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समान शिक्षा संवैधानिक हो

विचार

 

समान शिक्षा संवैधानिक हो

रघु ठाकुर


इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक क्रांतिकारी निर्णय जिसमें न्यायमूर्ति अग्रवाल ने यह निर्णय दिया था कि समान शिक्षा की व्यवस्था होना चाहिये, और अधिकारियों, नेताओं और सभी बड़े पदों और सम्पन्न लोगों के बच्चों को एक ही स्कूल में पढ़ना चाहिये. इसके तुंरत बाद देश में समान शिक्षा के मुद्दे पर मीडिया और सोशल मीडिया में कुछ चर्चा हुई थी. परन्तु यह चर्चा मात्र रही जो न तो स्थायित्व ले सकी और न ही कोई निर्णायक जन भावनायें बनाने तक पहुंच सकी.
 

शिक्षा

समान शिक्षा की बात वैसे तो भारतीय संविधान के नीति निर्देशक सिंद्वातों में दर्ज की गई थी. हांलाकि संविधान निर्माणी सभा के अनेको सदस्य और स्वतः बाबा साहब अम्बेडकर यह चाहते थे कि समान शिक्षा का अधिकार मूल अधिकार में शामिल हो और न्यायिक आदेश से लागू होने की व्यवस्था हो. परन्तु उस समय केन्द्र सरकार के मुखिया और निंयत्रको का यह तर्क था कि उस समय सरकार का खर्च और साधन इतने विकसित नही है कि इसे वैधानिक अधिकार या कानून के रुप में लागू किया जा सके.

अतः कुछ समय ढांचे के विकास को चाहिये और इसलिये अन्य मुद्दों की तरह इसे भी नीति निर्देशक मुद्दों के खण्ड में शामिल किया जाये जो कि सरकारों के लिये आदर्श हो और कुछ समय पश्चात जब आधार रुप ढांचे का विकास हो जाये तब अन्य मुद्दों के साथ समान शिक्षा के मुद्दे को भी मूल अधिकार के रुप में शामिल किया जा सकता है.

सरकार के इस तर्क के आधार पर संविधान निर्माताओं ने समान शिक्षा के सवाल को अनिवार्य और बाध्यकारी के बजाय आदर्श के रुप में रखा था. उम्मीद यह थी कि सरकारें आगामी 10-15-20 वर्षों में इतनी समर्थ हो जायेगी कि समान शिक्षा को अधिकार के रुप में लागू किया जा सके. परन्तु आज आजादी के लगभग 68 वर्ष के बाद भी स्थिति जस की तस है और अगर बारीकी से देखा जाये तो 26 जनवरी 1950 की तुलना में कुछ बदतर ही हुई है. तत्कालीन केन्द्र सरकार ने पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से प्राथमिक शिक्षा से लेकर माध्यमिक हाई स्कूल और उच्च शिक्षा तक के लिये पंचवर्षीय लक्ष्य र्निधारित करना शुरु किये थे तथा सरकारी स्कूलो की संख्या में तेजी से वृद्वि हुई थी.

निजी स्कूलो के नाम पर आर्य समाज ईसाई मिषनरी संस्थायें, इस्लामिक मदरसा, गुरुद्वारा प्रंबधक सभायें जैसी अन्य धार्मिक और सामाजिक संस्थाओं के माध्यम से शिक्षा के प्रसार के लिये स्कूल कालेज आदि खोले गये थे परन्तु यह सामाजिक हित में और गरीब लोगो को भी शिक्षा देने के लिये न्यूनतम फीस आदि के आधार पर शुरु किये गये थे. इनमें व्यापार या मुनाफा नही था और न ही निजी मालकियत थी बल्कि इनके पीछे समाज सेवा शिक्षा का विकास और परोपकार की भावना थी.

