पहला पन्ना प्रतिक्रिया   Font Download   हमसे जुड़ें RSS Contact
larger
smaller
reset

इस अंक में

 

क्यों बढ़ रहा भूख का आंकड़ा

हमारे कुलभूषण को छोड़ दो

भारत व अमेरिका में केमिकल लोचा

सवाल विकास की समझ का

प्रतिरोध के वक्ती सवालों से अलग

गरीबी उन्मूलन के नाम पर मज़ाक

जनमत की बात करिये सरकार

नेपाल पर भारत की चुप्पी

लोहिया काल यानी संसद का स्वर्णिम काल

स्मार्ट विलेज कब स्मार्ट बनेंगे

पाकिस्तान आंदोलन पर नई रोशनी

नर्मदा आंदोलन का मतलब

क्यों बढ़ रहा भूख का आंकड़ा

हमारे कुलभूषण को छोड़ दो

भारत व अमेरिका में केमिकल लोचा

युद्ध के विरुद्ध

किसके साथ किसका विकास

क्या बदल रहा है हिन्दू धर्म का चेहरा?

मोदी, अमेरिका और खेती के सवाल

 
 पहला पन्ना > Print | Send to Friend 

गाय हमारी माता है

गाय हमारी माता है

देविंदर शर्मा


हिमालय क्षेत्र के गुज्जर व बकरवाल समुदायों के लिए भेड़ की स्थानीय जाति का खत्म हो जाना बड़ा नुकसान है. ऊन व मांस का उत्पादन बढ़ाने के मकसद से ऑस्ट्रेलिया की मैरीनो जैसी आकर्षक नस्लों के आयात के कारण पारंपरिक भेड़ें तेजी से लुप्त हुई हैं. जबकि घरेलू नस्ल पहाड़ी वातावरण के अधिक अनुकूल थीं. विदेशों से पशुधन आयात की शुरुआत के लगभग 40 साल बाद यह बात समझ में आ रही है कि यह कवायद सही नहीं थी.

श्रीनगर स्थित ट्राइबल रिसर्च एंड कल्चरल फाउंडेशन के मुताबिक आकर्षक नजर आने वाली नस्लें अपेक्षित परिणाम देने में नाकाम रहीं क्योंकि बेरहम मौसम की मार और सामाजिक-आर्थिक स्थितियों को झेलने में यह सक्षम नहीं थीं. इसके बावजूद, 12 पारंपरिक नस्लों की भेड़ और बकरियां लुप्तप्राय हो चुकी हैं, और अन्य कगार पर हैं.
 

पूजा के समय आती है याद

cow

भारत में मवेशियों की तादाद दुनिया में सर्वाधिक, लगभग तीन करोड़ है. जिसमें 27 शानदार नस्लें हमारे पास थीं लेकिन आज हमारी आधी नस्लें लुप्त हो चुकी हैं.

एक ऐसे देश में मवेशियों की घरेलू नस्ल के प्रति सम्मान का पूरी तरह खत्म हो जाना समझ से परे और अक्षम्य है, जो इस तथ्य पर गर्व करता रहा हो कि वह दुनिया में सबसे अधिक, 81000 पशु जातियों के साथ तीसरा सबसे बड़ा विशाल-विविधता वाला क्षेत्र है.

हम मानते हैं कि हमारा कोई भी पशु जैनेटिक संसाधन उपजाऊ व असरदार नहीं है और उनकी उपेक्षा करते रहते हैं. हम लगातार आकर्षक नस्लों को आयात करने में लगे रहते हैं, चाहे वह भेड़ हो या बकरी, गाय, खरगोश, घोड़ा, ऊंट और खच्चर तक भी.

हालांकि गाय रूपी संपदा हमारे पास उपलब्ध है जिसे हम पवित्र और मां का दर्जा देते हैं, मगर इस मामले में भी स्थिति शर्मनाक है. सिर्फ पूजा करने के समय ही हमें पवित्र गाय की याद आती है, वर्ना तो हम इसे एक फालतू जानवर ही समझते हैं.

हमारा विश्वास है कि इसकी उत्पादकता इतनी कम है कि यह सिर्फ 250 से 500 ग्राम ही दूध दे सकती है. इसलिए दूध की उत्पादकता बढ़ाने का हमारे लिए श्रेष्ठ तरीका यही है कि विदेशी होल्सटीन फ्रीजियन या जर्सी नस्ल के साथ घरेलू नस्ल का क्रॉस करा दिया जाए. पचास साल से हम ऐसा कर रहे हैं.

हमारे देश में मवेशियों की 27 शानदार नस्लें मौजूद हैं. वह सभी इतनी अनुत्पादक, इतनी अनुपयोगी कैसे बन गईं? दुनिया में सबसे छोटी वाइचूर जैसी नस्ल, जिसे प्रतिदिन सिर्फ दो किलो चारे की जरूरत होती है, हमारी धरती से खासतौर पर गायब हो गई है. विडंबना है कि यह नस्ल इंग्लैंड की रीडिंग यूनिवर्सिटी में मौजूद है.

