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पशुवत प्रवृत्ति का प्रतीक है मृत्युदंड

विचार

 

पशुवत प्रवृत्ति का प्रतीक है मृत्युदंड

इरफान इंजीनियर


मानव सभ्यता का इतिहास क्रूर, असमान और हिंसक समाजों के मानवतावादी, समावेशी और कम हिंसक समाजों में परिवर्तन का इतिहास है. मानव समाज, तानाशाही से प्रजातंत्र की ओर अग्रसर हुआ, वह राजशाही से लोकशाही की तरफ बढ़ा.
 

फांसी

समाज में हमेशा से अपराधियों को सज़ा देने का प्रावधान रहा है परंतु जहां प्राचीन समाजों में सज़ा का उद्देष्य प्रतिषोध लेना हुआ करता था, वहीं आधुनिक समाज, सज़ा को एक ऐसे उपकरण के रूप में देखता है, जिससे अपराधी को स्वयं को बदलने की प्रेरणा मिले और समाज के अन्य लोग अपराध करने से बचें.

‘‘रेशनल च्वाईस थ्योरी’’ (तार्किकता चयन सिद्धांत) के अनुसार, सज़ा का प्रावधान इसलिए नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि हम अपराधियों से बदला लेना चाहते हैं बल्कि सज़ा का प्रावधान इसलिए होना चाहिए क्योंकि इससे अन्य लोग अपराध करने के प्रति हतोत्साहित होंगे, अपराध करने से डरेंगे. प्राचीन और मध्यकाल में राजाओं द्वारा जो सज़ाएं दी जाती थीं उनमें शामिल थीं आदमी को उबलते हुए पानी में फेंक देना, भूखे शेरों के सामने डाल देना, धीरे-धीरे काटकर मारना, कमर के नीचे से शरीर को दो भागों में बांटकर मरने के लिए छोड़ देना, पेट काटकर आंते बाहर निकाल लेना, सूली पर चढ़ाना, हाथी के पैरों तले कुचलवाना, पत्थरों से मारकर जान लेना, तोप के मुंह से बांधकर उड़ा देना, जिंदा जलाना, हाथ-पैर काट लेना, सार्वजनिक रूप से फांसी देना, गिलोटिन से मौत के घाट उतारना और लाईन में खड़ा कर गोली मार देना. यह उन तरीकों की पूरी सूची नहीं है, जिनका इस्तेमाल प्राचीन और मध्यकाल में राज्य, अपराधियों को सज़ा देने के लिए करता था. यह केवल उनमें से कुछ तरीकों की बानगी भर है.

ये सज़ाएं उन लोगों को दी जाती थीं जो राज्य के खिलाफ विद्रोह करते थे, राज्य के धर्म के अलावा किसी और धर्म को मानते थे, शासक वर्ग से मतभेद रखते थे या जिन्हें लीक पर चलना मंजूर न था. गेलिलियो ने जब यह कहा कि पृथ्वी नहीं, बल्कि सूर्य ब्रह्मण्ड का केंद्र है तो चर्च का कहर उन पर टूट पड़ा. अंततः उन्हें यह कहना पड़ा कि उनकी खोज गलत थी और चर्च का यह सिद्धांत ठीक था कि ब्रह्मण्ड, पृथ्वी-केंद्रित है.

सन् 1820 में ब्रिटेन में 160 ऐसे अपराध थे जिनके लिए मौत की सज़ा का प्रावधान था. इनमें शामिल थे दुकानों से सामान चुराना, छोटी-मोटी चोरी, खानाबदोशों के साथ एक महीने से अधिक समय बिताना आदि. ब्रिटेन में एक समय 220 अपराधों की सज़ा मृत्युदंड थी. मौत की सज़ा जिन ‘‘अपराधों’’ के लिए दी जाती थी उनमें से कई ऐसे थे जोधनी लोगांे की संपत्ति की सुरक्षा करने के लिए बनाए गए थे. ऐसा बताया जाता है कि हैनरी अष्टम ने 72,000 लोगों को मौत की सज़ा से दंडित किया था. सन् 1810 में हॉउस ऑफ कामन्स में मृत्युदंड के विषय पर भाषण देते हुए सर सैम्युअल रोमिल्ली ने कहा था, ‘‘इस धरती पर कोई ऐसा देश नहीं है जिसमें इतने सारे अपराध मौत की सज़ा से दंडनीय हों, जितने कि इंग्लैण्ड में’’.

19वीं सदी में रोमन गणराज्य, वेनेजुएला, सेनमेरिनो और पुर्तगाल ने मौत की सज़ा का प्रावधान समाप्त कर दिया. रोमन गणराज्य ने 1849 में यह प्रतिबंध लगाया, वेनेजुएला ने 1854 में, सेनमेरिनो ने 1865 में और पुर्तगाल ने 1867 में. द्वितीय विष्वयुद्ध के बाद, सारी दुनिया में व्यापक वैचारिक परिवर्तन आया. वर्गीय ऊँचनीच कम हुई और नाज़ी जर्मनी में हुए कत्लेआम ने लोगों को अंदर तक हिला दिया और नस्लीय भेदभाव के विद्रूप चेहरे से दुनिया को परिचित करवाया. सन् 1948 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने मानवाधिकारों का सार्वभौम घोषणापत्र जारी किया और इसे सन् 1950 में ब्रिटेन द्वारा स्वीकार कर लिया गया.

