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राम पुनियानी | Ram puniyani | एक सवाल पर कितने बवाल

विचार

 

एक सवाल पर कितने बवाल

राम पुनियानी


पिछले माह मुंबई पर हुए आतंकी हमले ने मुंबई ही नहीं पूरे देश को झकझोर दिया है. मुंबई पर आतंकी हमला पहली बार नहीं हुआ है परंतु इस हमले का समय कई प्रश्नों को जन्म देता है. यह हमला उस वक्त हुआ जब महाराष्ट्र एटीएस द्वारा की जा रही मालेगांव बम विस्फोटों की जांच के दौरान, घटना में हिन्दुत्व के झंडाबरदारों का हाथ होने के पुख्ता सुबूत सामने आ रहे थे.


नतीजतन, एटीएस प्रमुख को- जो केवल ईमानदारी से अपना काम कर रहे थे- आडवाणी और मोदी जैसे लोगों की तीखी आलोचना झेलनी पड़ रही थी. उन्हें देशद्रोही कहा जा रहा था, उन्हें अपमानित किया जा रहा था. मुंबई पर हमले के कुछ ही दिन पहले, पुणे पुलिस को एक अज्ञात व्यक्ति ने फोन कर एटीएस प्रमुख को जान से मारने की धमकी दी थी.


एटीएस प्रमुख श्री हेमन्त करकरे और उनके साथी किन परिस्थितियों में मारे गए, इसके बारे में कई अलग-अलग बातें कही जा रही हैं. कुछ का कहना है कि वे ताज में मारे गए. दूसरे कहते हैं कि उन्हें कामा अस्पताल के पास मौत के घाट उतारा गया. तीसरी कहानी यह है कि उन्हें तब गोली मारी गई जब वे अपनी गाड़ी में थे. श्री करकरे की मृत्यु के संबंध में कई आशंकाएं और अनुत्तरित प्रश्न हैं जिन्हें पहले कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने और बाद में अल्पसंख्यक मामलों के केन्द्रीय मंत्री श्री ए. आर. अंतुले ने उठाया.

रविवार-1  श्री अंतुले द्वारा मात्र कुछ संदेह व्यक्त करने की जैसी तीखी प्रतिक्रिया हुई है, उसे गंभीरता से लिया जाना चाहिए. क्या हम सच तक नहीं पहुंचना चाहते? रविवार 2


श्री अंतुले का कहना था कि ''ऊपरी तौर पर श्री करकरे को मारने का आतंकवादियों के पास कोई कारण नहीं था. श्री करकरे आतंकवाद के शिकार बने या आतंकवाद प्लस किसी और चीज के, मैं नहीं जानता.'' स्पष्टत: उनका मतलब यही था कि श्री करकरे की मृत्यु किन हालातों में हुई, उनका पता लगाने के लिए गहन जांच की जानी चाहिए, रहस्य पर से पर्दा उठाया जाना चाहिए. ऐसा कहकर श्री अंतुले ने किसी पर कोई आरोप नहीं लगाया. उन्होंने केवल कई लोगों के दिमागों में उठ रहे प्रश्नों और संदेहों को अपनी आवाज दी.


इस वक्तव्य के बाद श्री अंतुले पर हिन्दू दक्षिणपंथी और मीडिया का एक हिस्सा मानो टूट पड़ा. कुछ लोगों का मानना था कि श्री अंतुले ने केवल सच का पता लगाने की मांग की थी परंतु दूसरों ने आसमान सिर पर उठा लिया. उन्हें बर्खास्त करने की मांग की जाने लगी और यहां तक कि उनके खिलाफ देशद्रोह का मामला दायर करने की तक मांग उठी. चन्द लोगों ने उनका समर्थन भी किया. कांग्रेस महासचिव श्री दिग्विजय सिंह और महाराष्ट्र विधानसभा के अध्यक्ष बाबासाहेब कुपेकर उनमें शामिल थे. श्री कुपेकर का कहना था कि महाराष्ट्र सरकार ने मुंबई हमले के दौरान पुलिस अफसरों पर लापरवाही बरतने के आरोपों की जांच करने के लिए जो समिति नियुक्त की है, उसी समिति को हेमन्त करकरे की मृत्यु की जांच भी सौंपी जा सकती है.

श्री अंतुले द्वारा मात्र कुछ संदेह व्यक्त करने की जैसी तीखी प्रतिक्रिया हुई है, उसे गंभीरता से लिया जाना चाहिए. क्या हम सच तक नहीं पहुंचना चाहते? आखिर वे कौन लोग हैं जो सच को सामने आने नहीं देना चाहते और क्यों? जो प्रतिक्रियाएं सामने आईं हैं उनमें राजनीति ज्यादा है और तार्किकता कम. क्या उन घटनाओं और तथ्यों को नजरअंदाज कर दिया जाये जो उन विचारों और निष्कर्षों से मेल नहीं खाते जिन्हें समाज का बड़ा हिस्सा सही मानता है? या जो किसी राजनैतिक दल विशेष के हितों के खिलाफ हैं?

