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लैंगिक समानता लाए समान नागरिक संहिता

विचार

 

लैंगिक समानता लाए समान नागरिक संहिता

इरफान इंजीनियर


उच्चतम न्यायालय ने एक बार फिर केंद्र सरकार से कहा है कि वह शपथपत्र दाखिल कर बताये कि क्या वह देश में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लागू करेगी. शाहबानो मामले में, उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि ‘‘यह खेद का विषय है कि संविधान के अनुच्छेद 41 को लागू नहीं किया जा रहा है’’. यद्यपि, शायद यह मानते हुए कि राजनेताओं में हिम्मत से सही निर्णय लेने की क्षमता का अभाव है, उच्चतम न्यायालय ने समाज सुधार का बीड़ा उठा लिया है, तथापि यह साफ है कि केवल विधायिका ही यूसीसी लागू कर सकती है.
 

uniform civil code

ब्रिउच्चतम न्यायालय, संविधान के अनुच्छेद 44 के आधार पर बार-बार यूसीसी की बात कर रहा है. संविधान का अनुच्छेद 44 कहता है कि, ‘‘राज्य, भारत के समस्त राज्य क्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान सिविल संहिता प्राप्त कराने का प्रयास करेगा’’. अनुच्छेद 44, संविधान के भाग चार का हिस्सा है, जो राज्य के नीति निदेशक तत्वों के बारे में है. भाग चार के प्रावधान केवल पथप्रदर्शक सिद्धांत हैं और उन्हें अदालतों द्वारा लागू नहीं किया सकता.

उच्चतम न्यायालय, भाग चार के अन्य प्रावधानों को नजरअंदाज कर रहा है, जिनमें यह शामिल है कि ‘‘राज्य ऐसी सामाजिक व्यवस्था की, जिसमें सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय राज्य की सभी संस्थाओं को अनुप्रमाणित करे, भरसक प्रभावी रूप में स्थापना और संरक्षण करेगा; कि ‘‘राज्य आय की असमानताओं को कम करने का प्रयास करेगा; कि राज्य अपनी नीति का इस प्रकार संचालन करेगा कि जिससे समुदाय के भौतिक संसाधनों का स्वामित्व और नियंत्रण इस प्रकार बंटा हो, जिससे सामूहिक हित का सर्वोत्तम रूप से साधन हो’’ इत्यादि.

ये पथप्रदर्शक सिद्धांत आज और अधिक महत्वपूर्ण बन गए हैं क्योंकि वर्तमान सरकार इनकी उपेक्षा कर रही है. हम केवल यह आशा कर सकते हैं कि उच्चतम न्यायालय, सरकार को शपथपत्र प्रस्तुत कर यह बताने को कहेगी कि वह ऐसे कौनसे कानून या नीतियां बनाएगी जिनसे भाग चार के न्याय व समानता से सम्बंधित उपबंध लागू हो सकें.

उच्चतम न्यायालय सदियों पुरानी परम्पराओं और मान्यताओं को एक झटके में खत्म कर देना चाहता है. ‘‘द मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरियत) एप्लीकेशन एक्ट, 1937’’ के लागू होने से पहले, भारत के मुसलमानों पर अलग-अलग पारंपरिक व धार्मिक कानून लागू होते थे. सल्तनत काल से ही, शरिया कानून केवल अभिजात मुसलमानों पर लागू होते थे. कारीगर जातियों से धर्मपरिवर्तित कर मुसलमान बनने वाले उनके पारंपरिक कानूनों का ही पालन करते थे. इनमें शामिल हैं राजस्थान के मेव, गुजरात के प्रनाम व पीर पंथी, मध्यप्रदेश के सतपंथी व गुजरात के खोजा, बोहरा व कच्छी मेमन आदि.

सल्तनत के संस्थापक अलाउद्दीन खिलजी द्वारा शरिया में किये गए परिवर्तनों से बियाना के काजी मुगीस-उद-दीन नाराज थे. खिलजी ने उनसे कहा, ‘‘मैं तो अज्ञानी आदमी हूँ और मैं इस देश के अधिकतम हित के लिए इस पर शासन कर रहा हूँ. मुझे विश्वास है कि मेरी अज्ञानता और सच्चे इरादों के मद्देनजर, अगर मैं शरिया का उल्लंघन भी करूंगा, तो अल्लाह मुझे माफ कर देगा.’’

