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संघ परिवार: बदलाव एवं निरंतरता

आलेख

 

संघ परिवार: बदलाव एवं निरंतरता

इरफान इंजीनियर


हमारे प्रधानमंत्री पूरी दुनिया में घूम घूमकर मेक इन इंडिया के लिए वैश्विक पूंजी जुटाने की कोशिश कर रहे हैं. वे ऐसी घोषणाएं भी कर रहे हैं जिनसे बहुराष्ट्रीय कंपनियां भारत की ओर आकर्षित हों और उन्हें लगे कि वे यहां मनमाफिक मुनाफा कमा सकती हैं. हाल में प्रधानमंत्री ने डिजीटल इंडिया के लिए विभिन्न कंपनियों के सीईओ से मुलाकात की. कंपनियों के सीईओ चाहे वे भारतीय मूल के हों या अन्य देशों के नागरिक केवल अपने शेयरधारकों के प्रति जवाबदेह होते हैं और उनका लक्ष्य अधिक से अधिक मुनाफा कमाना होता है.

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अगर वे भारत आना चाहते हैं तो उसका कारण केवल यह है कि यहां उन्हें सस्ता श्रम ज़मीन व प्राकृतिक और अन्य संसाधन उपलब्ध हैं. इसके अतिरिक्तए भारतीय करदाताओं के धन से उन्हें अनुदान और अन्य कई सुविधाएं उपलब्ध करवाई जाती हैं. भारत सरकार के साथ विभिन्न कंपनियों के व्यावसायिक समझौतों की घोषणा तो होती है परंतु यह नहीं बताया जाता कि इन समझौतों की शर्तें क्या हैं. शायद इसलिए क्योंकि इससे अगले दिन की हेडलाईनों के खराब हो जाने की आशंका रहती है.

जिस तेज़ी से आरएसएस भाजपा और संघ परिवार ने अपने स्वदेशी आंदोलन से पल्ला झाड़ा है वह सचमुच चकित कर देने वाला है. उनका स्वदेशी अभियान विदेशी निवेश और विदेशी वस्तुओं के उपभोग का नीतिगत आधार पर विरोधी था. संघ परिवार से जुड़े अनेक संगठनों ने नवंबर 1991 में एक मंच पर आकर स्वदेशी जागरण मंच का गठन किया था.

इस मंच का लक्ष्य तत्कालीन कांग्रेस सरकार की उदारीकरण, निजीकरण, वैश्वीकरण की नीतियों का विरोध करना था. स्वदेशी जागरण मंच शायद अब भी जिंदा है परंतु उसकी आवाज़ सुनाई नहीं देती. स्वदेशी जागरण मंच ने 1990 के दशक में उसी अभियान को आगे बढ़ाया था जिसे भारतीय जनसंघ स्वाधीनता के तुरंत बाद से लेकर 1970 के दशक तक चलाता रहा था.

कानपुर में आयोजित भारतीय जनसंघ की अखिल भारतीय सामान्य सभा की बैठक में 31 दिसंबर 1952 को पारित प्रस्ताव में कहा गया था कि यह खेदजनक है कि स्वतंत्रता के बाद से लोगों का ध्यान स्वदेशी आंदोलन पर से हट गया है और विदेशी कपड़ों सौंदर्य प्रसाधनों व अन्य सामग्री के इस्तेमाल में बढ़ोत्तरी हो रही है. सरकार ने इस नुकसानदेह प्रवृत्ति को नियंत्रित करने के लिए कोई कदम नहीं उठाए हैं. उलटे अनावश्यक विदेशी सामान का आयात बेरोकटोक बढ़ रहा है. अतः यह सत्र अखिल भारतीय सामान्य सभा और केंद्रीय कार्यसमिति को यह निर्देश देती है कि अर्थव्यवस्था को स्वस्थ बनाए रखने के लिए वे लोगों का ध्यान एक बार फिर स्वदेशी की तरफ आकर्षित करें और अपनी रचनात्मक गतिविधियों में इस अभियान को प्रमुख स्थान दें भारतीय जनसंघ 1973 पृष्ठ 5. इसी प्रस्ताव में स्वदेशी को आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था के पुनर्निमाण और देश के अपने सामान के प्रति प्रेम के रूप में परिभाषित किया गया था.

