पहला पन्ना प्रतिक्रिया   Font Download   हमसे जुड़ें RSS Contact
larger
smaller
reset

इस अंक में

 

क्यों बढ़ रहा भूख का आंकड़ा

हमारे कुलभूषण को छोड़ दो

भारत व अमेरिका में केमिकल लोचा

सवाल विकास की समझ का

प्रतिरोध के वक्ती सवालों से अलग

गरीबी उन्मूलन के नाम पर मज़ाक

जनमत की बात करिये सरकार

नेपाल पर भारत की चुप्पी

लोहिया काल यानी संसद का स्वर्णिम काल

स्मार्ट विलेज कब स्मार्ट बनेंगे

पाकिस्तान आंदोलन पर नई रोशनी

नर्मदा आंदोलन का मतलब

क्यों बढ़ रहा भूख का आंकड़ा

हमारे कुलभूषण को छोड़ दो

भारत व अमेरिका में केमिकल लोचा

युद्ध के विरुद्ध

किसके साथ किसका विकास

क्या बदल रहा है हिन्दू धर्म का चेहरा?

मोदी, अमेरिका और खेती के सवाल

 
  पहला पन्ना >रघु ठाकुर Print | Share This  

बिचौलिये बढ़ा रहे खाद्यानों के दाम

विचार

 

बिचौलिये बढ़ा रहे खाद्यानों के दाम

रघु ठाकुर


भारत सरकार ने हाल में ही प्याज को निर्यात करने की अनुमति देने का फैसला किया सरकार की ओर से यह कहा गया है कि किसानों को प्याज के दाम पर्याप्त मिल सके इसलिये प्याज को निर्यात करने का निर्णय किया गया. अभी कुछ ही माह पहले दिल्ली विधानसभा चुनाव के समय भारत सरकार ने प्याज के निर्यात पर यह कह कर रोक लगाई थी कि प्याज के दाम बहुत बढ़ गये है और उत्पादन और उपलब्धता कम है.
 

दाल

उस समय शहरों के बाजारो में प्याज के दाम बढ़कर 100 रुपये किलो के आसपास तक पहॅुच गये थे और समाचार पत्रों, टी.वी.चैनलों तथा सोशल मीडिया पर तो प्याज ही प्रमुखता से थी, नाना प्रकार के व्यंग और चुटकुले के माध्यम से प्याज के दाम वृद्धि की चर्चा आम जन तक पहॅुच रही थी. हॉलाकि दिल्ली विधानसभा चुनाव समाप्त होते ही प्याज के दाम कम होना शुरु हो गये और अब शहरों के फुटकर बाजार में 10-15 रुपये किलो की दर से प्याज बिक रही है .

इस प्रकार बिहार विधानसभा के पूर्व बेला में अरहर की दाल के दाम बढ़ना शुरु हुये थे जो बढ़ते-बढ़ते 200 रु. किलो तक पहुच गये थे और अरहर की दाल ने भी बिहार विधान सभा चुनाव को बहुत प्रभावित किया. हांलाकि चुनाव के बाद अरहर के दाल के दाम भी घटकर 130-140 रुपये किलो तक पहॅुच गये. अरहर के दाम वृद्धि के समय भी भारत सरकार ने यह तर्क दिया था कि अरहर का उत्पादन कम हुआ है, और दामों को कम करने के लिये अरहर का आयात शुरु किया था.

बताया जाता है कि, दिल्ली के एक ही आयात-निर्यात करने वाले व्यापारी को, जिसका सम्बन्ध सरकारी पार्टी के साथ था अरहर की दाल आयात करने का अधिकार दिया गया था और उसने कई लाख टन अरहर दाल आयात की या आयात करना बताया.

