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अधिकारियों का नहीं जनता का उत्पीड़न

मुद्दा

 

अधिकारियों का नहीं जनता का उत्पीड़न

रघु ठाकुर


म.प्र. की विधान सभा में पिछले दिनों एक साथ दो घटनायें घटी. एक तो यह कि प्रदेश की विधानसभा ने 7 कानून बगैर बहस के पारित कर दिये. जिनमें एक कानून वह भी है जो अधिकारियों और सत्ताधीशों के विरुद्ध मुकदमें दर्ज कराने के ऊपर प्रतिबंध लगाता है. इस कानून को म.प्र. तंग करने वाले मुकदमें बाजी निवारण कानून का नाम दिया गया हैं सम्बन्धित विभाग की मंत्री सुश्री कुसुम महदेले ने विधानसभा में यह जानकारी भी दी कि यह कानून म.प्र. उच्च न्यायालय की सिफारिश के आधार पर बनाया गया है.

शिवराज सिंह चौहान


यह कानून वास्तविक अर्थो में असवैधांनिक और व्यक्ति के नागरिक अधिकारों को प्रतिवंधित करने वाला है. इस कानून के पारित होने के बाद अगर राज्यपाल इस पर हस्ताक्षर कर देते है तो किसी भी अधिकारी या मंत्री के विरुद्ध न्यायिक प्रकरण दर्ज करना या एफ.आई.आर दर्ज करना कठिन और दुष्कर कार्य हो जायेगा.

अभी तक पुलिस या अन्य कार्यवाही से ऐसी सुरक्षा केवल संविधानिक पद धारण करने वालो को ही थी, और इसीलिये यह मान्य परम्परा ही है कि अगर किसी संविधानिक पद वाले के विरुद्ध कोई ऐसे गम्भीर आरोप जो पुलिस या न्यायालय द्वारा संगीन अपराध के हो तो वे अपने पद से या तो स्वतः इस्तीफा दे देते थे या फिर उन्हें उनके उच्च अधिकारी इस्तीफे को बाध्य करते थे.

सेवा नियमों में एक यह भी प्रावधान था कि किसी लोक सेवक के विरुद्ध कोई कार्यवाही करना हो तो सम्बन्धित शासन से उसकी स्वीकृति लेना होती थी. इस प्रावधान का भी व्यवस्था तंत्र के द्वारा निरंतर दुरुउपयोग होता रहा तथा अधिकारियों के विरुद्ध मुकदमा दर्ज कराने की अनुमति देने का काम चुन-चुनकर होता था.

सरकार के पक्षपात से बहुत सारे अधिकारी वैधानिक कार्यवाही से बच जाते थे और कई मामलों में तो वर्षानुवर्ष तक अनुमति के प्रकरण निंलबित पड़े रहते थे, या फिर फाइलों में बंद घूमते रहते थे. ऐसे प्रकरणों के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने स्वतः यह निर्णय दिया कि अगर निश्चित अवधि के अंदर अनुमति नही दी जाती है या बगैर कारण बताये अनुमति आवेदन खारिज किया जाता है तो पहले मामले में बगैर अनुमति के मुकदमें दर्ज हो सकेगें, और दूसरे प्रकार के मामलो में अनुमति निरस्त करने को न्यायपालिका में चुनौती दी जा सकेगी. सर्वोच्च न्यायालय के इसी निर्णय के बाद अधिकारियो पर एक मानसिक दबाव बना था कि वे विधानसंगत काम करें तथा पीड़ित पक्ष को न्याय पाने का मार्ग खुला था.

परन्तु राज्य सरकार ने विधानसभा में जो यह कानून पारित कराया है इससे सत्ता और नौकरशाही की जकड़न और मनमानी को और अधिक बढ़ जायेगी, तथा अब अधिकारी और भी मदमस्त तथा निरकुंश हो जायगे. दरअसल सरकार के मंत्री अधिकारियों से कई ऐसे काम कराते है जो वैधानिक नहीं होते है परन्तु उनके लिये जिम्मेदारी आदेशकर्ता अधिकारी की होती है.

