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भारतीय होने का संयोग

विचार

 

भारतीय होने का संयोग

प्रीतीश नंदी


सुनने में अजीब लगता है, लेकिन मुझे हमेशा लगता है कि मैं संयोगवश भारतीय हूं. मैं जरा विस्तार से बताता हूं कि कैसे. भागलपुर में मेरा जन्म हुआ. इसके कारण मुझे बिहारी होना चाहिए, लेकिन मैं नहीं हूं, क्योंकि मेरी मां बंगाली थीं, जिनका परिवार बिहार में बस गया था.

तिरंगा


यजन्म लेने के लिए कुछ हफ्तों बाद ही मैं कोलकाता लाया गया, जहां मैं बड़ा हुआ. मेरे स्कूल की स्थापना एक फ्रांसीसी व्यक्ति ने की थी. पैसे और प्रसिद्धि के लिए लड़ने वाला, साहसी काम करने वाला व्यक्ति. हालांकि, मैंने वहां बंगाली और हिंदी में अच्छे अंक हासिल किए, लेकिन जो एकमात्र भाषा मैंने सीखी वह अंग्रेजी थी. कैसे और क्यों मैं नहीं जानता, क्योंकि घर में तो हम सब बंगाली बोलते थे.

इसलिए जब मैंने लिखना शुरू किया तो मैंने अंग्रेजी का चुनाव किया. मेरा पहला लेख स्टेट्‌समैन में प्रकाशित हुआ. तब मैं 13 साल का था. जल्दी ही मेरी कविता की पहली किताब प्रकाशित हुई. वह भी अंग्रेजी में थी. फिर मैंने कॉलेज छोड़ दिया. बाद में और किताबें लिखीं जब तक कि दुनिया को बदलने की इच्छा (हां, उन दिनों वाकई हमें लगता था कि हम दुनिया बदल सकते हैं) मुझे पत्रकार बनने के लिए मुंबई नहीं ले आई.

मुंबई वह जगह है, जहां मैंने जिंदगी का ज्यादातर हिस्सा गुजारा है. बीच में मैं छह लंबे वर्षों तक लुटियन्स की दिल्ली में भी रहा. अशोका रोड पर भाजपा ऑफिस के सामने आकर्षक बंगले में रहता था. संसद भवन में रियायती दरों पर मिलने वाला भोजना करता और शिवसेना के टिकट पर महाराष्ट्र के हितों का प्रतिनिधित्व करता. तो क्या मैं मुंबईकर हूं? या कोलकाता का बंगाली हूं? कि बिहारी हूं. कहीं मैं नीरद सी. चौधुरी की तरह फिर जन्म लेने वाला एंग्लोफाइल (इंग्लैंड, उसके लोगों व संस्कृति का प्रशंसक) तो नहीं हूं?

मेरे पास कोई जवाब नहीं है. ज्यादातर भारतीय मेरे जैसे ही हैं, संयोगों के गठजोड़ के परिणाम. अपने ही देश में आप्रवासी होने का जादू है यह. अपनी कई पहचानों से खुद की खोज करने का प्रयास. मैं कौन हूं? मैं क्या हूं? मैं किस जगह का प्रतिनिधित्व करता हूं? खुद को भिन्न शहरों, संस्कृतियों और नौकरियों के अनुकूल बनाने के दौरान बदलते हुए हम सब इन प्रश्नों के उत्तर तलाशने की कोशिश करते रहते हैं.

मेरी मां का शादी के पहले का नाम यह संकेत देता है कि उनके परिवार के भूतकाल में किसी का मुस्लिम धर्म से संबंध था. हालांकि उनका पहला नाम हिंदू (या बंगाली जैसे भी आप देखना चाहें) था और मैंने उन्हें प्रार्थना-आराधना के लिए एक ही जगह जाते देखा और वह था सेंट पॉल्स कैथेड्रल. वहां वे नए वर्ष की पूर्व संध्या पर जाती थीं. किसी आस्था की बजाय इसमें परंपरा की भूमिका ज्यादा थी. मेरे पिता जन्म से हिंदू थे और उनका परिवार कालीघाट का था. उनके पिता ने पुनर्विवाह किया और उन्हें त्याग दिया.

इसके बाद मेरे पिता, उनकी माता और दो बहनों ने खुद को सड़कों पर पाया. अपनी रोजी-रोटी के लिए संघर्ष करते हुए. सड़क से गुजरते एक यहूदी को उन पर दया आई और उसने उन्हें बिष्णुपुर में शरण दी, जहां वह एक स्कूल चलाता था. स्वतंत्रता संघर्ष ने मेरे माता-पिता की मुलाकात कराई. उन्होंने शादी की और हम तीन भाइयों का जन्म हुआ.

