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ऐसा आक्रोश क्यों

बात पते की

 

ऐसा आक्रोश क्यों

प्रीतीश नंदी

सांप्रदायिकता


कोलकाता में जहां मैं पला और बड़ा हुआ, वहां दुर्गा पूजा और क्रिसमस दो लोकप्रिय पर्व हुआ करते थे. हर कोई उन्हें मनाता था, फिर उसका धर्म या आस्था कोई भी क्यों न हो. क्योंकि उन सुकूनभरे दिनों में कोई भी उत्सवधर्मिता को आस्था से जोड़कर नहीं देखता था. इन सार्वजनिक उत्सवों का धर्म से कोई संबंध नहीं देखा जाता था. यहां तक कि गरीब और बेघर लोग भी किसी भी इबादतघर में चले जाते और जो भी देवी-देवता वहां होते उनकी आराधना करते. प्रत्येक देवता, हर किसी के लिए होता था. कोई हिंदू सेंट पॉल कैथेड्रल में जाकर प्रार्थना कर सकता था. मुस्लिम, मां काली के मंदिर में चला जाता. किसी ईसाई को गुरुद्वारे में शांति मिलती. ईश्वर हर कहीं, हर किसी के लिए मौजूद था.

जब एक और उत्तेजनाओं व रफ्तार से भरा साल थककर निवृत्त हो रहा है और उत्सव-उत्साह का मौसम शुरू हो रहा है तो मुझे वे पुराने खुशनुमा दिन याद आ रहे हैं. हाल ही में मदर टेरेसा को संत घोषित किया गया है, जो इस महानगर की शाश्वत प्रतीक हैं. इससे मेरे जैसे सारे लोगों को खुशी हुई, जो गरीबतम तबके में उनके काम से अच्छी तरह वाकिफ हैं और सौभाग्य से जिनकी जिंदगी पर उनके प्रेम और करुणा का स्पर्श हुआ है. दुर्भाग्य से यह प्रेम अब हमारी जिंदगी का केंद्र बिंदु नहीं है, जैसा कि बीत रहे साल ने इतनी मुखरता से इस तथ्य को जाहिर किया है, रेखांकित किया है.

इसके कई कारण हैं. राजनीति, धर्मांधता, बढ़ते पूर्वग्रह तो इनमें से कुछ हैं, लेकिन सबसे बड़ा कारण है रोष व्यक्त करने का औद्योगिकीकरण. यह आज हमारे सबसे लाभदायक व्यवसाय में बदल गया है. हर कोई लड़ाई-झगड़े की तलाश में रहता है और कोई भी मौका काफी है. आप चीखें और आपकी बात सुनी जाएगी. क्रोधित हो जाएं और आप नेता बन सकते हैं. रोष दिखाएं और तत्काल अनुयायियों की सेना आपका इशारा पाने को तैयार खड़ी मिलेगी. किसी भी बात पर झगड़ा मोल लें, अक्षरश: किसी भी बात पर और आप सुर्खियों में छा जाएंगे. सोशल मीडिया में तो यह और भी आसान है. आपको करना केवल इतना है कि कुछ मित्रों का गिरोह बना लें और किसी ख्यात व्यक्ति को निशाना बनाइए. यदि भाग्यवान रहें तो आपको 15 मिनट की शोहरत मिल जाएगी. यदि ऐसा नहीं हुआ तो आप किसी और को निशाना बनाकर फिर किस्मत आजमा सकते हैं. अपने घर जैसी सुरक्षित जगह से इसे करने में कोई ज्यादा जहमत नहीं उठानी पड़ती.

ऐसा नहीं है कि धनी और ख्यात लोग निशाने पर नहीं लिए जाने चाहिए. शायद वे इसके हकदार हैं. बरसों तक सत्ता के निकट रहकर उन्होंने हर चीज का फायदा उठाया है. वे ही नए ब्राह्मण हैं. और यह उस साधारण आदमी का बदला है, जो अपने पर ध्यान दिए जाने के लिए अत्यधिक बेचैन है. आप उसे सजा दे सकते हैं, बुरा-भला कह सकते हैं, लेकिन एक ऐसे युग में उसकी अनदेखी करना उत्तरोत्तर कठिन होता जा रहा है, जब आपका आकलन इस बात से हो रहा है कि आप कितने लोगों का ध्यान खींचने में कामयाब रहे हैं. अखबार हो या टेलीविजन या सोशल मीडिया. आप लगातार स्पॉटलाइट में रहने के लिए लगातार दबाव में रहते हैं और रोष जाहिर करने जैसी थोड़ी ही चीजें ऐसी हैं, जिससे यह उद्‌देश्य सफलतापूर्वक हासिल किया जा सकता है. ऐसे में आप लगातार रोष जाहिर करने के कारणों की तलाश में रहते हैं. फिर कोई भी कारण काफी होता है.

