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शिव-शिवा का संवाद

विचार

 

शिव-शिवा का संवाद

रघु ठाकुर

शिवराज सिह चौहान


25 अगस्त 2015 को मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान भोपाल के नये बाजार न्यू मार्केट मैं विश्व हिन्दी संम्मेलन के आयोजन और हिन्दी के प्रचार के लिये गये थे. वहॉ उन्होंने व्यापारी भाईयों से अंग्रेजी नाम पट को हिन्दी में लिखने की अपील की तथा ऐसा प्रचार किया था मानो वे पहली बार यह कार्य कर रहे है.

मैं उन्हें यह याद दिलाना गैर जरुरी मानता हूं कि समूचे देश में अंग्रेजी के नाम पटो को हटाकर या पोतकर हिन्दी में करने का आवाहन और आंदोलन स्व.लोहिया की प्रेरणा से आज से लगभग 50 वर्ष पूर्व चला था जिसे अंग्रेजी हटाओ और भारतीय भाषायें लाओ का नाम दिया गया था. इस आंदोलन में मुझ जैसे हजारों नौजवान शामिल हुये थे और जेले भी काटी थी. सैंकड़ो नौजवानों ने जो बड़े और संभ्रात परिवारों के थे तथा जिनका चयन भारतीय प्रशासनिक सेवाओं में हो गया था या होना संभावित था, ने उन बड़ी नौकरियो का मोह छोड़कर अंग्रेजी को त्यागा था और हिन्दी को अपनाया था.

मुख्यमंत्री जी ने इस आंदोलन की और उन घटनओं की कोई याद नही की. यह अज्ञानता की वजह से हुआ या सोद्देष्य यह अतीत और इतिहास के पन्नों को भुलाने की वजह से हुआ या स्वाप्रचार की भावना से यह तो वे ही बेहतर बता सकते है. बहरहाल न्यूमार्केट में उन्होंने घूमते हुये एक पेपर बेचने वाले बच्चे को देखा और अपने मातहत कर्मचारियों तथा भाजपा नेताओं से कह कर उसे बुलवाया.

मुख्यमंत्री ने बच्चे से उसका नाम पूछा तो उसने अपना नाम ’’शिवा’’ बताया इस पर सभी लोग हॅस पड़े और किसी ने उनसे कहा कि सर ये भी आपका नाम राषि है अतः इसका भला होना चाहिये.

मुख्यमंत्री जी ने कलेक्टर श्री बरबड़े को बुलाकर निर्देश दिया कि बच्चे की पूरी मदद की जाये. उन्होंने बच्चे से पूछा कि क्या तुम पढ़ना चाहते हो तो बच्चे ने हॉ कहा और मुख्यमंत्री ने पुनः कलेक्टर को निर्देश दिया कि ’’कलेक्टर सर कल से यह बच्चा स्कूल जाना चाहिये. यह बच्चा बाणगंगा झुग्गी बस्ती में रहता है उसके पिता मिस्त्री है.

मैं प्रमाणित तौर पर नही कह सकता कि मुख्यमंत्री की अपील पर कितना प्रभाव हुआ हांलाकि मैं जब-जब वहॉ से गुजरा और जिन मित्रो का उस इलाके में जाना होता है उनसे पूछा कि कितने नाम पट की भाषा बदली तो स्थिति लगभग जस कि तस मालूम पड़ी.

बहरहाल मेरे सामने एक चित्र उभर कर आया जिसमें बाणगंगा कि झुग्गी के बच्चे शिवा और मुख्यमंत्री शिवराज के बीच संवाद हो रहा है. यह काल्पनिक संवाद कुछ इस प्रकार का हुआ.

मुख्यमंत्री - शिवा तुम बाणगंगा में रहते हो मैने तुम्हारे स्कूल जाने का निर्देश कलेक्टर को दे दिया है क्योंकि तुम्हारे पिता मिस्त्री है और गरीब है तुम्हे पढ़ा नही सकते .मुझे गरीबो का दर्द बहुत सताता है

शिवा -जी मैं बहुत खुश हूं परन्तु मेरे जो भाई बहन है और जिनके नाम की राषि आपसे मेल नही खाती वे तो अभी भी पेपर बेचेगे घर में झाडू लगायेगे बर्तन माजेगे परन्तु पढ़ नही पायेंगे उनका क्या होगा?

मुख्यमंत्री - मुझे गरीबो का दर्द बहुत सताता है मैंने गरीबी देखी है मैं गरीब किसान के घर पैदा हुआ.

शिवा- सर आप गरीब के घर में पैदा होकर अमीर कैसे बन गये? मेरे पिता 12-12 घंट काम करते है परन्तु रोटी भी मुश्किल से मिल पाती है. हमारे घर में भाई-बहनो को पढ़ाने की स्थिति नहीं है और आपके बेटे बड़े स्कूलो में पढ़ते है.

मुख्यमंत्री- यह सब किस्मत का खेल है जो जैसा करता है वैसा भरता है.

शिवा - सर मैं पेपर बेचता हूं. मैंने पेपर में पढ़ा कि आपके ऊपर व्यापम घोटले आदि अनेक आरोप है परन्तु आपकी किस्मत अच्छी है कि आप मुख्यमंत्री है. मेरी उम्र तो कोई घोटलो की नही है और मेरे पिता भी मजदूर है जिसमें कोई घेाटाला नहीं होता परन्तु वे गरीब है उनकी किस्मत खराब क्यों है?

