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बेचैनी के समय में बदलाव ही सच

विचार

 

बेचैनी के समय में बदलाव ही सच

प्रीतीश नंदी


नए वर्ष में प्रवेश के साथ यह देखना मजेदार है कि कैसे हर कोई धीरज छोड़ता जा रहा है. हाल के बीते हुए वक्त में हमने कई नए ब्रैंड देखे हैं (इसके साथ कई ऑनलाइन बाज़ार), जो ग्राहकों की पुरानी वफादारियों में सेंध मारने में लगे हैं. किंतु ग्राहकों की अधीरता (या बेवफाई, आपके देखने के नज़रिये के हिसाब से) अब वैश्विक घटना हो गई है. .
 

फांसी

बड़े ब्रैंड वफादारी बरकरार रखने के लिए काफी बड़ी राशि खर्च कर रहे हैं, जबकि नए ब्रैंड ग्राहकों की वफादारी तोड़कर उन्हें अपनी ओर खींचने के लिए और भी ज्यादा रकम खर्च कर रहे हैं. अब विकल्पों की भरमार नई लत का रूप ले चुकी है और नई पीढ़ी इस पर टूटी पड़ रही है.

गैजेट्स इतनी खतरनाक रफ्तार से आसान होते जा रहे हैं कि हमारा हुनर सिकुड़ता जा रहा है. अब जल्दी ही धरती की विरासत नादानों के हाथों में होगी. अखबारों की खबरें छोटी होती जा रही हैं ताकि उन्हें पढ़ने में पाठकों की सांस न फूलने लग जाए. पत्रिकाओं में चित्र बढ़ते जा रहे हैं. ढाई घंटे की मूवी तो बीते जमाने की बात होती जा रही है. मल्टीप्लेक्स 90 मिनट की मूवी की मांग कर रहे हैं ताकि वे ज्यादा से ज्यादा शो दिखा सकें और दर्शकों के धैर्य की परीक्षा भी न हो. यहां तक कि विज्ञापनों की अवधि भी घटती जा रही है.

ट्रैलर का भी यही हाल है. किताबें छोटी होती जा रही हैं. कोई ‘यूलिसिस’ जैसा मोटा उपन्यास पढ़ने को तैयार नहीं है. लियो टालस्टॉय का ‘वॉर एंड पीस’ तो फिलहाल आउट ऑफ प्रिंट हो गया है यानी छप ही नहीं रहा. अब ज्यादा लोग शास्त्रीय संगीत के सम्मेलनों में नहीं जाते. ऐसी बात नहीं है कि उन्हें अब किशोरी अमोणकर का गायन पसंद नहीं है, लेकिन शास्त्रीय संगीत रवानी में आने के लिए बहुत वक्त लेता है और इसके औपचारिक माहौल में यह सुविधा नहीं होती कि आप चाहे जब भीतर आ जाएं और चाहे जब उठकर चलते बनें.

इसकी बजाय लाउंज बार तुलनात्मक रूप से सुविधाजनक है. आप जाएं, ड्रिंक लें और माइक पर कुछ संकोच के साथ गाया जा रहा है कि कैसे प्रेम हमें बदल देता है. यदि यह बनावटी गायन आपको उबा दे तो चहलकदमी करते हुए बाहर जाकर ताजी हवा ले लें. बातचीत भी छोटी होती जा रही है. काम की समय-सीमा बहुत कठोर होती जा रही है. किसी काम को पूरा करने के लिए कोई आपको दो हफ्ते देने को तैयार नहीं हैं. नई डेडलाइन है- 48 घंटे बशर्ते आप सरकारी दफ्तर में काम न कर रहे हों.

यह सच है कि अब अधिक लोग छुटि्टयों पर जा रहे हैं, लेकिन छुटि्टयां छोटी, तेज रफ्तार और करने के लिए बहुत-सी चीजों से भरी होती हैं. फ्रेंच रिवीएरा या एमाल्फी कोस्ट पर महीने भर की छुट्‌टी तो कब की फैशन के बाहर हो चुकी है. लोग छोटे ट्रेक और संक्षिप्त क्रूज की सैर पर जाते हैं. मसाई मारा के वन्य जीवन को देखने लोग चार दिन के लिए जाते हैं, जिसके लिए हमें पूरी जिंदगी लग गई.

शादियां छोटी होती जा रही हैं. मेरा पहला विवाह कामयाब नहीं हुआ और फिर भी वह आठ साल चला. आज कोई शादी यदि कामयाब नहीं होती तो वह आठ दिन के आगे नहीं चलती. दोनों में से कोई सामान बांधकर रुखसत हो जाता है. बाकी का काम वकील कर देते हैं. अन्य प्रकार के संबंध तो और भी छोटे हो गए हैं.

