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बेहतर हो शिक्षा व्यवस्था

विचार

 

बेहतर हो शिक्षा व्यवस्था

रघु ठाकुर


वैश्वीकरण के दौरे के शुरु होने के बाद देश में शिक्षा का बाजार तेजी के साथ फैल रहा हैं. शिक्षा का निजीकरण यद्धपि आजादी के पहले भी था और भारत के प्राचीन काल में भी था. परंतु प्राचीन कालीन गुरुकुल शिक्षा में न राजतंत्र का नियंत्रण था और न किसी निजी पूंजीपति का बल्कि शिक्षा ज्ञानवान लोगो के द्वारा समाज की अगली पीढ़ी तक पहुंचना एक सामाजिक कर्तव्य था जिसे ज्ञान देने वाला निभाता था और समाज शिक्षक आर्थिक दायित्वों को स्वेच्छा से सामाजिक दायित्व पूरा करते थे. यद्धपि इस व्यवस्था में जात-पात का दोष था और ज्ञान का अधिकार व्यापक समाज के बजाय चंद जातिओं तक सीमित कर दिया था.
 

शिक्षा

इन गुरुकुलों में शस्त्र-अस्त्र के ज्ञान व अर्जन तीनो विधाये, सिखाई जाती थी. याने शास्त्र के ज्ञान के साथ-साथ शस्त्र चालन और कृशि व पशु पालन भी गुरुकुल शिक्षा की अनिर्वायता थी मुगलकाल में भी शिक्षा शासन और संम्पति के नियंत्रण से मुक्त सामाजिक सरोकार के रुप में चलती रही परंतु व्यापार नहीं थी. यद्धपि शस्त्र और अर्जन विद्या से शिक्षा कट गई थी. ब्रिटिश काल में अंग्रेजो ने शिक्षा को अपनी सभ्यता और साम्राज्य के फैलाव के औजार के रुप में इस्तेमाल किया तथा काफी हद तक शिक्षा सरकार के नियंत्रण में पहॅुच गई.

हांलाकि इस दौर में भारतीय जीवन मूल्यों के आधार पर वैदिक ज्ञान आधारित शिक्षा देने का काम आर्य समाज ने सामाजिक दायित्व के रुप में पूरा किया तथा बड़े पैमाने पर दयानंद आर्य के स्कूल स्थापित किये जिन्हें ट्रस्ट या आर्यसमाज के संगठन चलाते थे और लगभग निशुल्क शिक्षा दी जाती थी. इसी दौर में पंजाब में भी शिक्षण संस्थाये सामाजिक पहल के रुप में स्थापित हुई. ब्रिटिश काल में ही ब्रिटिश हुकुमत ने सरकारी स्कूल स्थापित किये और पाठ्यक्रम के दृष्टिकोण से शिक्षा सरकार नियंत्रित हुई. हांलाकि उसका आर्थिक दायित्व शासन या डिस्ट्रिक्ट बोर्ड उठाते रहे. ईसाई मिशनरीज ने भी, इस दौर में स्कूल आंरभ किये.

भारतीय संविधान आजादी के बाद जब प्रभावशील हुआ, तब भी देश की सरकारों ने शिक्षा को राज्य के कल्याणकारी स्वरुप का एक दायित्व माना तथा सरकारी खर्च पर सस्ती शिक्षा याने प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा तक देना शुरु किया. विश्वविद्यालय कालेज हाईस्कूल की स्थापना के लक्ष्य पंचवर्षीय योजनाओं में तय किये जाते थे, और तदानुसार सरकारें उन्हें क्रियान्वित करने का प्रयास करती थी. हांलाकि 19 वीं सदी के समाप्ति के बाद और 20 वीं सदी के पूर्व से देश में कुछ बड़े सपन्न लोगो के लिये उनकी पृथक शिक्षण संस्थाये निजी उपक्रम के रुप में आरंभ हुई. विशेषतः राजा महाराजाओं, बड़े अधिकारियों और सम्पन्न लोगो के बच्चों को बेहतर व अंग्रेजी ज्ञान आधारित विशिष्ट शिक्षा के लिये डिग्री कालेज, दून स्कूल जैसी शिक्षण संस्थाये आरंभ की गई. जिनका खर्च स्वतः राजा महाराजा या सेठ साहूकार उठाते थे.

इसी दौर में ईसाई मिशनरी ने भी बड़े पैमाने पर प्राथमिक शिक्षा स्कूूल खोलना शुरु किये, कान्वेट आदि और इनमें भी सस्ती लगभग निशुल्क जैसी शिक्षा उपलब्ध कराने का काम शुरु किया. परंतु 1980 के बाद से सरकारों ने निजी पूंजी को पहले तो तकनीकी या चिकित्सा शिक्षा, फिर उच्च शिक्षा और क्रमषः बच्चो की स्कूली शिक्षा में अनुमति देना शुरु किया. तथा ये शिक्षण संस्थायें व्यापारिक स्वरुप में पूंजी निवेश और मुनाफे कमाने के माध्यम बनने लगे. वैश्वीकरण के दौर की यह आरंभिक शुरुआत थी, जो विश्व व्यापार संगठन का भारत के हस्ताक्षरित बनने के बाद पूर्ण बाजार के रुप में सामने आया और अब शिक्षा बाजार की वस्तु है. शिक्षण संस्थायें दुकानें है, उन्हें स्थापित करने वाले पैसे वालो की पूंजी निवेश उनकी लागत पूंजी है तथा यह खरीददारों की क्षमता पर निर्भर करता है, कि वे जिस दर की शिक्षा खरीद सकते हो उस दर की खरीद कर बच्चों को पढ़ा सकते है.

इस दौर में सरकारो ने या संस्थाओं ने अपने आप को शिक्षण संस्थाओं के काम से लगभग हटा लिया. 1960-70 तक सरकारों के अलावा नगरीय संस्थाये जिला पंचायत भी अपनी क्षमता के अनुसार शिक्षण संस्थायें चलाती थी. उनके वैधानिक दायित्व में यह दर्ज था, परंतु अब वे इसके पूर्णतः विलग है. और हम एक ऐसे दौर में प्रवेश कर चुके है जहॉ लगभग 70-80 फीसदी बाल शिक्षा-प्राथमिक, शिक्षा-मिडिल हाई-स्कूल शिक्षा निजी हाथो में पहॅुच चुकी है. साथ ही सरकारी स्कूल या सरकारी संस्थाये क्रमशः बंद होती जा रही है.
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