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आज भी जरूरी हैं गांधी

विचार

 

आज भी जरूरी हैं गांधी

रघु ठाकुर


अभी कुछ दिन पूर्व मेरे एक कट्टर मार्क्सवादी मित्र जो अमूमन अपनी बातों में मार्क्स और लेनिन का उल्लेख करते थे, ने बातचीत में मुझसे कहा कि अब कोई व्यक्ति मेरा आर्दश नही है. उनके इस कथन को सुनकर मैं चुप हो गया और मैंने उनकी इस टिप्पणी को समझने के लिये उन्हें कुछ कुरेदने का प्रयास किया.
 

gandhi

इमुझे वे बहुत निराश लगे और एक ऐसे व्यक्ति जिनने अपने जीवन के 65 वर्षो में से लगभग 45 वर्ष मार्क्स और लेनिन को उद्धृत करते गुजारे हो, उनके विचार और कर्म के आधार पर अपने सपने बुने हो, की मानसिक निराशा को मैंने समझने का प्रयास किया. यह कोई एक व्यक्ति की निराशा मात्र नही हैं बल्कि आज कि दुनियॉ में ऐसे लाखों लोग है जो इस प्रकार की वैचारिक निराशा का शिकार है. और तब मुझे गांधी की प्रासंगिकता और अधिक महसूस हुई, कि गांधी ही एक ऐसे विचार पुंज है जो आज भी लोगों में आशा और एक वैकल्पिक दुनियॉ के सपनों का संचार करते है.

मैंने उनसे कहा कि मेरे आदर्श तो आज भी गांधी है और गांधी हमें यानि आज की दुनियॉ को बहुत जरुरी है. उनका प्रति प्रश्न था, कि यह कथन किन आधारों पर खड़ा है? और उनसे हुई कुछ लंबी बात ही मेरे इस लेख का आधार बनी. अभी हाल में ही दुनियॉ में घटी इन घटनाओं पर हम दृष्टिपात करें:-
1.ग्रीस की अर्थव्यवस्था का संकट और दिवालियापन.
2. जापान सरकार के द्वारा पारित युद्ध में सहयोग का प्रस्ताव.
3. मलेशिया की राजधानी कुआलालम्पुर में, प्रधानमंत्री के भ्रष्ट आचरण के विरुद्ध लाखों लोगों का जमावड़ा और इस्तीफे की मांग.
4. पाकिस्तान के एक प्रांत बलूचिस्तान में आंतकवादी गुट द्वारा सैन्य हवाई अड्डे पर आंतकी हमला तथा भारत के पंजाब के गुरुदासपुर और कश्मीर में आंतकवादी हमले.

यह दुनियॉ की चार घटनाएं है. इन घटनाओं की क्रमवार चर्चा और निष्कर्ष, हमें याने दुनियॉ को गांधी क्यों जरुरी है सिद्ध करने के पर्याप्त आधार है:-
ग्रीस की सरकार और लोगों ने लगातार विलासिता पूर्ण जीवन जिया उसके लिये दुनियॉ से कर्ज लिया और चार्वाक के कथन ’’कर्ज लो और घी पियो’’ को चरितार्थ किया. इसके परिणाम स्वरुप दुनियॉ के देशों विषेषतः यूरोप के देशों का कर्ज ग्रीस पर इतना बढ़ गया कि ग्रीस दिवालिया हो गया और कर्ज चुकाने की स्थिति में नही रहा.