ब्रिटेन में सन् 1964 के बाद से किसी व्यक्ति को मृत्यु दंड नहीं दिया गया. सन् 1965 में प्रधानमंत्री हेरोल्ड विल्सन की लेबर पार्टी की सरकार ने मृत्यु दंड की व्यवस्था को पांच साल के लिए निलंबित कर दिया. सन् 1969 में हॉउस ऑफ कामन्स ने मृत्यु दंड के प्रावधान को ही खत्म कर दिया. सन् 1999 के 10 दिसंबर को अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस के अवसर पर इंग्लैंड ने ‘‘नागरिक व राजनैतिक अधिकारों पर अंतर्राष्ट्रीय समझौते’’ के द्वितीय ऐच्छिक प्रोटोकाल पर दस्तखत कर दिए. इसके साथ ही, ब्रिटेन में मृत्यु दंड हमेशा के लिए समाप्त हो गया.

इस तरह, हम यह देख सकते हैं कि प्रजातंत्र और प्रजातांत्रिक संस्थाओं के मजबूत होते जाने के साथ ही, असहमति और मतभेदों को स्वीकार करने, सहने और उनका सम्मान करने की प्रवृत्ति बढ़ी. इस तथ्य को स्वीकार किया जाने लगा कि मानव जीवन अत्यंत मूल्यवान व पवित्र है और किसी समाज या राज्य को यह हक नहीं है कि वह किसी मनुष्य की जान ले. जैसा कि गांधीजी ने कहा था, आंख के बदले आंख का सिद्धांत पूरी दुनिया को अंधा बना देगा. यह माना जाने लगा कि सामूहिक सामाजिक चेतना को खून का प्यासा नहीं होना चाहिए.

इस संभावना को भी समुचित महत्व दिया जाने लगा कि कोई भी न्यायालय या सरकार, किसी निर्दोष व्यक्ति को भी सज़ा दे सकती है. अन्य सज़ाओं के मामले में, अगर बाद में संबंधित व्यक्ति निर्दोष साबित हो जाता है, तो उसे जेल से रिहा किया जा सकता है परंतु मृत्यु दंड के मामले में गलती सुधारने की गुंजाईश नहीं है.

20वीं सदी में, आस्ट्रेलिया ने 1973 में मृत्यु दंड का प्रावधान समाप्त कर दिया. केनेडा ने 1976 और फ्रांस ने 1981 में मृत्यु दंड समाप्त कर दिया. सन् 1977 में संयुक्त राष्ट्र संघ की सामान्य सभा ने एक औपचारिक प्रस्ताव पारित किया जिसमें यह कहा गया था कि मृत्यु दंड के उन्मूलन की वांछनीयता के मद्देनजर ‘‘यह बेहतर होगा कि उन अपराधों, जिनके लिए मृृत्यु दंड दिया जा सकता है, की सूची उत्तरोत्तर छोटी की जाए.’’

संयुक्त राष्ट्र संघ की सामान्य सभा की द्वितीय समिति ने 21 नवंबर 2012 को पारित अपने चौथे प्रस्ताव में कहा कि मृत्यु दंड की व्यवस्था को समाप्त करने के उद्देष्य से, उसके इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाया जाए. इस प्रस्ताव को 91 सदस्य राष्ट्रों ने प्रायोजित किया था और इसके पक्ष में 110 और विरोध में 39 मत पड़े. छत्तीस देशों ने मतदान में भाग नहीं लिया. भारत ने प्रस्ताव के विरोध में मत दिया. दुनिया धीरे-धीरे मृत्यु दंड के उन्मूलन या उसके इस्तेमाल पर रोक की ओर बढ़ रही है. दुनिया के दो तिहाई देशों में या तो मृत्यु दंड खत्म किया जा चुका है या उस पर प्रतिबंध है.

अर्जेन्टीना, ब्राजील, कोलम्बिया, कोस्टारिका, इक्वाडोर, मैक्सिको, पनामा, पेरू, उरूग्वे व वेनेजुएला सहित अधिकांश लातिन अमरीकी देशों में मृत्यु दंड समाप्त कर दिया गया है. यूरोप में बेल्जियम, डेनमार्क, जर्मनी, इटली, नीदरलैंड, नार्वे, स्वीडन, स्विटज़रलैंड और आईसलैंड में मृत्यु दंड नहीं दिया जाता. आस्ट्रेलिया और अमरीका के कई राज्यों में भी इस पर प्रतिबंध लगाया जा चुका है. मृत्यु दंड को मानवीय गरिमा के खिलाफ माना जाता है.
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