कभी भी मेरे मन में यह सवाल नहीं उठा कि मेरा धर्म क्या है, मैं किस राज्य का हूं, मेरी भाषा क्या होनी चाहिए, किस संस्कृति के लिए मुझे संघर्ष करना चाहिए (मेरी किशोरावस्था के वर्ष हंगरी पर हमला करने वाले रूसियों और वियतनाम पर हमला करने वाले अमेरिकियों का विरोध करते बीते. मेरा ख्याल है बंगाली डीएनए का यह असर था).

यदि आप अपने आस-पास देखें तो आपको मेरे जैसे बहुत से लोग नज़र आएंगे, जिनकी भारतीयता का रंग संयोगवश ही तय हुआ है. उनमें से हर व्यक्ति अपनी क्षेत्रीय संस्कृति, भाषा और धर्म की कसमें खाएगा या (मेरी तरह) नहीं खाएगा. और वे जब इस सब से भटकते रहते हैं और खुद को खोजते हैं तो वे भारतीय होने का जादू भी खोज लेते हैं.

नहीं, बात उलटी नहीं है, जैसा कि आजकल हमें भरोसा दिलाने की कोशिश की जा रही है. कोई भी भारतीय होने के बोध के साथ जन्म नहीं लेता. कोई भी तिरंगा बुनते हुए और ‘जन गण मन’ गाते हुए जन्म नहीं लेता. हम सब कभी उस चरण में पहुंचते हैं, अपने-अपने अस्त-व्यस्त तरीकों से. यह समझने की कोशिश करते हुए कि इस अद्‌भुत राष्ट्र ने इतनी सदियों तक खुद को एकजुट कैसे रखा.

भारतीय होने का मतलब कोई खास भाषा बोलने की योग्यता नहीं है, फिर चाहे हम में से कुछ लोग ऐसा सोचते हैं. यह उन देवाताओं के बारे में नहीं है, जिनकी हम पूजा करते हैं या उन परंपराओं की भी नहीं हैं, जो हमें विरासत में मिली है. इसका संबंध हमारी रगों में बहती गहरी देशभक्ति के उत्साह से भी नहीं है. तथ्य तो यह है कि जितना आप शहरों के बाहर जाएं, लोगों में भारतीय होने के अर्थ की परवाह कम होती जाती है. उन्हें जो बातें समझ में आती है वे हैं- जाति, बोली, सम्मान, रीति-रिवाज. इनसे ही वे अपनी पहचान तय करते हैं.

मैं जब ईशोपनिषद का अनुवाद करता हूं, तो भारतीय होता हूं. मैं जब अपनी बेटियों को जीबनानंद दास की रचनाएं सुनाकर उन्हें बताता हूं कि कैसे उनसे मुझे बंगाल पर गर्व होता है, जहां मैं बड़ा हुआ. मैं जब फैज़ की पंक्तियां पत्नी को सुनाता हूं तो मैं भारतीय होता हूं. मैं तब भी भारतीय होता हूं जब मैं जब ‘ल्युअर ऑफ ए फैदलेस वुमन’ (आस्थाहीन महिला का आकर्षण) से लोर्का को उद्‌धृत करता हूं. मैं जो भी होने का चुनाव करूं, तब भी मैं रहता तो भारतीय ही हूं. यही वह स्वतंत्रता है, जो भारतीय होने से मुझे मिलती है.

इसलिए यह एक अच्छा विचार हो सकता है कि अपने राष्ट्रीय पर्वों पर हम नए तरह की कृत्रिम देशभक्ति को दरकिनार कर उस स्वतंत्रता का जश्न मनाएं, जो आपको, मुझे और हम में से प्रत्येक को भारतीय के रूप में परिभाषित करती है. यही वह स्वतंत्रता है, जिसकी रक्षा करने की हमें जरूरत है. ऐसा भारतीय होने की स्वतंत्रता, जो जिस भी तरह से हम से प्रत्येक होना चाहता है.

भारतीय होना एक प्रक्रिया है. इसे सिखाया नहीं जा सकता. यह प्रयास और गलतियों की प्रक्रिया में खोजा जाता है. इसे धमकियों व प्रतिबंधों से लागू नहीं किया जा सकता. भारतीय होना सीखने का एक ही तरीका है कि हम स्वतंत्र होना सीख लें. स्वंतत्रता ही वह ध्वज है, जिसके नीचे हम सबने जन्म लिया है और आज हमारी सर्वोच्च चिंता भी स्वतंत्रता की रक्षा की ही होनी चाहिए.

हां, हम में से प्रत्येक अलग है. यह भिन्नता तो हमें एकसाथ लाती है. एक देश, राष्ट्र के रूप में. लड़ते, झगड़ते, बहस करते कुछ अच्छा करने के लिए संघर्ष करते हुए. यही संघर्ष तो हमें एकसाथ बनाए रखेगा.

29.08.2015
, 18.30 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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