तब अंर्तराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने दिवालियेपन से मुक्ति के लिये ग्रीस को अपनी शर्तो को स्वीकार करने का प्रस्ताव दिया परंतु ग्रीस की भोगवादी जनता और सरकार ने प्रस्तवों को स्वीकार करने के बजाय जनमत संग्रह कराया और जनमत संग्रह ने बहुमत से इन प्रस्तावों को नकार दिया. परंतु जब अंर्तराष्ट्रीय मुद्रा कोष और यूरोप के देशों ने ग्रीस पर आर्थिक प्रतिबंध लगाये तो ग्रीस मुश्किल से 3-4 दिनों में ही ढेर हो गया और जिस सरकार ने जनमत संग्रह कराने का निर्णय लिया था उसी सरकार को जनमत संग्रह के निर्णय को नकारना पड़ा. तथा उसे यूरोपीय साहूकारों और अंर्तराष्ट्रीय मुद्रा कोष के समक्ष समर्पण करना पड़ा.

ग्रीस ने उनकी मांगो व प्रतिबंधो को स्वीकार कर लिया. अगर गांधी के ’’न्यूनतम और जरुरी उपभोग’’ के सिद्वातों को ग्रीस ने माना होता तो आज ग्रीस को अपनी आर्थिक और राजनैतिक आजादी का समर्पण नही करना पड़ता. गांधी न्यूनतम और जरुरी आवश्यकताओं के पक्ष में थे. यहॉ तक कि उन्होंने अपने आश्रमवासियों पर प्रति व्यक्ति 6 पैसा रोज खर्च करने की सीमा बांधी थी. उनकी नातिन ने अपने संस्मरण में बताया कि उनकी एक पेंसिल जो घिसकर मुश्किल से 1 इंच बची थी को उन्होंने (नातिन ने) लापरवाही से या गैर जरुरी समझ कर अलग कर दिया. जब बापू ने उनसे पेंसिल मांगी तो उन्होंने नई ला कर दी परंतु गांधी ने नई पेंसिल से काम करने से इंकार कर दिया और कहा कि वही घिसी हुई पेंसिल लाओं. काफी खोज बीन के बाद कचरे से खोजकर वह पेंसिल लाई गई और तब बापू ने उससे अपना काम किया.

इस एक सामान्य सी घटना से उन्होंने समाज को असामान्य सिद्धांत सिखाना षुरु किया था, कि किसी वस्तु को बेकार मान कर नहीं फंेकना चाहिए. उसका आखिरी क्षणों तक उपयोग करना चाहिए. क्योंकि उसके पीछे प्रकृति का उपयोग है. पेंसिल बनाने के लिये पेड़ काटा जायेगा और उतने ही पेड़ कटें जो जरुरी है ताकि प्रकृति संरक्षित रहे.

अभी हाल में भारत के वित मंत्री श्री अरुण जेटली ने कहा है कि ग्रीस के संकट से हमें सबक लेना चाहिये और विलासिता के खर्चो से बचना चाहिए. यह बात अलग है कि यह कहते हुए उन्होंने गांधी का नाम नही लिया. हो सकता है कि यह उनकी राजनैतिक सीमाओं की लाचारी हो. परंतु वे यह कहकर गांधी को ही स्वीकार कर रहे थे. इसीलिये गांधी कहते थे कला बनी चीज को मिटाना नही वरन बिगड़ी चीज को संवारना है. गांधीवादी कलाकारों ने टूटे फूटे सामानों का इस्तेमाल अपनी कला कृतियों के निर्माण में किया है.

दूसरी घटना का जिक्र मैंने किया है वह जापान के द्वारा ’’युद्व में सहयोग’’ का प्रस्ताव है. द्धितीय विष्व युद्व के दौरान जापान के हिरोंशिमा और नागासाकी पर अणुबम हमले के बाद जिस तरह की तबाही को जापान ने भोगा था और जिसके परिणामस्वरुप जापान को मित्र राष्ट्रों के समक्ष आत्म समर्पण करना पड़ा था वह सर्वविदित है. जापान के हुकुमरानों को लाचार होकर अपनी आजादी का समर्पण करना पड़ा था. इसके बाद से जापान ने किसी भी युद्व में सहभागी बनने के ऊपर स्वैच्छिक रोक लगाई थी और युद्व की विभिषिका को आत्म सात कर शांति के मार्ग को स्वीकार किया था.
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