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कश्मीरी पंडितों की बदहाली का राजनीतिकरण

विचार

 

कश्मीरी पंडितों की बदहाली का राजनीतिकरण

राम पुनियानी


राजनीति एक अजब गजब खेल है. इसके खिलाड़ी वोट कबाड़ने के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते हैं. इन खेलों से हमें संबंधित खिलाड़ी की राजनैतिक विचारधारा का पता तो चलता ही है इससे हमें यह भी समझ में आता है कि इस खेल में किस तरह घटनाओं को तोड़ा मरोड़ा जाता है और एक ही घटना की किस तरह परस्पर विरोधाभासी व्याख्याएँ की जाती हैं. कश्मीरी पंडितों के मामले में भी ऐसा ही कुछ हो रहा है.

कश्मीरी पंडित


अपने चुनाव अभियान के दौरान भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी ने कई ऐसी बातें कहीं जो या तो तथ्यात्मक दृष्टि से गलत थीं या फिर घटनाओं की सांप्रदायिक व्याख्या पर आधारित थीं. उन्होंने कहा कि देश के धर्मनिरपेक्ष ढांचे को सबसे बड़ी चोट तब पहुंची जब कश्मीरी पंडितों को कश्मीर घाटी से पलायन करना पड़ा. उन्होंने यह दावा भी किया कि इसके पीछे अब्दुल्ला शेख फारूख व उमर थे.

यह बात उन्होंने 28 अप्रैल 2014 को एक जनसभा में कही. जवाब में फारूख और उमर अब्दुल्ला ने कहा कि कश्मीरी पंडितों के पलायन के समय कश्मीर में राष्ट्रपति शासन था और भाजपा नेता जगमोहन राज्य के राज्यपाल थे. उस समय केन्द्र में विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार थी जिसे भाजपा बाहर से समर्थन दे रही थी. तीनों अब्दुल्लाओं में जमीन आसमान का फर्क है. उनकी भूमिकाएँ अलगण्अलग रही हैं. वे तीनों घर्मनिरपेक्षता के पैगम्बर भी नहीं हैं. परन्तु घाटी से पंडितों के पलायन के लिए केवल उन्हें जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता.

सच यह है कि सांप्रदायिकता हमेशा से भारतीय उपमहाद्वीप का अभिशाप रही है और इसका सबसे त्रासद नतीजा था भारत का विभाजन जिसमें लाखों लोगों ने अपनी जानें गवाईं और अपने घरबार और धंधा रोजगार खो बैठे. सांप्रदायिकता के दानव के कारण ही सीमा के दोनों ओर रहने वाले लाखों लोगों को अपनी जन्मभूमि से सैंकड़ों मील दूर अनजान शहरों और गांवों में स्थानीय लोगों और सरकार के रहमोकरम पर बसना पड़ा. सांप्रदायिकता के कारण शहरों के अंदर भी पलायन की प्रवृत्ति बढ़ी है.

मुंबई में 1992-93 और गुजरात में 2002 के दंगों के बाद हजारों लोगों ने अपने घरबार छोड़कर ऐसे मोहल्लों में बसने का निर्णय लिया जहां उनके समुदाय के लोगों का बहुमत था. इससे कई शहरों में एक ही समुदाय के लोगों की बस्तियां बस गईं. मुंबई में मुंबरा और अहमदाबाद में जुहापुरा ऐसी बस्तियों के उदाहरण हैं.

कश्मीरी पंडितों के घाटी से पलायन के मूल में है विभाजन के बाद कश्मीर के महाराजा का स्वतंत्र बने रहने का निर्णय. इसके बाद पाकिस्तान कबायलियों ने कश्मीर पर हमला कर दिया शेख अब्दुल्ला ने पाकिस्तान की बजाए भारत के साथ विलय पर जोर दिया और कश्मीर के महाराजा हरिसिंह ने भारत के साथ संधि पर हस्ताक्षर कर दिए.

शेख अब्दुल्ला ने मुस्लिम बहुल पाकिस्तान की बजाए हिन्दू बहुल भारत को इसलिए चुना क्योंकि उन्हें यह दृढ़ विश्वास था कि गांधी और नेहरू के नेतृत्व में भारत में धर्मनिरपेक्षता जीवित रहेगी और फूले फलेगी. सांप्रदायिक तत्वों द्वारा गांधी जी की हत्या संविधान के अनुच्छेद 370 को रद्द करने के लिए फिरकापरस्त ताकतों द्वारा दबाव बनाए जाने जाने आदि के चलते कश्मीर की स्वायत्तता पर प्रश्न उठाए जाने लगे.

यह महत्वपूर्ण है कि अनुच्छेद 370ए कश्मीर के भारत में विलय का आधार था. इस अनुच्छेद के अंतर्गत रक्षा संचार मुद्रा और विदेशी मामलों को छोड़कर सभी मसलों में निर्णय लेने की कश्मीरी की विधानसभा को पूरी स्वायत्तता थी. सांप्रदायिक ताकतें इस स्वायत्तता के विरूद्ध थीं और चाहती थीं कि भारत सरकार सेना का इस्तेमाल कर कश्मीर की स्वायत्तता को समाप्त कर दे और उस पर जबरन कब्जा कर ले.

इस तरह की बातों से शेख अब्दुल्ला को बहुत धक्का लगा और उन्हें लगने लगा कि कहीं उन्होंने कश्मीर का भारत के साथ विलय कर गलती तो नहीं कर दी. यह भारत के साथ कश्मीर के अलगाव की शुरूआत थी. पाकिस्तान ने इस अलगाव की भावना को जमकर हवा दी जिससे इसने खतरनाक मोड़ ले लिया.

शुरूआती दौर में कश्मीरियों की अतिवादिता कश्मीरियत की अवधारणा पर आधारित थी. कश्मीरियत बौद्ध धर्म वेदान्त और सूफी परंपराओं का मिलाजुला स्वरूप है. सन् 1985 में मकबूल भट्ट को फाँसी दिए जाने के बाद और कश्मीर घाटी में अलकायदा के लड़ाकों के घुसपैठ के चलते इस अतिवाद का स्वरूप बदल गया. इसने सांप्रदायिक स्वरूप ग्रहण कर लिया. नतीजे में हिन्दू पंडित अतिवादियों के निशाने पर आ गए.
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