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तकदीर बदल सकता है एक वादा

विचार

 

तकदीर बदल सकता है एक वादा

प्रीतीश नंदी


मोदी सरकार के साथ दिक्कत यह है कि यह एक साथ कई चीजें करने की कोशिश कर रही है और यह नहीं कहा जा सकता कि उनमें सफल हो रही है. यह राजनीतिक अनुभवहीनता का चिह्न है, नाकामी का नहीं. भारत पर शासन चलाना आसान नहीं है. हमारी समस्याओं को मात देना ऐसा ही है जैसे रक्त बीज राक्षस का नाश. आप एक को खत्म करते हैं और उसके रक्त से कई और पैदा हो जाते हैं.
 

नीतीश लालू मुलायम

इसमाधान में से और भी जटिल समस्याओं का सिलसिला निकल आता है और वह भी ऐसी जगह से जहां इसकी संभावना बहुत कम हो. सुनने में चाहे अजीब लगता है पर लगभग हर समाधान अलग संकट को जन्म देता है. आपके लिए तो यही है अतुलनीय भारत.

क्योंकि भारत वह नहीं है, जो हम सोचते हैं. यह हमारी सर्वाधिक विचित्र कल्पनाओं से भी परे है. एक शक्तिशाली और बाहुबली हिंदू राष्ट्र भाजपा का भारत है, जिस पर केंद्र से ताकतवर व ईमानदार नेता आसानी से शासन कर सकता है. इसमें सिर्फ आलोचक और सोचने-समझने वाले लोग ही बाधक हैं. यदि इन्हें चुप नहीं किया जा सकता तो सहयोगी संगठनों के लोगों द्वारा शोर मचाकर उनकी आवाज दबा दी जानी चाहिए. अब शिकायत करने का मतलब नहीं है. पिछले चुनाव में इसी के लिए तो हमने वोट दिया था.

सौभाग्य से जिस भारत में हम रहते हैं वह ठीक इसके उलट है. केंद्र जितना ही ताकतवर होता है, राज्य उतने ही बेकाबू होते जाते हैं. यदि आप इतिहास पर नज़र डालें तो आपको हमेशा ऐसा ही होता दिखाई देगा. राष्ट्र के जटिल संघीय ढांचे और अत्यंत स्वतंत्र क्षेत्रीय दलों को ठीक से संभाल लेना ही भारत पर शासन करने की कुंजी है. केंद्र की ज्यादातर सरकारें अपने शुरुआती उत्साह में यह तथ्य भूल जाती हैं. जब तक उन्हें इस तथ्य का अहसास होता है, काफी देर हो चुकी होती है.

मनमोहन सिंह इसके आदर्श उदाहरण हैं. उन्होंने अच्छी शुरुआत की थी. किंतु बाद में वे जो भी करते उसमें गांधी परिवार के सदस्य हस्तक्षेप करने लगे और जल्द ही वे हिम्मत हार गए. वैसे भी वे कमजोर व्यक्ति थे और राजनीति उनको समझ में नहीं आती थी. इसलिए वे राष्ट्रीय विचार-विमर्श को आर्थिक मुद्‌दों पर ले गए, क्योंकि अर्थशास्त्र की बातें ही उन्हें समझ में आती थीं. फिर बाकी सब दरकिनार हो गया और जल्द ही केंद्र में चालबाजों का झुंड रह गया.

ये ऐसे लोग थे कि जिनके हाथ में जो भी लगा उसी से पैसा कमाने में लग गए. आर्थिक सुधार दरकिनार हो गए. फिर हमारे सामने सिर्फ घपले और घोटाले ही थे. और इस नापाक साम्राज्य के शीर्ष पर ऐसा प्रधानमंत्री था, जो जानता था कि उसके नीचे क्या कुछ चल रहा है, लेकिन उसने इस सबकी अनदेखी की. किंतु यह 15 माह पुरानी बात है. हमारे पास अब वैसा नेता है जैसा हम चाहते थे. एक मजबूत व्यक्ति, जिसने वादा किया था कि वह हम सबको धनी बना देगा और हमारे बीच जो पहले से ही धनी हैं, उन्हें और भी धनी बना देगा. उसने हमें सपने बेचे और हमने ये खरीद भी लिए. अब वक्त आ गया है कि हम सुशासन के असली एजेंडे पर लौटें.

भारत को उन सुधारों की जरूरत है, जिनका वादा मोदी ने हमसे किया था. इससे भी अहम यह है कि मोदी को अपनी सरकार की विश्वसनीयता कायम रखने के लिए उन सुधारों की जरूरत है, जो 15 महीनों से सत्ता में है और दिखाने के लिए उसके पास ज्यादा कुछ नहीं है. ऐसे में वे एक सरल-सा वादा चुनकर उसे अमल में लाकर क्यों नहीं दिखाते?

