पहला पन्ना >रघु ठाकुर Print | Share This  

जनोन्मुखी बने नौकरशाही

विचार

 

जनोन्मुखी बने नौकरशाही

रघु ठाकुर


हमारे देश की नौकरशाही का चरित्र राजतंत्र के जमाने से गुलामी का रहा है. जिस प्रकार राजा-नबाबों के जमाने में उनके कर्मचारी ऑख मूंदकर उनके हुकुम को बजाते थे और जिनके शब्दकोष में राजा-महाराजाओं के लिये न शब्द नहीं होता था. वही स्थिति लगभग आज भी देश के नौकरशाहों की है.
 

नौकरशाही

ब्रिटिश हुकुमत के जमाने में भी इंडियन सर्विसेस के अफसरान अंग्रेजी हुकुमत के सामने नतमस्तक रहते थे, और लगभग गुलाम जैसा आचरण करते थे. जो मानसिक गुलाम होते है उनकी मानसिकता दो तरफी गुलामी की होती है. वे अपने से ताकतवर के समक्ष नतमस्तक रहते है और अपने से कमजोर जनता के प्रति उन का व्यवहार जनता को उसी प्रकार दबाकर रखने का होता है. आजादी के आंदोलन के दिनों में आंदोलन को लाठी, गोली और जेल के माध्यम से दमन करने का काम यही नौकरशाही करती थी.

आजादी के बाद भी नौकरशाही का चरित्र बदला नहीं है और यहॉ तक कि भारतीय प्रशासनिक सेवा के प्रशिंक्षण में जो ज्ञान मंत्र उन्हें सिखाये जाते है वे भी जी हजूरी चाटुकारिता और अपने से बड़े अधिकारी को न, न कहने केवल हॉ कहने का पाठ होते है. अनेकों आई.पी.एस. अधिकारियों ने जिन्होंने अपने सेवाकाल के अनुभव किताबों के रुप में दर्ज किये है या कुछ ने कुठित होकर त्यागपत्र दिये है, के संस्मरण भी इसी की ताईद करते है.

1 जुलाई 2015 के समाचार पत्रों में भा.ज.पा. के राष्ट्रीय महासचिव और म.प्र. के कैबिनेट मंत्री श्री कैलाश विजयवर्गीय का एक पत्र समाचार पत्रों में छपा था, जिसमें उन्होंने डी.आई.जी. इन्दौर संभाग को इंदौर में पुलिस द्वारा रात्री 11 बजे दुकाने बंद कराने का विरोध यह कहते हुये किया था, कि इंदौर के लोगो की परम्परा रात 11 बजे के बाद सपरिवार बाजारों में जाकर खाने-पीने की है. उन्होंने 4 जुलाई 2015 को इंदौर पहॅुचकर डी.आई.जी से चर्चा की, और अपनी बात भी कही है.

चूंकि श्री कैलाश विजयवर्गीय इस समय क्रेन्द्रीय सत्ता के नजदीकी और भरोसेमंद है तथा प्रदेश के मुख्य मंत्री पद के मजबूत दावेदार है अतः उनके पत्र का संज्ञान लेते हुये डी.आई.जी.महोदय का बयान 5 जुलाई 2015 के समाचार पत्रों में छपा कि पुलिस ने रात 11 बजे दुकानें बंद करने का कोई आदेश नहीं दिया और कुछ गलत फहमी हुई है. मुझे पता नहीं है कि इन डी.आई.जी. महोदय ने अपने कार्यकाल में कभी किसी अन्य व्यक्ति के या किसी प्रतिपक्ष दल के नेता के पत्र या प्रश्नों का उत्तर भी दिया हो.

मैं एक बार जब एक कलेक्टर महोदय के कार्यालय में उनसे कुछ चर्चा कर रहा था, उसी समय उन्हें उनके किसी मातहत अधिकारी का फोन मुख्यमंत्री जी के कार्यक्रम के सम्बध में आया. शायद वे कलेक्टर को स्थानीय सत्तापक्ष के दलीय लोगो के द्वारा कुछ भिन्न राय की जानकारी दे रहे थे. कलेक्टर महोदय ने अपने मातहत से कहा कि हमें किसी से कुछ लेना-देना नही है हमें तो केवल वी.आई.पी को खुश रखना है भले ही बकाया सब नाराज हो जाये.

ऐसे संवादों के अनुभव मेरे लम्बे राजनैतिक जीवन में एक बार नहीं अनेकों बार आये है. हम लोग आये दिन देखते है, कि सत्ता और सत्ता पक्ष के लोग बगैर अनुमति के कही भी सड़क रोककर आयोजन करते है जबकि पुलिस का नियम सड़क रोकने को अपराध घोषित करता है. यहॉ तक कि प्रतिपक्षी दलों के लोगो को सभाओं आदि के आयोजन की अनुमति लेना एक दुष्कर कार्य हो गया है. वही पुलिस और प्रशासन है जो आम जन और अन्य लोगो के संविधानिक अधिकारों को बाधित करती है, और सत्ता पक्ष की खुशामद करती है.

गुलामी और नौकरशाही की जकड़न इतनी मजबूत है कि पिछले 10 वर्षो में, मैंने अनेकों राज्यपालों, मुख्यमंत्रियों और गृहमंत्रियों के समक्ष संविधान व लोकतांत्रिक अधिकारों के अनुसार सभाओं की अनुमति देने संबंधी बात उठायी परंतु किसी का भी साहस इस तंत्र की जकड़न को तोड़ने का नहीं हुआ.

पुनः इंदौर के ही संदर्भ में चर्चा करें, कि म.प्र. दुकानदारी गुमास्ता कानून के अंतगर्त दुकानों को बंद करने का समय रात्रि 9 बजे शासन ने तय किया है तथा एक आधा घंटे की अनौपचारिक स्वीकृति अधिकारी देते रहते है. पंरतु यह सुविदित तथ्य होते हुये भी इंदौर पुलिस इसी के तहत अपराध रोकने के नाम पर दुकानों को बंद कर रही थी और इसके विरोध में समाचार स्थानीय अखबारेां में निंरतर छप रहे थे परन्तु तब डी.आई.जी महोदय चुप रहे और सत्ता के ताकतवर व्यक्ति का हस्तक्षेप होते ही उनका दिव्यज्ञान जाग गया.

दरअसल कानून को तोड़ने की शिंक्षा सत्ता और शासन ही देता है जो आम लोगो के मन में यह धारणा बनाता है कि कानून कुछ नही होता है केवल ताकत ही सर्वोपरि कानून है. इस प्रक्रिया से समाज कानून का पालन करने की जगह कानून को तोड़ने का प्रयास करने वाला बन जाता है. कानून के प्रतिकूल काम करने की ताकत समाज में हैसियत का पर्याय बन जाती है.

अभी समाचार छपे हैं कि 29 जून 2015 को महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव श्री परदेशी जो मुख्यमंत्री के साथ एयर इंडिया के विमान से न्यूयार्क यात्रा पर जा रहे थे अपने वीजा सम्बन्धित दस्तावेज घर भूल आये. विमान की सीढ़िया चढ़ते समय उन्हें ख्याल आया और वे अपने घर से दस्तावेज लेने गये. जिसके परिणाम स्वरुप एयर इंडिया विमान डेढ़ घंटे तक हवाई अड्डे पर रुका रहा, उनका इंतजार होता रहा और उनके आने के बाद रवाना हुआ. चूंकि यात्री विमान में चढ़ चुके थे अतः उन्हें डेढ़ घंटे तक विमान में इंतजार करना पड़ा.
आगे पढ़ें

Pages: