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मौजूदा दौर में एक अपराध

विचार

 

मौजूदा दौर में एक अपराध

प्रीतीश नंदी


काम के सिलसिले में उनसे मुलाकातें होती रही हैं. और हां, मैं इंद्राणी से भी दो-चार बार मिला हूं. मुझे वह दिखावा करने वाली और आत्ममुग्ध लगी. हमारी आकस्मिक होने वाली मुलाकातें वहीं तक रहीं. दूसरी ओर पीटर बिल्कुल अलग ही व्यक्ति हैं. मिलनसार और खुशमिजाज, लेकिन उनके साथ कभी कोई काम जम नहीं पाया. हो सकता है उनका यही तरीका हो. अलग-अलग सीईओ का इनकार करने का अलग-अलग तरीका होता है.

इंद्राणी मुखर्जी


पीटर का अपना तरीका था. उन्होंने कभी टेलीफोन कॉल उठाने में आनाकानी नहीं की न कोई बैठक टाली. वे इतने विनम्र हैं कि कड़ाके की सर्दीवाली रात को वे किसी एस्किमो से पार्का (गर्म जैकेट) उन्हें देने के लिए राजी कर सकते हैं. उनकी विनम्रता इतनी मोहक है. चौदह साल बाद जब उन्होंने स्टार टीवी छोड़ा तो उन्होंने अपने इसी मोहक अंदाज के सहारे कुछ बहुत ही घाघ निवेशकों को मीडिया कंपनी शुरू करने के लिए 750 करोड़ रुपए ढीले करने पर राजी कर लिया.

2007 का यह प्रयास मुझे तो मूर्खतापूर्ण ही लगा था. दो साल से भी कम वक्त में यह इसकी कार्यकारी सीईओ इंद्राणी के नेतृत्व में गोता खा गया. उसे मीडिया का कोई ज्ञान या अनुभव नहीं था, जो कई बार अच्छी बात होती है. इन दोनों गुणों के बिना भी कई लोग सफल हुए हैं. किंतु उसमें रौब दिखाने की प्रवृत्ति थी. कुछ ज्यादा ही. उसके साथ पीटर भी थे, जिनके पास ज्ञान और अनुभव दोनों थे, लेकिन उनकी ठीक-ठीक भूमिका क्या थी, यह किसी को पता नहीं था.

सालभर में ही मीडिया कंपनी वेंटीलेटर पर पहुंच गई. कुछ महीनों बाद भारत की सबसे मशहूर मीडिया जोड़ी ने अपना बोरिया-बिस्तर बांधा और विदेश में लंबी छुट्‌टी पर रवाना हो गए. ये छुटि्टयां छह साल चलीं.

दोनों से मुझे कोई शिकायत नहीं है. वे अपनी निजी गोपनीय बातें मुझसे शेयर नहीं करते थे और न अपनी खुशकिस्मती. मैंने 40 हजार रुपए से अपनी कंपनी शुरू की और कई झटके खाने के बावजूद यह करीब 23 साल से कायम है. मुझे यह तो कबूल करना ही होगा कि जब पीटर ने 750 करोड़ रुपए से इस आश्वासन के साथ कंपनी शुरू की कि यदि लक्ष्य हासिल हुआ तो और पैसा भी मिलेगा तो मुझे उनसे बहुत ईर्ष्या हुई.

दोनों ने मिलकर यह पैसा जल्दी ही फूंक दिया, लास वेगस के कैसिनो की ब्लैकजैक टेबल पर लोग पैसा गंवाते हैं, उससे भी तेज गति से. ऐसी भी चर्चा थी कि गंभीर धोखाधड़ी से संबंधित विभाग उनकी कंपनी के मामलों की जांच कर रहा था, लेकिन मेरा ख्याल है तब तक आईएनएक्स मीडिया में किसी की रुचि नहीं रह गई थी. यदि आपको पता न हो तो इंद्राणी के लिए आईएनएक्स वही थी, जो एचआरएक्स रितिक के लिए थी. पहले दो अक्षर तो मालिक के नाम के हैं और एक्स का मतलब है एक्स्ट्रीम (यह रितिक रोशन का एपेरल ब्रांड था).

वित्तीय हेराफेरी की सतत अफवाहों के बावजूद किसी ने सोचा नहीं था कि यह कहानी कौटुम्बिक व्यभिचार, अपहरण, ब्लैकमेल और हत्या के आरोपों वाली तेज रफ्तार क्राइम थ्रिलर में बदल जाएगी. इसे लेकर मीडिया कवरेज इतना आक्रामक था कि हफ्ते-दस दिन तो कोई और खबर इसके आगे ठहर ही नहीं सकी. समान रैंक, समान पेंशन का अनशन भुला दिया गया.

