछ समय बाद सेनफ्रासिको शहर से पुलिस का फोन आया कि सर्वश्रेष्ट ने अपार्टमेंट से कूदकर जान दे दी है. उसका शव पार्किग में पड़ा मिला है.

यह एक सर्वश्रेष्ठ की कहानी है, परन्तु लाखों की पीड़ा है. यह जानकारी इसीलिये मिल सकी क्योंकि सुनील गुप्ता ने मीडिया ब्लाक पर ’’बेटा कभी नहीं मरता’’ शीर्षक से लेख लिखकर यह जानकारी दी. परन्तु पता नहीं कितने बेटे और बेटियॉ कैसे होगे, जिनके माता-पिता अपने बच्चों की मौत की खबर को अपने और अपनो के मध्य सिसकियों में दबाकर बैठे है. आज कल युवा पीढ़ी, इन काम के तनावों के कारण, रक्तचाप, हृदयरोग, व अन्य कई प्रकार की बीमारियों का शिकार हो रही है. बहुतेरे युवा (डिप्रेशन या नर्वसनेस, निराशा) बीमार हो रहे है. जिन की जिंदगी में, केवल पैसा, काम व खाना. उन्हें भौतिक सुख के सभी साधन उपलब्ध है परन्तु उन्हें खुशी व आनंद नहीं है. उनका जीवन लक्ष्य विहीन जैसा हो गया है. लगभग संभवतया हर दम काम, हर क्षण चलितफोन या इंटरनेट. बास की पूछताछ, हर दम पीछे लगी जासूसी ऑखे.

शायद जेल के बंदियों को इनसे कुछ ज्यादा आजादी है तथा, इसके साथ वह अपनी नौकरी व कैरियर के लिये वे निंरतर भयभीत भी रहते है. इसीलिये आत्महत्यायें बढ़ रही है. नई अर्थव्यवस्था हत्यारी अर्थ व्यवस्था है, जो धीमे जहर के समान है. अपने लाभ के लिये लोगो को मार रही है. इसके पीछे बड़ा कारण लालच है और जिस कीटाणु को पैदा करने का काम उन्हीं बच्चांे के माता-पिता कर रहे है वे पैसो के लिये अपने बच्चो को इस मानक अर्थव्यवस्था का शिकार बनने के लिये उसी प्रकार ढकेल रहे है जैसे एक फोटो ग्राफर ने शैर का शिकार करते हुये चित्र लेने के लालच में , कि उसके ही फोटो को दुनिया में सबसे ज्यादा प्रचार मिलेगा, अपने ही बेटे को शैर के बेडे़ में धकेल दिया.

हम भारतियों को विचार करना चाहिये कि हमारी पहले की अर्थव्यवस्था ठीक ही कहती थी’’ साई इतना दीजिऐ जा में कुटुम्भ समाये, मैं भी भूखा न रहूं साधु भी भूखा न जाये’’ या यह नई अर्थव्यवस्था ठीक है जो कहती है ’’साई बेटा दीजिये जो विदेश, पर जाये, लाखों का पैकेज ले फिर खुद मर जाये’’

13.02.2014, 14.59 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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