भारत में मवेशियों की तादाद दुनिया में सर्वाधिक, लगभग तीन करोड़ है. 27 में से हमारी आधी नस्लें लुप्त हो चुकी हैं. क्रॉस-ब्रीडिंग की अधिकता की वजह से हमारी लगभग 80 फीसदी गायें नस्ल की पहचान खो चुकी हैं. दूध के मामले में प्रतिवर्ष आठ करोड़ टन से अधिक उत्पादन के साथ दुनिया में हम अव्वल हैं. अमेरिका का स्थान दूसरा है. आधिकारिक रूप से इसका श्रेय उच्च दूध उत्पादक नस्लों के आयात और घरेलू नस्ल के साथ उनकी क्रॉस-ब्रीडिंग को दिया जाता है.

मगर क्या ये सच है कि हमारी गायों की दूध उत्पादकता बहुत कम है? क्या यह नस्लें पूरी तरह से अनुपयोगी हो चुकी हैं? राजस्थान की थारपारकर नस्ल का उदाहरण लीजिए. इसका नाम ही थार,पार,कर है, अर्थात यह थार को पार कर सकती है. जर्सी या होल्सटीन फ्रीजियन नस्ल की गाय को एक किलोमीटर चलाने की कोशिश कीजिए, आपको हकीकत पता चल जाएगी.

कुछ माह पहले एफएओ के एक अध्ययन में यह चौंकाने वाली बात सामने आई है कि ब्राजील भारतीय नस्लों की गाय के निर्यात में सबसे आगे है. क्या कहीं कुछ गलत नहीं हो रहा है? ब्राजील हमारे यहां की नस्लों के संवर्धन में हमसे भी आगे है. 1960 के दशक की शुरुआत में ब्राजील ने भारत की छह नस्लें मंगाई थीं.

दरअसल भारतीय नस्ल के मवेशी जब ब्राजील पहुंचे तब पता चला कि यह दूध देने में भी आगे हैं. आज छह में से तीन नस्लें- गुजरात की गिर और आंध्रप्रदेश तथा तमिलनाडू की कांकरेज व ओंगोल वहां होल्सटीन फ्रीजियन व जर्सी के बराबर दूध दे रही हैं. अगर कल को ब्राजील से भारत में गायों का आयात होने लगे तो कोई हैरत नहीं होगी.

अगर हम सही ध्यान देते तो हमारी गाय सड़कों पर भटकने वाला आवारा पशु नहीं मानी जाती बल्कि एक उच्च दूध उत्पादक सम्मानीय मवेशी होती. मेरे विचार से साइंस के कारण जो गड़बड़ियां देश में हुई हैं, उनमें यह सबसे बड़ी है. अब वक्त आ चुका है कि पारंपरिक नस्ल वाले अपने पशुधन की कीमत हम पहचानें और न सिर्फ इनके संरक्षण बल्कि आर्थिक प्रगति के संसाधन के रूप में इनके इस्तेमाल के लिए देशव्यापी कार्यक्रम शुरू करें.
04.05.2008, 00.52 (GMT+05:30) पर प्रकाशित
सभी प्रतिक्रियाएँ पढ़ें
 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

kishor dixit (kishor__dixit@yahoo.com) kolhapur

 
 I WANT DETAIL INFORMATION ABOUT INDIAN COW AND SCIENCE BEHIND MILK AND GOMUTRA 
   
 

kaduvasach.blogspot.com

 
 धर्म परिवर्तन आखिर क्योँ, क्या आवश्यकता है, बलात या प्रलोभन देकर किये जा रहे धर्म परिवर्तन सर्वथा अनुचित है, ............. लेख प्रभावशाली है। 
   
 

vijai pratap (pratapvijai@gmail.com)

 
 apani sanghi khopadi thoda alag rakh kar lekh padhoge to sab samajh me aajayega. dharmparivartan aur ghar vapasi ek hi baat hai jise ram punyani ne apane is lekh me saftor par likh hai. adiwasi hindu nahi hote hain saathi is bat ka hamesa dhyan rakhe. aur isiliy unaki ghar wapasi ka koi tuk hi nahi banata 
   
 

Jeet Bhargava (jeetbhargava@yahoo.co.in)

 
 Lekhak ne poorvagrah se grast hokar likahaa hai. Hairat ki baat hai ki jab lekhak ko dharmparivartan pe etraz nahi hai toh ghar vapasi pe kyon itni haay-tauba machaa rahe hain? 
   
 

Jeet Bhargava

 
 Yee Raam Puniyaani hai jinse hum kisi sach aur saarthak article ki ummeed nahi kar sakte hain. Christian Conversion ke vakaalat karne vaale kai mahaan buddhijivi aur lekhak iss dharti par hue hain. Jo sach ko jhuthlaane ke abhiyaan mein jude hue hain. Raam Puniyaani ke lekhan abhiyaan pe nazar daali jaaye toh unke poorvaagrah aur pradushit soch ki jhalak apne aap mil jaati hai. Unki ek bhi baat vishvasneey nahi maani jaa sakti. Naa jaane vo kis laalach, darr, yaa dvesh bhaav se hamesha Hindu samaaj ke khilaaf hi likhte hain. 
   
 

Jitendra Dave (jitjao@yahoo.co.in)

 
 bahut saar-garbhit aur aankhe khol dene vaalaa lekh hai. bhadhaaii. 
   
[an error occurred while processing this directive]
 
  ▪ हमारे बारे में   ▪ विज्ञापन   |  ▪ उपयोग की शर्तें
2009-10 Raviwar Media Pvt. Ltd., INDIA. feedback@raviwar.com  Powered by Medialab.in