प्याज की बढ़ती कीमतें, आगामी बिहार चुनाव को लेकर अटकलें और अपनी ही पार्टी पर शत्रुघ्न सिन्हा की मजेदार छींटाकशी- सबकी अनदेखी हो गई. यहां तक कि नरेंद्र मोदी और किंवदंती बन चुके गुजरात मॉडल को चुनौती देने वाले और धूमकेतु की तरह उभरे 22 वर्षीय हार्दिक पटेल भी पहले पन्ने पर जगह नहीं पा सके. मुखर्जी प्रकरण के शोर में एफटीआईआई के हड़ताली छात्रों की आवाज तो पूरी तरह गुम हो गई.

इस प्रकरण में दो बातें सिद्ध हुईं. एक तो यह कि तथ्यों की गहराई तक पहुंचने में पुलिस की तुलना में मीडिया ज्यादा होशियार सिद्ध हुआ है, जो इतनी बुरी बात भी नहीं है, लेकिन जो चीज खतरनाक चलन शुरू कर सकती है वह यह तथ्य है कि अब मीडिया न्याय करने और सजा देने वाले की भूमिका निभाना चाहता है. हमने हाल में कई मौकों पर यह होते देखा है. खासतौर पर आरूषि मामले में, जिसमें मीडिया ने मुकदमा शुरू होने के पहले ही तलवार दंपती को सूली पर चढ़ा दिया था.

अब जाकर कुछ देर से ही, पीछे मुड़कर देखने पर आत्म-परीक्षण और वैकल्पिक दृष्टिकोण धीरे-धीरे जगह बना रहा है. अब इसका कोई कानूनी औचित्य होगा या नहीं, यह कहना मुश्किल है, लेकिन आरूषि के पालक जनमत की अदालत में इतने खुलेरूप से दोषी बताए गए और वह भी मुकदमे के इतने पहले कि इस बात पर भरोसा होना मुश्किल है कि अदालत का फैसला इससे प्रभावित नहीं हुआ होगा.

आज हम सब विस्टेरिया लेन (यह अमेरिका के लोकप्रिय टेलीविजन सीरियल ‘डेस्पिरेट हाउसवाइव्स’ में काल्पनिक गली का नाम है. इसके हर घर की कहानियों पर सीरियल केंद्रित था) पर रहते हैं. हर घर में कोई न कोई कहानी है और इनमें से ज्यादातर कहानियां हमेशा ही बहुत अच्छी नहीं होतीं. लेकिन खबरें देखने-पढ़ने वाली नई पीढ़ी, तात्कालिक उन्माद की दैनिक खुराक पर पली-बढ़ी है और उसे ऐसी कहानियां पसंद हैं. यही वजह है कि हर कुछ दिनों बाद ऐसी खबरें अन्य सारी खबरों को परे हटाकर सुर्खियां बटोर लेती हैं.

ये इतनी लोकप्रिय हैं कि शहर के पुलिस कमिश्नर मैदान में उतर जाते हैं और व्यक्तिगत रूप से प्रेस ब्रीफिंग करने लगते हैं. जो लोग शिकायत करते थे कि घपलों-घोटालों के ओवरडोज के साथ राजनीति जरूरत से ज्यादा ही सुर्खियों पर कब्जा करती रही हैं, उनके लिए यह नया विकल्प है. डेस्पिरेट हाउसवाइव्स और डेक्स्टर एक साथ एक भूमिका में.

लेकिन यह हमारे समय, हमारे मीडिया, हमारी कानून-व्यवस्था, हमारी न्याय प्रणाली और सबसे बढ़कर हम जो जिंदगी आज जी रहे हैं, उसके बारे में क्या कहता है? शायद इस पर सोच-विचार करना उपयोगी होगा, क्योंकि यदि आप सारी मसालेदार चीजें निकाल दें तो हमारे हाथ क्या लगता है? एक सीधी-सी कहानी. एक लापता युवती, तीन विरोधाभासी कहानियों वाले तीन संदिग्ध. ब्लैकमेल करने के संकेत और ऐसा प्रतिष्ठित युगल, जिसका आज कोई मित्र नज़र नहीं आता. और हां, बहुत-सा लापता पैसा भी इस प्रकरण में शामिल है, जिस पर आज हर कोई हाथ मारना चाहता है.

किंतु मैं तो पुरानी शैली का पत्रकार हूं. मैं खालिस तथ्यों पर भरोसा करता हूं. मैं सतही चीजों के आधार पर लोगों का आकलन नहीं करता. फिर चाहे वे विस्टेरिया लेन पर ही क्यों न रहते हों.

10.
09.2015, 20.00 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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