हां, मेरा इशारा मोदी के प्रिय वादे की ओर है : बिज़नेस करने में आसानी (इसी से तो भारत बदलेगा. गजेंद्र चौहान को एफटीआईआई का प्रमुख बनाने या रॉबर्ट वाड्रा से एयरपोर्ट पर तलाशी की छूट वापस लेने से तो यह होगा नहीं). इस मामले में 189 देशों की सूची में भारत 142वें स्थान पर है. इसे करने के लिए किसी रॉकेट साइंस की जरूरत नहीं है और ऐसा मोदी ने खुद पिछले दिनों सिलीकॉन वैली में मार्क जकरबर्ग से कहा है. यदि वे सिर्फ यही एक वादा पूरा कर दें, तो वे भारत को हमेशा के लिए बदलकर रख देंगे.

आज हर कोई बिज़नेस में उतरना चाहता है, कोई भी बिज़नेस बड़ा या छोटा. नौकरी चाहने वालों का युग अब धीरे-धीरे जा रहा है. हम फिर वही स्वरूप लेते जा रहे हैं, जो हम ब्रिटिश शासकों के आने के पहले थे. उन्होंने यहां आकर कारखाने लगाए और हमें कर्मचारियों के राष्ट्र में बदल दिया. अब हम फिर से उस तरफ लौट रहे हैं, जो हम हमेशा से थे : स्वाभिमानी, स्वरोजगार में लगा राष्ट्र. जहां हर कोई बड़ा, छोटा या अत्यंत छोटा भी अपनी नियति खुद तय करता था.

हम सबको बिज़नेस करने की आसानी चाहिए. ट्रैफिक सिग्नल पर फूल बेचने वाली लड़की से लेकर प्रदूषण फैलाने वाले इस्पात कारखानों व आकर्षक लम्बोर्गिनी वाले अत्यंत धनी वर्ग और उस हास्य कलाकार तक, जो हर सप्ताहांत में स्टेज पर आकर आपको लोटपोट कर देता है.

इन सबको एक ऐसे राष्ट्र में बिज़नेस करना नामुमकिन-सा लगता है, जहां हजारों सरकारी अधिकारी-कर्मचारी शासन करते हैं. जिनका एक ही काम है कि हर किसी की जिंदगी को कठिन बना दो. ब्रिटिश शासकों ने यह दैत्याकार फौज खड़ी की थी ताकि हमें गुलामी की जंजीरों में जकड़कर रखा जा सके. लालफीते और चार प्रतियों वाले फॉर्म के रूप में जंजीरें अब भी कायम हैं. मानसिकता वही है अपने जटिल नियम-कायदों की भूलभुलैया के जरिये शासन करने और अतुलनीय भारत में बिज़नेस करने की चाहत रखने वाले हर व्यक्ति को परेशान करने, धमकाने और वसूली करने की.

यही वे लोग हैं, जो पाबंदियां लाते हैं, मामूली धृष्टता पर आपको कोर्ट में घसीट लेते हैं. यही वे लोग हैं जो आपको टैक्स के नाम पर दिन-रात आतंकित करते हैं. वे कभी शासन में सरलता आने नहीं देंगे, क्योंकि उन्हें डर है कि इससे मनमाने फैसले लेने का उनका अधिकार चला जाएगा.

मोदी यह सब बदल सकते हैं. वे खेल के नियम बदलकर हम सबका जीवन आसान बना सकते हैं. वे हमें तोहफे में वह चीज दे सकते हैं, जो हमें कभी नहीं मिली : भरोसा. भारत सरकार अपने नागरिकों पर संदेह दिखाकर फलती-फूलती है. इसे बदला जा सकता है. बिज़नेस शुरू करना, इनोवेशन लाना, कर्ज लेना आसान बनाकर जीवन असाधारण तरीके से आसान बनाया जा सकता है. कामयाबी की तरह, नाकामी को भी सम्मान के साथ लिया जाना चाहिए. हमें गलतियों का सामना करना सीखकर आगे बढ़ना चाहिए.

हर वह व्यक्ति जो आजीविका कमाने का प्रयास कर रहा है, बदमाश नहीं होता. अब वक्त आ गया है कि हम ऐसी मूर्खतापूर्ण सोच छोड़ दें. यदि मोदी हमें 142वें स्थान से, मान लीजिए 50वें स्थान पर ले आते हैं तो भारत बदल जाएगा. और यदि वे शीर्ष 10 में हमें ले गए तो वे हमारे दिलों व इतिहास की किताबों में हमेशा बने रहेंगे.

07.10.2015, 14.15 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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