यदि आपका उद्‌देश्य पृथक तेलंगाना है, निश्चित ही यह कई लोगों के लिए बहुत ही अच्छा उद्‌देश्य है, तो आपको लगता है कि उस लक्ष्य की खातिर बसें जलाने, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने का आपको पूरा हक है. यदि आप वंचित आदिवासियों के हक के लिए लड़ रहे हैं, निश्चित ही यह बहुत महत्वपूर्ण काम है तो आप यह मानने लगते हैं कि शायद नक्सलियों को ही उनके संरक्षण का एकमात्र प्रभावी रास्ता मिल गया है. इसलिए आप उनकी हिंसा, उनके अपराधों को जायज ठहराने लगते हैं.

यदि आपको लगता है कि अल्पसंख्यकों को भारत में न्याय नहीं मिल रहा है और आपको द्वितीय श्रेणी के नागरिक में बदल दिया गया है, तो आपको ऐसे समाधान की पैरवी करने का प्रलोभन होगा, जो उन्हें और भी अलग-थलग कर देगा. यदि आपको लगता है कि हिंदू जितना मिल रहा है, उससे ज्यादा के हकदार हैं तो आप उन पर हमले करने लगेंगे, जो आपसे असहमत हैं. आपकी राय से इत्तफाक नहीं रखते. हर उद्‌देश्य के लिए उसके अनुयायी मिल जाते हैं, जो तत्काल ध्यानाकर्षण चाहते हैं. और रोष जाहिर करने से ध्यान आकर्षित करने में वे कामयाब हो जाते हैं.

इस तरह हम छोटी-छोटी चीजों से गुस्सा हो जाते हैं. अखबार में लिखे लेख, किताबें, गीत, फिल्में, महिलाओं के कपड़े, लोगों का खान-पान. हल्के-फुल्के अंदाज में कर दी गईं टिप्पणियां. रोष की चक्की में डालने के लिए कुछ भी चलेगा. किसी भी लिखे का गलत अर्थ लगा लिया जाएगा, गलत समझ लिया जाएगा. गलत उद्‌धृत कर दिया जाएगा, जो हिंसा भड़कने का कारण बन सकता है. इससे बुरी बात तो यह है कि यह मुक्त रूप से बहती हिंसा प्राय: सर्वाधिक अनपेक्षित स्थानों पर फूट पड़ती है और वह भी सर्वाधिक अनपेक्षित परिस्थितियों में. इसलिए किसी युवती को जींस पहनने या पब में जाने के कारण पीट दिया जाता है. जो अंधविश्वास और सामाजिक अन्याय के खिलाफ बोलते हैं उन्हें गोली मार दी जाती है. जिन पर राजनीतिक रूप से गलत खाद्य खाने का संदेह, संभव है उन्हें पीट-पीटकर मार डाला जाए.

उत्तर केवल एक बात में है- दूसरे व्यक्ति की भिन्नता का सम्मान करना. विविधता का सम्मान करना. इस बात को समझना कि किसी भी मुद्‌दे पर कई दृष्टिकोण एकसाथ मौजूद रह सकते हैं. हम सबको अपनी आस्थाओं पर गर्व है, लेकिन यह गर्व हमें अन्य लोगों को उनकी आस्था, दृष्टिकोण से वंचित करने का हक नहीं देता. और जरूरी नहीं कि भिन्न राय हमेशा ही कम महत्व की और नफरत या रोष जाहिर करने के काबिल ही हो.

समस्या उनके साथ है, जो हमारा नेतृत्व करते हैं. वे ही तो सारे मुद्‌दों को विवादास्पद बना देते हैं. वे ही हैं, जो दुखद बातों को भुनाते हैं और इससे राजनीतिक पूंजी खड़ी करते हैं. हम तो सिर्फ मोहरे भर हैं. अब जब एक और साल अपने अंत की ओर बढ़ रहा है, आइए रोष जताने की बजाय जश्न अधिक मनाएं. दुनिया बेहतर नए साल की हकदार है और हम भी तो इसके हकदार हैं.

23.12.2015 15:50 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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