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कारगिल से सबक लेना जरूरी

विचार

 

कारगिल से सबक लेना जरूरी

रघु ठाकुर


26 जुलाई 2015 को देश ने कारगिल विजय दिवस मनाया, और 27 जुलाई 2015 को आंतकवादियों ने पंजाब के गुरुदासपुर जिले की सीमा से सटे इलाके में आंतकी हमला किया. इन दोनों घटनाओं का कोई सम्बन्ध है यह विचारणीय है.

कारगिल


परन्तु इस घटना से यह तो स्पष्ट है कि आंतकवादी या उनके पीछे की राजनैतिक सामरिक शक्तियॉ अभी भी हत्तोत्साहित नहीं है और सरकारें आज भी किंकर्त्तव्यविमूड़ जैसी स्थिति में है जो मरने वाले सैनिकों या सिपाहियों की शहादत की तारीफ तो करती है परन्तु उसकी पुर्नावृति न हो इसके लिये कुछ नहीं करती है.

रेड अलर्ट, हाई अलर्ट, कड़ा विरोध निंदनीय घटना आदि ऐसे जुमले है जो साउथ ब्लॉक या नार्थ ब्लॉक के दफ्तरों की प्रेस विज्ञप्तियों में छपे रखे है बस केवल तारीख स्थान का नाम बदल कर अखबारों में बयान, षोक संदेश और चेतावनियॉ जारी हो जाती है कुछ दिनों तक राजधानियों या बड़े शहरों में यात्रियों के सामान की जांच पड़ताल हो जाती है मानो हर रेल या बस यात्री आंतकवाद का सामान लेकर घूम रहा हो.

16 साल पहले कारगिल की लड़ाई में जिसे कारगिल युद्ध कहा गया, 490 भारतीय सेना के जवान और अधिकारी मारे गये थे. क्योंकि कारगिल की ऊॅची चोटियों पर जिन्हें भारतीय सेना ने सरकार की सहमति से मौसम के चलते सुरक्षा विहीन छोड़ दिया था. (इससे आंतकवादियों को उस मार्ग से ऊंची चोटियों पर पहुंच कर कारगिल पर ठिकाना बनाना आसान हो गया था.)

दरअसल कारगिल नाम का छोटा-सा कस्बा है जो द्रास पहाड़ियों के नजदीक है तथा श्रीनगर और लेह के बीच स्थिति है. कारगिल कस्बे में बाजार के बीच में एक पुरानी सराय भी है जो इस बात की गवाह है कि लम्बे समय से यह मार्ग व्यापार और हमलावर सैनिकों तथा बाद में घुसपेठियों के आवागमन का माध्यम रहा है.

कारगिल की लड़ाई वस्तुतः कोई बड़ी लड़ाई नहीं थी, क्योंकि 1999 में वहॉ प्रवेश कर कब्जा जमाने वाले घुसपेठियों और आंतवादियों की संख्या दहाई में थी, परन्तु भौगोलिक स्थिति उनके लिये लाभप्रद थी. क्योंकि वे ऊंची पहाड़ियों से गोलीबारी करते थे और भारतीय सेना को उन्हें घेरने के लिये नीचे से ऊपर जाना पड़ता था इसलिये उन्हें घेरने और कब्जे में लेने के प्रयास में बड़ी संख्या में भारतीय सैनिकों की कुर्बानी देश को देना पड़ी थी.

परन्तु भारत के सत्ता प्रचारतंत्र और सत्ता की राजनीति ने उसे देश के समक्ष कारगिल युद्ध बनाकर पेश किया और प्रचार तंत्र के माध्यम से समूचे देश में आक्रेाश का एक उवाल और जूनून खड़ा किया. जिससे लोग उन मूल प्रश्नों से भटक गये जिनके उत्तर तत्कालीन सरकार को देना होते है तथा जीत जैसे उन्माद और मृतक शहीद फौजियों का सम्मान और मदद का अभियान इतनी तेज आंधी के रुप में चला कि उन महत्वपूर्ण सवालों को न पॅूछा जा सका न कोई स्थान मिला.

जो अधिकारी और जवान कारगिल की चोटी को खाली करने में शहीद हुये उनकी बहादुरी और कुबार्नी निसंदेह राष्ट्र भक्ति का चर्मोत्कर्ष है, पर 16 वर्षो के बाद और 27 जुलाई 2015 की घटना के बाद क्या वर्तमान सत्ताधीश जो 1999 की सत्ताधारी पार्टी के नेताओं के उत्तराधिकारी और विरासती है निम्न प्रश्नों का उत्तर देगे:-

1. कारगिल की लड़ाई में 490 भारतीय सैनिक और जवान शहीद हुये थे, परन्तु कितने घुसपैठिये मारे गये थे इसकी संख्या क्या वह बतायेगे.


2. जब गोलियों चलाते-चलाते आंतकवादियों और घुसपेठियों के पास गोला बारुद्व समाप्त हो गया और उन्होंने अपने राजनैतिक आकाओं को यह संदेश देना षुरु किया कि उनके पास हाथियार समाप्त हो चुके हैं वे मारे जायेगे तब वे सुरक्षित कैसे निकल गये.

घुसपेठियों के संदेश स्वतः भारतीय सेना के गुप्तचर तंत्र ने रिकार्ड किये थे और उसके बाद जब 490 भारतीय शहीदों की शहादत का बदला व हथियारों को पकड़ने या मारने का वक्त आया तब उन्हें सेफ पेसेज (सुरक्षित निकासी) किसके कहने पर दी गई, और क्यों दी गई. वे कौन सी अंतरराष्ट्रीय शक्तियॉ थी जिनके दबाब में यह निर्णय लिया गया या फिर वर्ष 2000 के आसन लोकसभा चुनाव को जीतने के लिये यह गंदा खेल खेला गया, जिसमें लगभग 500 भारतीय जवानों को शहीद होना पड़ा.