आई लव यू, 48 घंटों से भी कम समय में दैहिक रिश्तों में बदल जाता है, क्योंकि दो लोगों के लिए बेडरूम और पूरा अपार्टमेंट तो ठीक बाथरूम शेयर करना भी कठिन है. अधीरता तो नज़र न आने वाली बारूदी सुरंग की तरह हो गई है. आप शायद सबसे खराब स्थिति के लिए तैयार होंगे पर यह भी उतना बुरा नहीं है, जिसका सामना करना पड़ सकता है. बशर्ते आपने ऐसे प्रेम-संबंध को न भुगता हो, जो सड़ चुका हो.

लोग अब बाग-बगीचे विकसित नहीं करते. ऐसी बात नहीं है कि उनके घर में जगह की कमी है, क्योंकि जगह तो ऐसी चीज है कि कोई भी चतुर आर्किटेक्ट उसे निर्मित कर सकता है. आप चाहें तो आप भी यह कमाल कर सकते हैं. बगीचे को सिर्फ जगह की ही जरूरत नहीं होती. उन्हें निर्मित करने के लिए धैर्य की सख्त जरूरत होती है. लोगों को अपने ऐसे पालतू प्राणियों से नफरत होती है, जो उनके धैर्य की परीक्षा लेते हैं. यही कारण है कि आपको सड़कों पर इतने सारे बिल्ली और कुत्ते नजर आते हैं, जिन्हें उनके मालिकों ने छोड़ दिया है.

बच्चों को इस तरह त्यागने की जरूरत नहीं होती. वे खुद ही घर से भाग जाते हैं. और पहले किसी समय की तुलना में अाज ज्यादा बच्चे घर छोड़कर चले जाते हैं, क्योंकि उनके पालकों को लगता है कि वे उनकी परीक्षा ले रहे हैं. और पालकों को ऐसा क्यों लगता है? बहुत मर्तबा इसलिए, क्योंकि उन बच्चों का आकलन अन्य बच्चों से तुलना करके किया जाता है और उनकी कमजोरियों पर खासतौर पर सवाल उठाए जाते हैं.

हर किसी को अपने घर में आइंस्टीन चाहिए. कोई इस बात को समझना नहीं चाहता कि आइंस्टीन को कोटा की किसी कोचिंग क्लास में तैयार नहीं किया गया था. यदि उन्हें आइंस्टीन न मिले तो कम से कम केबीसी विजेता तो होना ही चाहिए. कोई ऐसा जो घर पर 7 करोड़ रुपए की जीत की रकम लेकर आए और पड़ोसियों का जलन के मारे धुआं निकलने लगे. अब भी कुछ लोग ऐसे होंगे, जिन्हें सचिन की तमन्ना होगी, लेकिन आज इतना धैर्य किसके पास है कि सचिन को तब तक गढ़ते रहें जब तक वह पहले एक अरब रुपए नहीं कमा लेता?

हर कोई तत्काल रईस बनना चाहता हैं, इसलिए नौकरियां बार-बार बदली जा रही है और नौकरियों की साइट पैसा कमा रही है, क्योंकि हर किसी को ऐसी नौकरी चाहिए, जो ज्यादा पैसा दे. कबाड़ बेचने वाली साइट आज नौकरियां पोस्ट कर रही हैं. हर दफ्तर से लंबी सेवा के प्रमाण-पत्र गायब हो गए हैं. नौकरियों में छलांग लगाने वालों की भरमार है. अब हम खरगोश जैसे हो गए हैं. छलांग..छलांग..छलांग पता नहीं किस ओर. क्योंकि अब कुछ भी हमें संतुष्ट नहीं करता.

हम हमेशा किसी नए जुनून की तलाश में रहते हैं. अधीरता ही हमारे वक्त की लत है. हम लगातार और की मांग करते हैं, इसलिए नहीं कि हमें अधिक आवश्यकता है. हम ऐसा इसलिए करते हैं, क्योंकि अधिक की मांग करना हमारी आनु‌वांशिकी में शामिल हो गया है. हर सीजन में शॉप विंडो में कोई नई चीज आ जाती है. नया उपभोक्तावाद हमारे अधैर्य पर ही पल रहा है जैसे कि नई राजनीति.

मोदी शानदार बहुमत से जीते और देश की हरसतों को थाम लिया. इसके पहले कि वे कुर्सी पर जम पाते, ‘आप’ ने दिल्ली जीतकर भाजपा को हैसियत दिखा दी. केजरीवाल अपना घर ठीक करते, इसके पहले ही मीडिया उनके पीछे पड़ गया. लंबे समय तक कोई सुरक्षित नहीं है. हर दिन नई सुर्खी है, एक नई लड़ाई, नया आक्रोश. आप यह अंदाजा लगा पाएं कि कल क्या होगा, इससे पहले अगला दिन आपकी कॉलर पकड़ लेता है. बदलाव के अलावा आज किसी बात का पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सकता है. हमारे अधैर्य से प्रेरित बदलाव.

19.01.2016, 16. 15 (GMT+05:30) पर प्रकाशित