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नफरत एवं ध्रुवीकरण का साल

विचार

 

नफरत एवं ध्रुवीकरण का साल

नेहा दाभाड़े


सांप्रदायिक हिंसा, इससे जनित ध्रुवीकरण और विभिन्न समुदायों के बीच बढ़ती नफरत, सन 2015 में भारत के लिए सबसे बड़े खतरे के रूप में उभरी. इससे सांप्रदायिक सद्भाव में कमी आई और प्रजातांत्रिक व्यवस्था द्वारा हमें दी गईं आज़ादियों पर बंदिशें लगीं. एक प्रष्न के उत्तर में गृह राज्यमंत्री किरण रिजिजू ने संसद को बताया कि सन 2015 में अक्टूबर माह तक सांप्रदायिक हिंसा की 650 घटनाएं र्हुइं, जिनमें 84 लोग मारे गए और 1979 घायल हुए.

दंगा


‘द टाईम्स ऑफ इंडिया’ के अनुसार, अक्टूबर तक देश में सांप्रदायिक हिंसा की 630 घटनाएं हुईं. अखबार के अनुसार, 2014 में ऐसी घटनाओं की संख्या 561 थी. सन 2014 में सांप्रदायिक हिंसा में मरने वालों की संख्या 95 थी. राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो (एनसीआरबी) के अनुसार, देश में पिछले वर्ष 1227 सांप्रदायिक दंगे हुए, अर्थात एनसीआरबी के आंकड़े, केंद्रीय गृह मंत्रालय के आंकड़ों से लगभग दोगुने हैं.

गृह मंत्रालय की रपट के अनुसार, सन 2015 में कोई ‘बड़ी’ सांप्रदायिक घटना नहीं हुई परंतु दो ‘महत्वपूर्ण’ सांप्रदायिक घटनाएं हुईं. ये दो घटनाएं थीं अटाली में मस्ज़िद के निर्माण को लेकर हुई हिंसा और दादरी, उत्तरप्रदेश घर में गौमांस रखने के संदेह में एक व्यक्ति की पीट-पीटकर हत्या.

यह दिलचस्प है कि केंद्रीय गृह मंत्रालय, सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं को दो वर्गों में बांटता है: ‘बड़ी’ व ‘महत्वपूर्ण’. ‘बड़ी’ सांप्रदायिक हिंसा की घटना उसे माना जाता है जिसमें पांच से अधिक व्यक्ति मारे गए हों या दस से अधिक घायल हुए हों. ‘महत्वपूर्ण’ घटना वह है जिसमें कम से कम एक व्यक्ति मारा गया हो या दस घायल हुए हों.

इन आंकड़ों को ध्यान से देखने पर इस साल हुई सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं की कुछ विषेषताएं उभरकर सामने आती हैं. पहली बात तो यह है कि इस साल मरने वालों और घायल होने वालों की संख्या कम रही, यद्यपि पिछले साल की तुलना में घटनाओं की संख्या में मामूली वृद्धि हुई. जहां 2014 में सांप्रदायिक हिंसा में 90 लोग मारे गए थे, वहीं 2015 में मृतकों की संख्या 84 थी.

इस तथ्य से हिंदू राष्ट्रवादियों के सत्ता में आने के बाद से, सांप्रदायिक हिंसा की प्रकृति में हुए परिवर्तन का अंदाज़ा लगता है. अब सांप्रदायिक हिंसा इस तरह से करवाई जाती है कि उससे सांप्रदायिक धुरवीकरण तो हो परंतु मृतकों और घायलों की संख्या कम रहे ताकि मीडिया का ध्यान उस ओर न जाए.

इन दिनों हो रही सांप्रदायिक हिंसा का मुख्य उद्देष्य, हाशिए पर पड़े वर्गों को आतंकित करना और उन्हें दोयम दर्जे के नागरिक का दर्जा स्वीकार करने के लिए मजबूर करना है. कम तीव्रता की इस हिंसा के ज़रिए, हिंदू राष्ट्रवादी, समाज पर अपने नियम थोपना चाहते हैं. उनकी अपेक्षा यह है कि हाशिए पर पड़े वर्ग, विषेषकर अल्पसंख्यक, जीवित तो रहें परंतु बहुसंख्यकों की मेहरबानी पर.

अटाली (हरियाणा), हरषूल (महाराष्ट्र) व दादरी (उत्तरप्रदेश) में हुई सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं में ऐसे समुदायों के बीच भिडं़त हुई, जो अब तक शांतिपूर्वक एक साथ रहते आए थे. अटाली के मुस्लिम रहवासियों के घर और दुकानें लूट ली गईं और उन्हें आग के हवाले कर दिया गया. उनके वाहनों को जलाकर नष्ट कर दिया गया. मुसलमानों को अपनी जान बचाने के लिए अपने घर छोड़कर भागना पड़ा. इस विस्थापन के कारण उन्हें ढेर सारी परेशानियां झेलनी पड़ीं.

सांप्रदायिक हिंसा के शोधकर्ता इस तरह की हिंसा को ‘सबरडार’ हिंसा कहते हैं. जैसा कि ऊपर बताया जा चुका है, केंद्रीय गृह मंत्रालय ने सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं को दो वर्गों में बांटा और हिंसा की एक-एक घटना को इन दोनों वर्गों में रख दिया. यह, इन घटनाओं और देश में व्याप्त सांप्रदायिक तनाव और हिंसा को कम करके दिखाने का प्रयास है.

इसके अतिरिक्त, 2015 में सांप्रदायिक हिंसा घटनाएं शहरी क्षेत्रों के अलावा छोटे शहरों, कस्बों और गांवों में भी हुईं. इसके पहले तक सांप्रदायिक हिंसा मुख्यतः शहरों तक सीमित रहती थी परंतु आंकड़ों के अध्ययन से यह स्पष्ट हो जाता है कि सांप्रदायिकता का ज़हर हमारे देश के ग्रामीण इलाकों में तेज़ी से फैलता जा रहा है. पलवल, कन्नौज, पछोरा व शामली जैसे छोटे शहरों में सन 2015 में सांप्रदायिक हिंसा हुई. ग्रामीण इलाकों में छोटे पैमाने पर अलग-अलग बहानों से सांप्रदायिक हिंसा भड़काई गई.

इस वर्ष सांप्रदायिक हिंसा के मुख्य केन्द्र थे पष्चिमी उत्तरप्रदेश, बिहार और हरियाणा. इन राज्यों को सांप्रदायिक हिंसा भड़काने के लिए क्यों चुना गया, यह पॉल ब्रास द्वारा देश में बड़े सांप्रदायिक दंगों के अध्ययन के नतीजों से समझा जा सकता है.
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