अब अचानक बाजार में लहसुन के दाम बढ़े है और दाम 400 रुपये किलो तक पहुंच गये लहसुन की एक पोटी 20 रुपये में बिक रही. यह अवश्य है कि इस समय कोई चुनाव नही है, मीडिया, सोशल मीडिया पर लहसुन की चर्चा उस प्रमुखता से नही हो पा रही जिस तरह से प्याज, अरहर की हुई थी,

प्याज, अरहर, लहसुन के दामों के उतार चढ़ाव के वर्णन करने का मेरा उद्देश्य इस बात की तह में जाने का प्रयास है कि इन दामों के उतार चढ़ाव की वजह क्या है? और इसके पीछे कौन सी शक्तियॉ है या उनके क्या उद्देश्य हो सकते है. जब किसान की फसल आती है तो यही प्याज 2 रुपये किलो के भाव से या कभी-कभी इससे कम में भी बिक जाती है. जिसे खरीद कर लखपति बिचौलिये अपनी गोदाम में भर लेते है.

इसी प्रकार पिछले साल अरहर पैदा करने वाले किसान को 44 रुपया किलो याने 4400 रुपये क्विटंल की दर से दाम मिले थे, जो दाल बाद में बाजार में 20000 हजार रुपया क्विंटल बिकी लहसुन की फसल जब आती है तो यही लहसुन 1 रुपया 2 रुपया के भाव से बिक जाता है और अब वही लहसुन 400 रुपये के भाव से बिक रहा है.

1. दरअसल यह बाजार की लूट है इस बाजार को सरकारो ने लूट की खुली छूट दी. चूंकि किसानों की फसल के दाम सरकार तय करती है और कभी-कभी बाजार और व्यापारी तय करते है. कुल मिलाकर बाजार पर सरकार या बिचौलियो का ही निंयत्रण है और निंयत्रण का पूरा लाभ बिचौलिया उठाते है जो किसान फसल पैदा करता है उसे लागत मूल्य ही नही मिल पाता है और वह भूखा और कर्जदार बना रहता है तथा कई बार कर्ज के दबाव में आत्महत्या करने को लाचार होता है, परन्तु बिचौलिये जिनके पास थोक बंद खरीद करने की फिर बेचने की भंडारण की और यातायात की पूंजी और आर्थिक क्षमता है वे बगैर किसी परिश्रम के चंद वर्षो में अरबपति बन जाते है.

2. चूंकि कृषि उपजों या खाद्यन्न का मंहगाई से सीधा संबध उपभोक्ता से होता है जो खाद्यन्न की मॅहगाई से सीधा प्रभावित होता है और मीडिया उसके मंहगाई के घाव को कुरेद-कुरेद कर दर्द का एहसास कराता है इसलिये राजनैतिक निर्णय में इस दाम वृद्धि का सीधा असर होता है. प्याज और दाल के दाम सरकारो को बदलने के हथियार बन जाते है और पिछले 35 वर्षो से याने लगभग 1998 से प्याज के दाम विषेषतः मध्यम वर्ग और गरीब वर्ग के मतदाताओं को प्रभावित करते है हांलाकि यह मतदाता भी कभी इस मॅहगाई के कारणों की खेाज करने का प्रयास नही करता.

3. नकारात्मक राजनीति केवल अलोचना को ही योग्यता या कार्यक्रम बना देती है. जिस सरकार के कार्यकाल में खाद्यान्न दाम बढ़ते है लोग उसके खिलाफ हो जाते है और उसके खिलाफ मीडिया में दिखने वाली विरोधी ताकत और पार्टी के साथ वह हो जाते है तथा जब विरोधी पार्टी स्वतः सरकार में आ जाती है तब वह भी इसी दाम वृद्धि के ढेर्रे पर चलने लगती है, और फिर वही मतदाता उससे नाराज हो कर पुरानी उस गुनाहगार पार्टी को जिसे उन्होंने मंहगाई के कारण हटाया था पुनः वापिस ले आते है यह चक्र लगातार चलता रहता है.
आगे पढ़ें

Pages:

इस समाचार / लेख पर अपनी प्रतिक्रिया हमें प्रेषित करें

  ई-मेल ई-मेल अन्य विजिटर्स को दिखाई दे । ना दिखाई दे ।
  नाम       स्थान   
  प्रतिक्रिया
   


 
  ▪ हमारे बारे में   ▪ विज्ञापन   |  ▪ उपयोग की शर्तें
2009-10 Raviwar Media Pvt. Ltd., INDIA. feedback@raviwar.com  Powered by Medialab.in