3. उसके बाद भी भारत ने उन शक्तियों का नाम अधिकृत रुप से घोषित क्यों नही किया जिन्होंने इस घुसपेठ को अंजाम दिया था और इसकी क्या मजबूरियां है.

 

कारगिल विजय दिवस के अगले दिन गुरुदासपुर की घटना हुई, जिसमें आंतकवादी मारे गये तथा पांच पुलिस के जवान जिनमें एक पुलिस अधीक्षक भी मारे गये. यह क्या वजह है कि जब कभी भी आंतकवादियों से मुठ भेड़ होती है तो हमारी सेना या पुलिस को ज्यादा क्षति उठाना पड़ती है क्या आंतकवादियों या घुसपैठियों से लड़ने की रणनीति की कमी है या उन्नत हाथियारों की कमी है या फिर अन्य कारण? पर यह आमतौर पर हर आंतकवाद की घटना और उसके प्रतिकार का अनुभव है.

4. गुरुदासपुर इस अर्थ में कारगिल से भी ज्यादा चिंताजनक है कि गुरुदासपुर और पाकिस्तान के बीच की सीमा ऊॅची पहाड़ियों वाली नहीं है बल्कि काफी दूर तक मैदानी और नदी वाली जंग सीमा है. हमारी सैन्य गुप्तचरी की यह कमी है कि आंतकवादियों ने भारतीय सीमा मेें प्रवेश कर लिया, परन्तु इसकी कोई पूर्व सूचना नहीं मिल सकी. आखिर सीमा पर लगी कटीली बाढ़ और चाक चौबंद जवानांे के निगरानी के बावजूद भी यह घटना चिंताजनक है.

5. देश के गृहमंत्री ने बड़े अधिकारियों की मींटिग बुलाई, प्रधानमंत्री ने चिंतित होकर जानकारी ली, यह सब किस्से कहानियॉ भारत के लिये स्थाई हो चुके है. अब महत्वपूर्ण प्रष्न यह है कि भारत किस रुप में इसका प्रतिकार करना चाहता है और किस सीमा तक. अचानक पूर्व राष्ट्रपति कलाम साहब की दुःखद मौत ने तो मीडिया की प्राथमिकता ही बदल दी और यह स्वाभाविक भी है. यह दुःखद घटना सरकार के लिये एक प्रकार का फौरी बचाव भी बन गई, और इसलिये मैं इस विषय को पुनः कुरेदकर देश के सत्ताधीषों को उत्तर देने के लिये तथा जनमत और सामाजिक मीडिया को मूल प्रश्नों को लगातार प्रस्तुत करने के लिये एक छोटा सा प्रयास इस लेख के माध्यम से करना चाहता हॅू.

मेरी राय में:-
1. भारत सरकार को इन आतंकवादियों के पीछे की राजनैतिक ताकतों को स्पष्ट तौर पर नामजद करना चाहिये तथा जिस देश से उनका सम्बन्ध है उस देश की सरकार को स्पष्ट तौर पर समय सीमा र्निधारित करना चाहिये कि वे देश अगर राष्ट्रीय तौर पर इस आंतकवाद का समर्थन देगें तो उन षडयंत्र को रचने वाली और हथियार उपलब्ध कराने वाली जमातांे को भारत के सुपर्द करें, अन्यथा उन देषों से सम्बन्ध तोड़ लिये जाये. व्यापार, राष्ट्र, जवानों और शहीदों की कीमत पर स्वीकार नहीं हो सकता.

2. भारत को सारे तथ्यों के साथ संयुक्त राष्ट्र संघ में प्रकरण प्रस्तुत कर अपराधी देश के ऊपर समूची दुनियॉ से आर्थिक प्रतिबंध लगाने की मांग करना चाहिये. अगर ईरान पर केवल संभावना के आधार पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध दीर्घकाल को लगाये जा सकते है. जो कि बाद में गलत साबित हुये, उस पर फौजी हमला किया जा सकता है, तो फिर भारत के शत्रु देषों और हमलावरों तथा अंातकवादियों को पोषित करने वाले के विरुद्व प्रतिबंध क्यों नही लगाये जा सकते.

3. भारत को सैन्य गुप्तचरी और सीमा पर गुप्तचरी के ज्यादा वैज्ञानिक और कुशल तरीके ईजाद करने का अभियान चलाना चाहिये. सारी दुनियॉ में न केवल आज से नही बल्कि हजारों वर्षो (सदियों) से गुप्तचरी केवल फौज के माध्यम से नही होती है बल्कि जन माध्यम से भी होती है. जिसमें संम्पर्क, संवाद रिष्ते, अंतर-विरोध और फूट आदि कितने ही तरीकों का इस्तेमाल होता है. हम भारतीय लोग जब तब राम-रावण युद्ध की चर्चा करते है तो विभीषण की भी चर्चा करते है, परन्तु भूल जाते है कि विभीषण की खोज तथा रावण से असहमति की सूचना हनुमानजी ने ही दी थी. जिसके कारण रावण वध हो सका. वह घटना उस काल की सर्वश्रेष्ठ गुप्तचरी की घटना थी.

अब वह समय आ गया है कि अगर सरकारें और राजनीति ये कदम उठाकर अपना दायित्व पूरा नही करेगें तो देश की जनता को यह मानने को विवश होना पड़ेगा कि भारत के विरोधी केवल बाहृय शक्तियॉ ही नही है बल्कि भारत की हूकूमतें और भारत की कमजोर राजनीति भी है.

25.08.2015, 10.59 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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