कई अवसरों पर तो कभी-कभी उन्हें न्यायपालिका के समक्ष अपराधी के रुप में जाना पड़ता है. पिछले दिनों केन्द्र से लेकर राज्य तक ऐसे अनेक मामले हुये, जहॉ मंत्रियों के गलत आदेश का पालन करने वाले अधिकारी जेल के सीकचों के भीतर पहॅुचे.

पूर्व केन्द्रीय संचारमंत्री श्री सुखराम के कार्यकाल के दौरान हुई गड़बड़ियों पर जब कार्यावाही हुई. तब उनकी सचिव को भी गिरफ्तार किया गया. अभी हाल में कोयला घोटाला में भी कई अधिकारी आरोपी है. म.प्र. के व्यापंम घोटाले में भी जो अधिकारी जेल में है उनमें से कुछ लोग इस प्रकार के आदेश पालन कर्ता व कुछ आंशिक आरोपी हो सकते है.

ऐसी प्रतीत होता है कि प्रदेश सरकार ने अधिकारियों को अपने गलत आदेशों के पालन के लिये भय मुक्त करने को यह कानून बनाया है. भारतीय संविधान में नागरिक को यह अधिकार दिया है कि वह किसी असवैधानिक कार्य के विरुद्ध न्यायालय में जा सकता है और न्याय की मांग कर सकता है. न्यायपालिका को यह भी अधिकार दिया गया है कि अगर कोई व्यक्ति द्वेषपूर्ण ढ़ंग से याचिका या कार्यावाही करता है तो उसके विरुद्ध न्यायपालिका दंडात्मक कार्यावाही कर सकती है.

अनेक मामलों में सुप्रीमकोर्ट और हाईकोर्ट ने ऐसी अनावष्यक याचिकाओं को लगाने वालों के विरुद्ध दडांत्मक आदेश दिये है, तथा उन पर लाखों रुपये का जुर्माना भी लगाया है. जब यह अधिकार न्यायपालिका के पास पहले से ही था तो फिर एक नया अवरोध खड़ा करने की आवष्यकता क्या है? कुल मिलाकर गरीब लोग ही ऐसे प्रावधानों के शिकार होगे.

कई मामलों में न्यायपालिका का स्वर गरीब विरोधी हो गया है और न्यायपालिका एलीट क्लास सेलिब्रिटी व मीडिया के प्रिय ताकतवर लोगों के पक्ष में खड़ी होती नजर आती है. अनेक उच्च न्यायलयों ने जनहित याचिका लगाने की फीस बढ़ाकर हजारों रुपये कर दी है. क्या यह गरीब और आम आदमी के संवैधानिक अधिकार पर प्रतिबंध नहीं है?

1980 के दशक में जस्टिस भगवती ने गरीबों के पोस्ट कार्ड को याचिका के लिये आधार मानकर सुनवाई की और यहॉ तक की भारत सरकार को उनके पक्ष में कानून बनाने को बाध्य किया. ’’बंधुआ मजदूर मुक्ति कानून’’ वस्तुतः ऐसी ही याचिका का परिणाम है जो एक मजदूर के द्वारा न्यायालय को उस जमाने के 15 पैसे के पोस्ट कार्ड पर भेजे गये थे.

मानव अधिकारों के राजनैतिक विद्धेष से गिरफ्तारी के अनेक मामलों में न्यायपालिका ने न केवल हस्तक्षेप किया बल्कि न्याय और संवैधानिक अधिकारों के उच्च मापदंड स्थापित किये. परन्तु अब न्यायपालिका का वर्गीय चरित्र सामने आ रहा है जहॉ न्यायपालिक गरीब और कमजोर के बजाय सम्पन्न और ताकतवर के पक्ष में खड़ी होती नजर आती है.

सूचना के अधिकार के अंतगर्त सुप्रीम कोर्ट के जज साहब के इलाज खर्चे की जानकारी देने में, सुप्रीम कोर्ट ने इन्कार कर दिया, यह क्यों? मैं मानता हॅू कि कुछ लोग अपने नागरिक अधिकारों का दुरुपयोग करते या कर सकते है. परन्तु चंद लोगों के द्वारा दुरुपयोग के मामले को लेकर समूचे देश या प्रदेश के नागरिक और संवैधानिक अधिकारों को प्रतिबंधित करना उचित नहीं है.

