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स्मृति-श्रद्धांजलि लेखन का पाखंड

विचार

 

स्मृति-श्रद्धांजलि लेखन का पाखंड

सुनील कुमार


अखबार का काम बहुत से लोगों की नाराजगी पाने का भी रहता है. आए दिन कभी किसी के जन्मदिन पर, कभी किसी की पुण्यतिथि पर, कभी किसी की जिंदगी की आधी सदी होने पर, और कभी किसी के साठ बरस पूरे होने पर लोग लेख भेजते हैं, और उनको छापने की उम्मीद करते हैं. 

श्रद्धांजलि


इनमें अधिकतर ऐसे लोग रहते हैं जो कि खुद ताकत की जगहों पर बैठे रहते हैं, और उनके बारे में आसपास के लोग लिखकर भेजते हैं. या फिर ऐसे लोग रहते हैं जो गुजर गए हैं, लेकिन जिनकी आल-औलाद ताकत की जगह पर है, और उस ताकत के आभामंडल के इर्द-गिर्द के लोग खुद होकर वैसा लिखते हैं, या फिर उनसे लिखवाया जाता है. रातों-रात लोगों को लोगों की महानता के ऐसे संस्मरण याद पड़ जाते हैं, जो ताकत के पहले नहीं रहते थे, और ताकत के बाद शायद खत्म भी हो जाते हैं.

जिंदा लोगों के संस्मरण सुनाते हुए और गुजर चुके लोगों को श्रद्धांजलि देते हुए जो बातें लिखी जाती हैं, वे विशेषणों से इस तरह लबालब रहती हैं कि मानो एक पीजा-ब्रेड जितने मोटे केक पर चार इंच मोटी आइसिंग की सजावट कर दी गई हो. या हिन्दुस्तानी पकवानों की बात करें, तो मानो कटोरी में एक इंच खीर पर चार इंच मेवे की तह सजा दी गई हो. यह सिलसिला हो सकता है कि दुनिया की बहुत-सी संस्कृतियों में चलता हो, लेकिन हिन्दी अखबारनवीसी में यह अश्लील और बेशर्म हद तक जा चुका है.

अखबारों के अपने पेट पालने के लिए हो सकता है, कभी-कभी ऐसा छापना मजबूरी हो, लेकिन जो लोग पेशेवर अंदाज में इसी तरह का लिखते हैं, या लिखवाते हैं, या छापते हैं, उनमें से कोई भी स्मृति या श्रद्धांजलि के केन्द्र का सम्मान नहीं बढ़ा पाते. जो पढऩे वाले लोग हैं, वे छपे हुए या लिखे हुए के पीछे की नीयत को भी समझते हैं, और ऐसे लिखने-छपने से जुड़ी हुई उम्मीदों को भी समझते हैं. ऐसे लोग महज तरस के लायक होते हैं जिनकी जिंदगी का मकसद अपने जिंदा या मुर्दा किसी बुजुर्ग को चबूतरे पर चढ़ाने में गुजर जाता है.

अब यह सोचें जो सच में ही महान हैं, क्या उनके बारे में भी कभी लिखा नहीं जाना चाहिए, कभी छापा नहीं जाना चाहिए? तो कुछ बहुत सरल से पैमाने सूझते हैं कि जिन लोगों के बारे में छपने से उनके कुनबे के लोग सरकारी या निजी खर्च से लेखक या अखबार का कोई भला न कर सकते हों, जो ऐसे किसी ओहदे पर न हों, जहां से वे किसी का भला या बुरा कर सकते हों, तो ऐसे लोगों के बारे में, या उनके कुनबे के किसी के बारे में लिखने और छापने के बारे में सोचा जा सकता है.

जब मीरा कुमार केन्द्रीय मंत्री हों, या जब वे लोकसभा अध्यक्ष हों, उस वक्त बाबू जगजीवन राम के बारे में लिखना या छापना बेमतलब नहीं हो सकता. और ऐसी बातों का पता तब चलता है जब ऐसे दिवंगत नेताओं की औलादों की सत्ता चली जाती है, उनकी पार्टी सरकार में नहीं रहती, और उनके बारे में लिखना एकदम बंद हो जाता है, छपना गायब हो जाता है.