भारतीय जनसंघ के अंबाला सत्र में 5 अप्रैल 1958 को पारित प्रस्ताव क्रमांक 58,03 में कृषि उत्पादन को प्राथमिकता देने और सिंचाई बेहतर बीज और कृषि जोत की अधिकतम सीमा के निर्धारण के कार्य पर फोकस करने की बात कही गई थी. इसी प्रस्ताव में आयात घटाने का आह्वान भी किया गया था.

लखनऊ में 1 जनवरी 1961 को पारित प्रस्ताव क्रमांक 61/05 में विदेशी ऋण व विदेशी पूंजी संबंधी नीतियों पर पुनर्विचार करने की बात कही गई थी. वाराणसी में जनसंघ की अखिल भारतीय सामान्य परिषद की बैठक में 12 नवंबर 1961 को पारित प्रस्ताव क्रमांक 61/17 में यह सलाह दी गई थी कि तीसरी पंचवर्षीय योजना के लक्ष्यों को पाने के लिए यंत्रीकृत लघु उत्पादन इकाईयों को औद्योगीकरण का आधार बनाया जाना चाहिए.

गुवाहाटी में जनसंघ की केंद्रीय कार्यसमिति की बैठक में 4 जूनए 1968 को पारित प्रस्ताव में चोथी पंचवर्षीय योजना के संदर्भ में यह कहा गया था कि वह हमारे अपने संसाधनों पर आधारित होनी चाहिए और स्वदेशी संसाधनों को ही देश का विकास का आधार बनाया जाना चाहिए. प्रस्ताव में यह भी कहा गया था कि हमें हमारी अपनी देशी टेक्नोलोजी का विकास भी करना चाहिए.

सन 1990 के दशक की शुरूआत में भाजपा और संघ परिवार तत्कालीन सरकार की उदारीकरण व वैश्विकरण की नीतियों का जमकर विरोध करतीं थीं. वे केंटकी फ्राईड चिकिन केएफसी की दुकानों पर हमला करती थीं क्योंकि उनका मानना था कि इस तरह की दुकानें भारतीय संस्कृति के विरूद्ध हैं. इसके कुछ समय बाद संघ परिवार ने अपना रंग बदल लिया. उसने यह कहना शुरू कर दिया कि विदेशी टेक्नोलोजी का तो स्वागत है परंतु विदेशी संस्कृति का नहीं. जैसा कि एलके आडवाणी ने कहा था हमें कम्प्यूटर चिप्स चाहिए आलू के चिप्स नहीं.

अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्रित्व काल में प्रथम वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा 13 अक्टूबर 1999 से 1 जुलाई 2002 और उसके बाद जसवंत सिंह 1 जुलाई 2002 से 22 मई 2004 ने अर्थव्यवस्था के उदारीकरण की प्रक्रिया को जारी रखा. परंतु इसके समानांतर स्वदेशी जागरण मंच लोगों को स्वदेशी की अच्छाई के संबंध में शिक्षा भी देता रहा. मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से विदेशी पूंजी को आकर्षित करने का आक्रामक अभियान चलाया जा रहा है और स्वदेशी अभियान को तिलाजंलि दे दी गई है.

हिंदू राष्ट्रवादियों की आर्थिक नीतियों में ये जो बदलाव आए हैंए उनका उद्देश्य रोज़गार के नए अवसरों का सृजन नहीं है और ना ही इनके पीछे कोई अन्य पवित्र उद्देश्य है.

अरबपतियों के क्लब में भारतीयों की संख्या बढ़ती जा रही है. इस समय इनकी संख्या करीब 100 है. सात भारतीय कंपनियां दुनिया की सबसे बड़ी फार्च्यून ग्लोबल 500 कंपनियों की सूची में शामिल हो गई हैं. वे दुनिया की सबसे बड़ी 500 कंपनियों में इसलिए शामिल हो पाईं क्योंकि उन्हें देश के प्राकृतिक संसाधन मिट्टी के मोल उपलब्ध करवाए गए. इनमें शामिल हैं देश की खनिज संपदा प्राकृतिक गैस स्पेक्ट्रम व सस्ता श्रम. ये बड़ी कंपनियां अब विदेशी ब्राण्डों को खरीदने में रूचि लेने लगी हैं और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर समझौते कर रही हैं.
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