न्यायिक सिद्वांत तो यह रहा है कि सौ गुनहगार छूट जाये परन्तु एक र्निदोष को सजा नहीं होना चाहिये. जैसा कि मंत्री श्री कुसुम महदेले ने विधान सभा के समक्ष कानून पेश करते हुये यह कहा कि हाईकोर्ट के निर्देश पर हम यह कानून पेश कर रहे है. अगर यह सच है तो यह एक ऐसी घटना होगी जिसमें माली ही अपने पेड़ को नष्ट कर रहा है. जिस न्यायपालिका को संविधान ने संविधान के प्रावधानों की रक्षा का काम सौपा है वह न्यायपालिका संविधानिक प्रावधानों की हत्या की गुनाहगार बन रही है.

व्यापंम घोटालों को लेकर मुख्यमंत्री के इस्तीफे की मांग के पक्ष विपक्ष में तर्क दिये जा सकते है. सरकार इस्तीफे न देने के लिये कह सकती है कि सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर सी.बी.आई जांच षुरु हुई है और जॉच के परिणाम आने तक उनके ऊपर इस्तीफे की वैधानिक बाध्यतः नही है तथा प्रतिपक्ष को जॉच का इंतजार करना चाहिये. प्रतिपक्ष कह सकता है कि सरकार को आरोप के आधार पर नैतिक दायित्व तथा निष्पक्ष जॉच के लिये इस्तीफा देना चाहिये. हांलाकि दोनो ही पक्ष अतिरेकी और पक्षपात पूर्ण है.

जब केन्द्र में कांग्रेस सरकार थी तब भाजपा ने लगातार कई वर्षो तक इसी आधार पर संसद को नही चलने दिया था कि सरकार के मंत्रियों और प्रधानमंत्री पर आरोप है तथा उस समय निष्पक्ष और नैतिकता के पक्ष में तत्कालीन प्रतिपक्ष के रुप में भाजपा खड़ी थी. तथा कांग्रेस सत्ता पक्ष जांच रपट का इंतजार करे तथा तब तक इस्तीफे नही देगे के तर्क के साथ खड़ी थी. अब भूमिका बदल चुकी है अब भाजपा सरकार में है और वह कांग्रेस के जुमले बोल रही है तथा कांग्रेस प्रतिपक्ष में है और वह भाजपा के जुमले बोल रही है तुमने हमारी थाली को गंदा कहा तो हम तुम्हारी थाली को गंदा कहेगे.

यह सत्ता और प्रतिपक्ष की भूमिका है परन्तु इस भूमिका के परिणाम समाज पर क्या होने वाले है इसकी चिंता न सत्ता पक्ष को है न प्रतिपक्ष को? ’’म.प्र. तंग करने वाले मुकदमें बाजी निवारण कानून’’ के नाम से एक गंदा और अलोकतांत्रिक, असंवैधानिक कानून म.प्र. विधान सभा में पारित हो गया. सत्ता और प्रतिपक्ष के बीच में तुमने हम को मारा इन ने हमको छेड़ा उनने घूंसा मारा, इनने चप्पल दिखाई.

इस बहस के आधार पर 10 दिन का सत्र मात्र पांच दिन में समाप्त हो गया. और वस्तुतः तीन ही दिन में जब प्रदेश के जन प्रतिनिधि ये आरोप विधानसभा के अंदर की घटना को लेकर लगा रहे है तो स्पीकर को सी.सी.टी.वी. कैमरों को देखकर दोशी या झूठे आरोप लगाने के दोशी दोनों के विरुद्ध कार्यावाही करना चाहिये. प्रदेश के जागरुक लोगो को यह अंदेशा पहले से था और मुझे कई वरिष्ठ पत्रकारों और वरिष्ठ विधायकों ने यह पूर्व संकेत दे दिया था कि विधानसभा शीघ्र स्थगित हो जायेगी.

यह कितना मिला जुला खेल है, कितनी रणनीतिक भूल है इसका फैसला तो प्रदेश की जनता व समय करेगा परन्तु यह परिणाम निर्विवाद है कि आज प्रदेश का आम आदमी सत्ता और प्रतिपक्ष दोनों से ठगा हुआ महसूस कर रहा है.

05.09.2015, 19.39 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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