आत्मप्रशंसा चाहे वह खुद की हो, चाहे अपने पुरखों की हो, उसकी विश्वसनीयता बड़ी कम होती है. आज कोई गांधी के बारे में लिखे, या भगत सिंह के बारे में, उनके कुनबे का कोई ऐसा नहीं है जो कि लिखने वाले या छापने वाले का दो पैसे का भी भला कर सके. इसलिए ऐसे लोगों के बारे में ईमानदारी से लिखना और छापना मुमकिन है, लेकिन जब जिंदा लोगों के बारे में भी आज इतने-इतने विशेषण इस्तेमाल होने लगते हैं कि मानो वे गुजर चुके हों, और श्रद्धांजलि में हजार किस्म के मीठे झूठ जायज हों.

ब्रिटिश मीडिया में किसी के गुजर जाने के बाद उसके बारे में लिखना, श्रद्धांजलि लेखन नहीं रहता, बल्कि वह मृतक पर लिखी गई एक टिप्पणी रहती है. हिन्दी में जिस अंदाज में हर गुजरने वाले के बारे में लिखते हुए पहला झूठ पहले शब्द से ही चालू होता है, जब गुजरे हुए को स्वर्गीय लिखकर बात आगे बढ़ाई जाती है. अब जो हिन्दुस्तान अपनी संस्कृति में नर्क से लेकर जहन्नुम तक का नाम ले-लेकर लोगों को डराता है, उसमें मानो मरने के बाद किसी को नर्क नसीब ही नहीं होता, हर कोई सीधे स्वर्ग ही पहुंच जाते हैं.

मतलब यह कि जो बहुत ही दीन-हीन और गरीब, ईमानदारी से काम करने वाले मजदूर किस्म के लोग हैं, उन्हीं के बारे में खबरों में उनका नाम लिखते हुए भी कभी स्वर्गीय शब्द का इस्तेमाल नहीं होता, मानो स्वर्ग पर ताकत और पैसे वाले लोगों का एकाधिकार हो.

गुजरे हुए बड़े लोगों को स्वर्ग भेजने के बाद उनके नए पते की शान को बरकरार रखने वाली बातों से भारतीय श्रद्धांजलि-लेखन पूरा कर दिया जाता है. किसी बड़े या ताकतवर, किसी महान के भी कमजोर पहलुओं को छूने की मेहनत नहीं की जाती, क्योंकि हिन्दुस्तानी जिंदगी की सोच में यह बहुत बड़ा पाखंड भरा हुआ है कि गुजर चुके किसी के बारे में कोई कड़वी बात नहीं की जाती.

यह ऐसी दकियानूसी बात है कि समकालीन इतिहास लेखन सिर्फ झूठ से भर दिया जाए. ऐसा सच भी किस काम का जो कि बुरी तरह अविश्वसनीय होकर लोगों की असली अच्छी बातों पर से भी पढऩे वालों का भरोसा हटा दे. जब किसी के बारे में खूब विशेषण इस्तेमाल होते हैं, तो समझदार लोग जान जाते हैं कि इनके बारे में तथ्यों की बड़ी कमी है, जिंदगी में असली अच्छी बातें हैं नहीं, इसलिए प्लास्टिक के फूलों से शव को सजा दिया गया है.

लेकिन यह परंपरा भारत में नई नहीं है. राजाओं के वक्त के चारण और भाट इसी तरह का वीरगान करते थे, और अपने अन्नदाता राजा के ऐसे गुणगान करते थे, जिन पर राजा भी हक्का-बक्का हो जाता हो. वही सिलसिला लोकतंत्र के आने के बाद भी सत्ता के इर्द-गिर्द, कामयाब कारोबार के इर्द-गिर्द, और किसी भी तरह की ताकत के इर्द-गिर्द चलते रहता है. लेकिन इक्कीसवीं सदी के चारण और भाट बड़ी बुरी तरह उजागर होते चलते हैं, और भाड़े पर उनको लेने वाले ताकतवर भी कोई विश्वसनीयता नहीं पा पाते.

किसी का एक अच्छा मूल्यांकन, एक ईमानदार विश्लेषण, उसकी खुद की साख को ऊपर ले जा सकता है. लेकिन जब उसे झूठ की सजावट से लाद दिया जाता है, तो उस बोझ से विश्वसनीयता दब जाती है, और खत्म हो जाती है. अंग्रेजी और पश्चिम से जो बातें सीखी जा सकती हैं, उनमें से एक यह भी है कि किसी के गुजर जाने के बाद मीडिया उसका कितना ईमानदार विश्लेषण कर सकता है.

04.08
.2015, 15.00 (GMT+05:30) पर प्रकाशित