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इस्लामिक आतंकवाद के पीछे की राजनीति

विचार

 

इस्लामिक आतंकवाद के पीछे की राजनीति

राम पुनियानी


पिछले कई सालों में विश्व ने इस्लाम के नाम पर हिंसा और आतंकवाद की असंख्य अमानवीय घटनाएं झेली हैं. इनमें से कई तो इतनी क्रूरतापूर्ण और पागलपन से भरी थीं कि उन्हें न तो भुलाया जा सकता है और ना ही माफ किया जा सकता है. इनमें शामिल हैं ओसामा-बिन-लादेन द्वारा औचित्यपूर्ण ठहराए गए 9/11 के हमले में 3,000 निर्दोष व्यक्तियों की मृत्यु, पेशावर में स्कूली बच्चों पर हमला, बोकोहरम द्वारा स्कूली छात्राओं का अपहरण, चार्ली हेब्दो पर हमला व आईसिस द्वारा की गई घिनौनी हत्याएं. ये सभी घोर निंदा की पात्र हैं और सारे सभ्य समाज को शर्म से सिर झुकाने पर मजबूर करती हैं.

आईसिस


पि9/11 के बाद से एक नया शब्द समूह गढ़ा गया-‘‘इस्लामिक आतंकवाद’’. यह इस्लाम को सीधे आतंकवाद से जोड़ता है. यह सही है कि इस्लामवादी आतंक एक लंबे समय से जारी है और कैंसर की तरह पूरी दुनिया में फैल रहा है. इस्लाम के नाम पर लगातार हो रही हिंसक व आतंकी घटनाओं के चलते ऐसा प्रतीत होता है कि इनका संबंध इस्लाम से है. यही बात अमरीकी मीडिया लंबे समय से प्रचारित करता आ रहा है और धीरे-धीरे अन्य देशों के मीडिया ने भी यही राग अलापना शुरू कर दिया है. एक बड़ा साधारण-सा प्रश्न यह है कि अगर इन घटनाओं का संबंध इस्लाम से है, तो ये मुख्यतः तेल उत्पादक देशों में ही क्यों हो रही हैं?

समाज के व्याप्त भ्रम को और बढ़ाते हुए, कई लेखकों ने यह तर्क दिया है कि इस्लाम में सुधार से यह समस्या हल हो जायेगी. कुछ का कहना है कि इस्लाम को अतिवादी प्रवृत्तियों से मुक्ति दिलाने के लिए ‘‘धार्मिक क्रांति’’ की आवश्यकता है. यह कहा जा रहा है कि इस्लाम पर उन कट्टरपंथी तत्वों का वर्चस्व स्थापित हो गया है जो हिंसा और आतंक में विश्वास रखते हैं. इसलिए इस्लाम में सुधार से हिंसा समाप्त हो जाएगी.

सवाल यह है कि कट्टरपंथियों के पीछे वह कौनसी ताकत है, जिसके भरोसे वे इस्लाम की एक शांतिपूर्ण धर्म के रूप में व्याख्या को खारिज कर रहे हैं. क्या वह ताकत इस्लाम है? या इस्लाम का मुखौटा पहने कोई और राजनीति? यह मानने में किसी को कोई गुरेज नहीं होना चाहिए कि इन दिनों दुनियाभर में इस्लाम के नाम पर जिस तरह की हिंसा हो रही है, वह मानवता के इतिहास का एक कलंकपूर्ण अध्याय है और इसकी न केवल निंदा की जानी चाहिए वरन् इसे जड़ से उखाड़ने के प्रयास भी होने चाहिए.

इस्लामवादी आतंकी, मानवता के शत्रु बने हुए हैं. परंतु आवश्यकता इस बात की है कि हम इस पूरे मुद्दे को गहराई से समझने की कोशिश करें और केवल ऊपरी तौर पर जो नजर आ रहा है, उसके आधार पर अपनी राय न बनायें. हम यह समझने का प्रयास करें कि इसके पीछे कौनसी शक्तियां हैं.

हमें इस बात पर भी विचार करने की आवश्यकता है कि क्या केवल सैंद्धान्तिक सुधार से ‘‘तेल की राजनीति’’ से मुकाबला किया जा सकेगा-उस राजनीति से, जिसे चोरीछुपे कुछ निहित स्वार्थ समर्थन दे रहें हैं क्योंकि वे किसी भी तरह अपने लक्ष्यों को हासिल करना चाहते हैं. जरूरत इस बात की है कि हम उस राजनीति को पहचानें और बेनकाब करें, जिसने इस्लाम के नाम पर इस तरह की हिंसक प्रवत्तियों को जन्म दिया है.

मौलाना वहीदुद्दीन खान, असगर अली इंजीनियर और अन्यों ने उस दौर में इस्लाम का मानवतावादी चेहरा दुनिया के सामने रखा जब आतंकवाद, दुनिया के एक हिस्से से दूसरे हिस्से में फैल रहा था और अत्यंत क्रूरतापूर्ण व कुत्सित आतंकी कार्यवाहियां अंजाम दी जा रही थीं. इस्लाम की मानवतावादी व्याख्याएं आखिर मुख्यधारा में क्यों नहीं आ पा रही हैं? क्या कारण है कि कट्टरपंथी तत्व, इस्लाम के अपने संस्करण का इस्तेमाल, हिंसा और अमानवीय कार्य करने के लिए कर रहे हैं और इस्लाम के उदारवादी-मानवतावादी संस्करण हाशिए पर खिसका दिए गए हैं?

ऐसा नहीं है कि कुरान की अलग-अलग व्याख्याएं नहीं की जा रही हैं, ऐसा भी नहीं है कि तर्कवादी आंदोलन हैं ही नहीं. परंतु दुनिया के तेल के भंडारों पर कब्जा करने की राजनीति ने आतंकवादियों का उत्पादन करने वाली फैक्ट्रियां स्थापित कर दी हैं और उदारवादियों व मानवतावादियों की आवाज़ पूरी तरह से दबा दी गई है. आर्थिक-राजनैतिक कारकों के चलते, इस्लाम का मानवतावादी संस्करण कमजोर पड़ गया है.

वर्चस्वशाली राजनैतिक ताकतें, धर्म की उस व्याख्या को चुनती और बढ़ावा देती हैं जो उनके राजनैतिक-आर्थिक एजेंडे के अनुरूप होती हैं. कुरान की आयतों को संदर्भ से हटाकर उद्धृत किया जाता है और हम इस्लाम के मुखौटे के पीछे छुपे राजनीतिक उद्देष्यों को देख नहीं पाते. कुछ मुसलमान चाहें जो कहें परंतु सच यह है कि आतंकवाद और हिंसा, इस्लाम की समस्या नहीं है. समस्या है सत्ता और धन पाने के लिए इस्लाम का उपयोग किया जाना.
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