परन्तु कुछ वर्षो के पश्चात समाज के ताकतवर सपन्न और प्रभावी लोगो ने अपने बच्चों के लिये पृथक और मंहगे स्कूल शुरु कराये जैसे दून स्कूल डेली कालेज और ऐसी ही अन्य शिक्षण संस्थाओं को राजा महाराजा या उद्योगपतियों के पैसे से खड़ा करना आंरम्भ हुआ तथा शिक्षा को अमीर और गरीब-बड़े और छोटे ताकतवर और कमजोर राजा और रंक के बीच बॉट दिया गया.

पुराने राजाओं, धनपतियों और राज सत्ता पर बैठे नेताओं तथा अफसर शाहो के बच्चे इन बड़े स्कूलों में पढ़ाये जाने लगे जहॉ पढ़ाई का माध्यम सत्ता प्रतिष्ठान की भाषा अंग्रेजी हो गई और उच्चवर्गीय और उच्च वर्णीय ढ़ाचे को स्थाई तौर पर बरकरार रखने के लिये शिक्षण संस्थाओं में भाषा महत्वपूर्ण माध्यम बन गई.

महात्मा गांधी ने तो बुनियादी तालीम के नाम से शिक्षा की कल्पना की थी जिसमें शिक्षा समान होती, भारतीय भाषा में होती, और ज्ञान के साथ-साथ चरित्र और रोजगार का भी जरिया होती. परन्तु आजादी के कुछ समय पश्चात सरकारों ने गांधी को केवल मूर्तियो और चित्रो तक सीमित कर दिया. 1950 के दषक में और 60 के दषक में स्व.लोहिया ने समान शिक्षा के सवाल को तेजी के साथ मुखरित किया तथा आवाज उठाना शुरु किया कि शिक्षा सभी को समान होना चाहिये.

जो शिक्षा वर्ग विभेदक आधार खड़ा करती है उसे बंद होना चाहिये और इसीलिये डा. लोहिया ने नारा दिया था ’’राष्ट्रपति हो या चपरासी की संतान सबकी शिक्षा एक समान’’ लोहिया इस बात को जानते थे कि अगर अफसर और चपरासी का बेटा सम्पन्न और गरीब का बेटा उद्योगपति और किसान का बेटा बड़ी जात और दलित का बेटा एक ही स्कूल में साथ-साथ पढ़ेगे तो भेद-भाव मिटेगा, राष्ट्रीय एकता मजबूत होगी तथा सबको समान अवसर प्राप्त होगे जिससे योग्यता और क्षमता का विकास भी उसी के अनुसार होगा.

यह बड़ा विचित्र है कि हमारे देश के कुछ नौजवान और कुछ लेाग जो आरक्षण को समानता का विरोधी मानते है आरक्षण तो मिटाना चाहते है आरक्षण मुक्त भारत का नारा लगाते है परन्तु समान शिक्षा की बात नही करते.

वे यह तो कहते है कि 60 साल आरक्षण को हो गये इसे खत्म करना चाहिये परन्तु यह नही कहते कि 60 साल हो गये अब नीति निर्देशक मुद्दों को संविधानिक प्रावधान बनना चाहिये तथा सबको समान शिक्षा का अवसर मिलना चाहिये. असमान शिक्षा भी एक प्रकार का आरक्षण है जिसमें सम्पन्न और ताकतवर के बच्चो को पद और पैसे के आधार पर शिक्षा के विशेष अवसर है. इसका आधार योग्यता नही है बल्कि मात्र आर्थिक या सत्ता प्रतिष्ठान की ताकत ही योग्यता है.

यह नौजवान मित्र बड़े-बड़े डोनेशन वाली (जो वस्तुतः भ्रष्ट व काला धन होता है) उस शिक्षा प्रणाली का भी विरोध नही करते जिसमें लाखो करोड़ रुपये देकर अयोग्य छात्र डाक्टर, इंजीनियर आदि बन जाते है और इसीलिये समाज के एक बड़े हिस्से में उनकी मांग और नीयत संदिग्ध रहती है.
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