जटिल पारंपरिक प्रथाओं को समझना भारत के औपनिवेशिक शासकों के लिए आसान नहीं था और इसलिए उन्होंने धार्मिक ग्रंथों का सहारा लेना बेहतर समझा. ‘मनुस्मृति’ का 1776 में अनुवाद किया गया. हेस्टिंग्स के निर्देशन में, चार्ल्स हेमिल्टन ने 1791 में ‘हिदाया’ का अरबी से अंग्रेजी में अनुवाद शुरू किया परन्तु इस काम को अधूरा ही छोड़ दिया गया. सन 1857 के विद्रोह के बाद, इंग्लैंड के शासक ने घोषणा की कि उसके अधीन सभी अधिकारी ‘‘...हमारी प्रजा के धार्मिक विश्वासों और आराधना पद्धति में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं करेगें’’. अतः, यद्यपि औपनिवेशिक सरकार ने दंड संहिता, टैक्स व व्यापार-व्यवसाय से सम्बंधित कानूनों का एकीकरण किया तथापि उसने परिवार व उत्तराधिकार सम्बन्धी कानूनों से छेड़-छाड़ नहीं की, जब तक कि राजनैतिक कारणों से ऐसा करना उसे आवश्यक नहीं लगा.

राष्ट्रवादी आन्दोलन में शामिल कई महिला नेताओं ने यह मांग उठाई कि विवाह, तलाक व उत्तराधिकार के सम्बन्ध में विस्तृत कानून बनाए जाए. ऑल इंडिया विमेंस कांफ्रेंस की कमलादेवी चट्टोपाध्याय, सरोजिनी नायडू, मुथुलक्ष्मी रेड्डी व बेगम षाह नवाज़ ने सम्मलेन के 1933 में आयोजित अधिवेशन में समान नागरिक संहिता की मांग की थी.

समान नागरिक संहिता पर संविधानसभा में बहस


इस पृष्ठभूमि में, संविधान के मसविदे के अनुच्छेद 35 (जो अब संविधान का अनुच्छेद 41 है) पर संविधानसभा में बहस हुई. मुहम्मद इस्माइल साहेब व नजीरुद्दीन अहमद चाहते थे कि अनुच्छेद 35 में इस तरह का संशोधन किया जाये जिससे किसी भी समुदाय को उसके पर्सनल लॉ को त्यागने पर मजबूर न किया जा सके.

उनका तर्क यह था कि हर समुदाय का पर्सनल लॉ, अपने धर्म का पालन करने की उसकी आज़ादी का भाग है. नागरिकों को केवल इस आधार पर उनके पर्सनल लॉ को छोड़ने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए कि इससे देश में सद्भाव या एकता बढ़ेगी. अहमद का तर्क था कि अनुच्छेद 35, संविधान के मसविदे के अनुच्छेद 19 (अब अनुच्छेद 25), जो सभी नागरिकों को अपने धर्म को मानने, उसका पालन करने और उसका प्रचार करने का अधिकार देता है, से असंगत है.

अहमद का कहना था कि धार्मिक मसलों में राज्य का हस्तक्षेप आहिस्ता-आहिस्ता होना चाहिए. हिन्दू भी समान नागरिक संहिता के खिलाफ थे. यूसीसी के एक ज़बरदस्त समर्थक केएम मुंशी ने कहा, ‘‘मैं जानता हूँ कि कई हिन्दू भी यूसीसी के विरोध में हैं...उन्हें लगता है कि उत्तराधिकार व विवाह आदि से सम्बंधित व्यक्तिगत कानून, उनके धर्म का हिस्सा हैं. अगर ऐसा है तो हम कई काम कभी नहीं कर पायेंगे, जैसे महिलाओं को बराबरी का दर्जा देना’’. मुंशी, लैंगिक समानता और राष्ट्रीय एकता के लिए यूसीसी के पक्षधर थे.
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