इसी प्रवृत्ति का एक उदाहरण है अप्रैल 2006 में महाराष्ट्र के नांदेड़ में एक आरएसएस कार्यकर्ता के घर पर हुए बम विस्फोट में दो बजरंग दल कार्यकर्ताओं की मौत की घटना. किसी जरा सी भी सनसनीखेज घटना के दृश्य दिन-रात दिखाने वाले टीवी चैनलों ने इस घटना को मानो ब्लैक आऊट कर दिया. कुछ अखबारों ने इसे छापा भी तो पर्याप्त महत्व नहीं दिया.

जब हैदराबाद की मक्का मस्जिद के सामने विस्फोट हुआ तो हमेशा की तरह इसे जेहादियों की दुष्टता का एक और नमूना बताकर उसका जम कर प्रचार किया गया. पुलिस ने घटना के सिलसिले में बड़ी संख्या में निर्दोष लोगों को गिरफ्तार किया. इसका भी प्रचार हुआ. परंतु जब इन कथित आतंकियों को पुलिस हिरासत में यंत्रणा दी गई तो वह समाचार नहीं बन सका और बाद में जब आरोपियों को सुबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया तो यह भी समाचार माध्यमों में जगह नहीं पा सका.

छोटी-छोटी घटनाओं पर लंबी-लंबी बहसें आयोजित करने वाले टीवी चैनलों ने इस विषय पर कोई बहस आयोजित नहीं की कि क्या हमें इन प्रश्नों पर आत्मचिंतन करने की आवश्यकता है कि आखिर गलत लोग क्यों पकड़े गए और क्या आतंकी हमलों की जांच की दिशा बदले जाने की जरूरत है? मीडिया और जांच एजेन्सियां इसी मान्यता पर कायम रहीं कि सभी आतंकवादी मुसलमान होते हैं. इस सब का नतीजा यह हुआ कि हम उस रास्ते से भटक गए जिस पर चलकर हम असली दोषियों तक पहुंच सकते थे और भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोक सकते थे.

महाराष्ट्र एटीएस के हाथ मालेगांव धमाकों में प्रयोग की गई मोटरसाईकिल के जरिए साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर, स्वामी दयानंद पाण्डे, ले. कर्नल प्रसाद पुरोहित और रिटायर्ड मेजर उपाध्याय तक पहुंचे. पूरी निष्पक्षता से की जा रही इस जांच पर हिन्दुत्व की ताकतों ने हमला बोल दिया. एटीएस प्रमुख इस हमले से इतने विचलित हो गए कि वे सलाह और नैतिक समर्थन मांगने के लिए जाने-माने पूर्व पुलिस अधिकारी जूलियो रिबेरो के पास गए. टाईम्स आफ इंडिया में लिखे अपने लेख में श्री रिबेरो ने बताया है कि श्री करकरे किस कदर दबाव में थे.


शिवसेना ने प्रज्ञा ठाकुर और उसके साथियों के लिए कानूनी सहायता तो जुटाई ही, उसने एटीएस को जी भरकर भला - बुरा भी कहा. शिवसेना के मुखपत्र ''सामना'' में प्रकाशित एक लेख में कहा गया, ''हम मालेगांव मामले की जांच में शामिल सभी पुलिस वालों के नाम और पते छापेंगे ताकि जनता उनके खिलाफ सीधी कार्यवाही कर सके. यह सब एटीएस द्वारा हिन्दुत्व को बदनाम करने का बहाना है. एटीएस ने हिन्दुत्व का नाम खराब करने की सुपारी ली है. हम ऐसे अधिकारियों पर थूकते हैं, थूकते हैं.''

और अब, मुंबई हमले के बारे में सच जानने की इच्छा व्यक्त करने वालों पर थूका जा रहा है. पूरे घटनाक्रम पर कोई भी प्रश्न या संदेह उठाने वालों को ''पाक समर्थक'' और ''भारत विरोधी'' करार दिया जा रहा है. छद्म राष्ट्रवादियों के बिफरने का कारण स्पष्ट है. अंतुले पर भी ये ही छद्म राष्ट्रवादी हमला कर रहे हैं. उन्हें पाकिस्तान परस्त और न जाने क्या क्या कहा जा रहा है.

हम सब को, विशेषकर कालम लेखकों को- यह याद रखना चाहिए की प्रजातंत्र में सब को अपनी राय, अपने संदेहों और अपने प्रश्नों को देश के सामने रखने का हक है. दरअसल, अंतुले नहीं बल्कि उनके बयान पर छातियां पीट रहे लोग हमारे संविधान के खिलाफ काम कर रहे हैं.

जिन पुलिस अधिकारियों ने वहशी आतंकियों से हमारी रक्षा करने की कोशिश में अपनी जानें न्यौछावर की हैं, उन्हें सच्ची श्रध्दांजलि यही होगी की उनकी मृत्यु के बारे में सही तथ्य हमारे सामने आएं और हेमन्त करकरे और उनके सहयोगियों द्वारा शुरू की गई मालेगांव मामले की जांच ठीक ढंग़ से पूरी की जाये.

 

25.12.2008, 00.38 (GMT+05:30) पर प्रकाशि


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