मुख्यमंत्री- अब वे सब छोड़ो हमारी सरकार ने शिक्षा का अधिकार लागू कर दिया है.

शिवा- सर अगर शिक्षा का अधिकार लागू है तो मुझे आपकी कृपा से पढ़ने का अवसर क्यों मिला? यह तो सभी बच्चों का अधिकार होता कि वे पढ़ने स्कूल जाते. स्कूल जाते समय सभी के पेट में रोटी होती तन पर कपड़े होते स्कूल की फीस चुकाने के लिये पैसे होते किसी मुख्यमंत्री को एक बच्चे मात्र की पढ़ाई के लिये कलेक्टर को नही कहना पड़ता. मैने अखबार में पढ़ा था कि समूचे प्रदेश में एक करोड़ के आस-पास बच्चे है. जिनसे 70 प्रतिशत बच्चे इतने गरीब घरो के है कि उन्हें पढ़ना सम्मभव नहीं है वे मध्यान्ह भोजन की लालच में स्कूल जाते है और मास्टर पढ़ाने की बजाय भोजन निर्माण निरीक्षण करते रहते है. हम बच्चे इंतजार करते रहते है. भोजन बन जाता है तो हम भोजन करते है. मास्टर सर थक जाते है और हम खाकर वापिस चले जाते है. पढ़ाई की बजाय शिक्षा देवी का भंडारा होता है यह कैसा अधिकार है मै समझ नही पा रहा हू?

मुख्यमंत्री - तुम इन बातों पर दिमाग मत लगाओं अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो.

शिवा - परन्तु सर हमारे स्कूल में अध्यापको की तालाबंदी चल रही है. अध्यापक वेतन की मांग कर रहे है और हड़ताल पर है. पुलिस उन्हें खीच-खीच कर भगा रही है. एक अध्यापक ने तो जहर पी लिया ऐसे में पढ़ाई कैसे सम्भव हो? अध्यापको को वेतन क्यों नही मिल रहा.

मुख्यमंत्री-तुम बेकार की बातो में मत पढ़ो. लगता है तुम्हें समाजवादियों ने भड़का दिया है. ये अध्यापक बेईमान है. मैं इन्हें पॉच हजार से बढ़ाकर पंद्रह हजार दे रहा हॅू. फिर भी ये हड़ताल कर रहे है मैं इन्हें ठीक कर दूगॉ इनकी एक बात नही मानूगॉ मैंने पुलिस से कह दिया कि इससे डंडो और जूतो से बात कर जेल में डालो हमारी सरकार लोकतांत्रिक तरीके से चुनी सरकार है.

शिवा- परन्तु सर लोग कहते है कि लोकतंत्र का मतलब बोलने का -मांग करने का षंाति पूर्ण अधिकार है. यह अध्यापक नारा लगाते है धरना देते है परन्तु इन्होंने कोई तोड़-फोड़ नहीं की कोेई अपराध नही किया तो फिर इन पर पुलिस का डंडा चलाना क्या गलत नही है? यह कैसा लोकतंत्र है जिसमें षांतिपूर्ण ढ़ग से मांग करने वालेा को डंडे और जेल की दम पर तोड़ा जाता है? अध्यापको का वेतन आपने बढ़ाया है परन्तु अध्यापक कहते है कि उनका वेतन अन्य अध्यापको के समान नही बढ़ा. अध्यापक कहते है संविधान में लिखा है समान काम का समान वेतन एक अध्यापक कह रहे थे कि सभी विधायको और मंत्रियो को समान वेतन मिलता है तेा फिर अध्यापको को क्यो नही? विश्व विद्यालयो के अध्यापको को एक लाख से अधिक मिलता है पक्के अध्यापको को स्कूल या कालेजो में 30 हजार से 60 हजार तक मिलता है और इन अध्यापको को 5-15 हजार मिलता है वे कहते है कि उनका गुजारा इतने में नही होता.

मुख्यमंत्री- तुम कम बोला करेा तुम अभी बच्चे हो. यह संविधान की बातो के चक्कर में मत पड़ो.

शिवा- सर यह संविधान क्या होता है? क्या इसे मानना सब को जरुरी है?

मुख्यमंत्री- यह संविधान अंविधान कुछ नही है. यह फालतू है. मैं जो कहॅूगां वही कानून है और वही संविधान है. यह संविधान वैसे ही धार्मिक ग्रंथ के समान है जिसे पढ़ो, रटो, बोलो पर अमल में मत लाओ. हम लोग तो संविधान बदलना चाहते है और नया संविधान लाना चाहते है.

शिवा- सर यह नया संविधान कैसा होगा? क्या उसके हम दलित के घर पैदा हुये लड़के दलित ही रहेगे ? गरीब और अमीर का क्या फर्क ऐसा ही रहेगा?

मुख्यमंत्री - यह सब किस्मत का मामला है. किस्मत को भगवान लिखता है भगवान बदलता है. सरकारे नही. हमारा काम तेा सरकारे चलाना और राज्य करना है. बस अब तुम जाओं और खूब पूजा पाठ करो भगवान तुम्हें खुश रखें.

मित्रों - यह संवाद एक मुख्यमंत्री व एक बालक का है साथ ही अगर अवसर मिले तो देश के लाखों करोड़ो बच्चों व व्यवस्था व तंत्र के मुख्यिाओं के बीच भी ऐसी ही संभावित है.

25.12.2015, 11.53 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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