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मंदी से कैसे मिले निजात | प्रीतीश नंदी

विचार

 

मंदी से कैसे मिले निजात

प्रीतीश नंदी

 

क्रिसमस का मौका है और नव-वर्ष से पूर्व आखिरी सप्ताह, इसलिए इस बार आतंकवाद जैसे मसले को परे रख देते हैं। साल का अंत सकारात्मक बातों से हो, यही बेहतर है। पिछला महीना खासकर बेहद बुरा गुजरा है।

आतंकियों ने सारी सुर्खियां बटोर लीं और देखा जाए तो यही उनका मकसद भी था। इस हत्याकांड और तमाम बमबारी का मंतव्य हमें इस कदर भयभीत करना था कि हम सामान्य ढंग से जीना भूल जाएं। उनका मकसद था हमें हमेशा अपनी सुरक्षा की चिंता के लिए, एक-दूसरे पर अविश्वास के लिए और ऐसे राष्ट्र बनने के लिए विवश करना जैसा हम कभी नहीं बनना चाहते। आप देखें कि आजकल क्या हो रहा है, तो आपको महसूस होगा वे कुछ हद तक अपने मकसद में कामयाब भी हुए हैं। आज हम अपनी ही आशंकाओं के गुलाम हो गए हैं और यहीं पर ये जुल्मी जीत गए हैं।

इस वजह से आतंकवाद को थोड़ा विराम देते हैं और दूसरे अहम मसले पर गौर करते हैं। यह अहम मसला है आर्थिक मंदी। वैसे हम लंबे समय से इससे बचे रहने की बात कहते चले आ रहे हैं, भले ही इससे सभी लोग प्रभावित हो रहे हैं। सरकार इस बात पर जोर देती है कि विकास की गाड़ी पटरी पर है, जबकि खुद इसके आंकड़े बिलकुल उलट तस्वीर पेश करते हैं। हमारी सरकार का कहना है कि आगामी साल बेहतर होगा, लेकिन वैश्विक विश्लेषकों का मानना है कि स्थिति और बदतर हो सकती है।

सरकार अर्थव्यवस्था के लिए बेलआउट पैकेजों पर पहले ही काफी खर्च कर चुकी है, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला है। उसे सिर्फ इतना करना होगा कि आगामी साल में खर्चे पर लगाम लगाए और इसकी बजाय लोगों को अपनी बचत से पैसा खर्च करने दे.



आंकड़ों पर नजर डालते हैं। बिक्री में गिरावट है। औद्योगिक उत्पादन के भी ऐसे ही हालात हैं। कारखाने बंद हो रहे हैं। विदेशी मुद्रा भंडार कम हो गया है। मौजूदा भुगतान संतुलन नकारात्मक है और जब तक निर्यात पुराने स्तर तक वापस नहीं आता, इसके इसी तरह रहने का अंदेशा है। शेयर बाजार, जो इस बात का निष्पक्ष संकेतक है कि दुनिया हमारे भविष्य के बारे में क्या सोचती है, वह भी बेहतर स्थिति में नहीं है। न ही रुपए की हालत अच्छी है। हालांकि सरकार ने कुछ सुधारात्मक कदम उठाए हैं, लेकिन इनका खास असर नहीं पड़ा है।

सिर्फ बैंकों के पास नकदी बढ़ गई है और तेल कंपनियां भारी मुनाफा कमा रही हैं। लेकिन इससे आप और हमें कैसे फायदा है? यहां तक कि आवासीय कर्ज पर घटती ब्याज दरों का भी ज्यादा मतलब नहीं है। आजकल 20 लाख रुपए से कम में अच्छे फ्लैट्स कहां मिलते हैं। इसलिए हमें कुछ और बेहतर उपाय करने चाहिए। मेरे तीन सुझाव हैं, हालांकि इनमें से कोई भी बिलकुल मौलिक नहीं है, लेकिन हां, इनसे कुछ बदलाव जरूर आ सकता है। दूसरे देशों ने इन्हें अपने यहां अलग-अलग संदर्र्भो में सफलतापूर्वक लागू किया है। इसलिए मैं निश्चित तौर पर कह सकता हूं कि मौजूदा दौर में हम भी ऐसा कर सकते हैं।

पहला सुझाव, तेल कंपनियों को बेजा लाभ कमाने से रोका जाए। इसके अलावर्ा ईधन पर अलग-अलग स्तर पर करों को भी रोकना होगा। तेल की कीमतें वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों के हिसाब से हों। ऐसा होने पर आपको पेट्रोल 18 रुपए और डीजल 4 रुपए तक सस्ता पड़ेगा। इससे तकरीबन हर वस्तु काफी हद तक हमारी क्रयशक्ति के दायरे में होगी। सब जगह उत्पादों की कीमतें कम करने की होड़ होगी। यात्रा व पर्यटन के क्षेत्र में उछाल आएगा। बिक्री बढ़ जाएगी। लोगों के पास खर्च करने के लिए ज्यादा पैसा होगा। इससे उपभोक्ता खरीद बढ़ जाएगी और आर्थिक गतिविधियों को संजीवनी मिलेगी। आखिरकार, इससे अर्थव्यवस्था पर छाई निराशा की धुंध छंटेगी और औद्योगिक मंदी की वजह से लोगों को तालाबंदी और छंटनी का जो लगातार भय सता रहा है, उससे भी निजात मिलेगी। इससे भारत के बड़े कामकाजी वर्ग को राहत मिलेगी

दूसरा सुझाव, चूंकि सरकार का मानना है कि मंदी से लड़ने के लिए आवासीय सेक्टर को संभालना बेहद अहम है, तो वह वैसा क्यों नहीं करती जो क्लिंटन ने 1996 में किया- लोगों के लिए प्रॉपर्टी खरीदने-बेचने की प्रक्रिया आसान बनाते हुए उन्हें इसके लिए पूंजीगत लाभ कर से निजात दी जाए? इससे काफी बढ़ावा मिलेगा और साथ ही साथ काला धन भी मिटेगा व प्रॉपर्टी की कीमतें कम होंगी। प्रॉपर्टी नकद बेचने की मुख्य वजह पूंजीगत लाभ से बचना ही है। यदि आप पूंजी लाभ को करमुक्त बना देते हैं तो काला धन गायब हो जाएगा और हजारों लोगों के लिए प्रॉपर्टी पाना आसान हो जाएगा। उन्हें इसके लिए कम पैसा देना होगा और विक्रेताओं को टैक्स-फ्री बॉन्ड्स के पीछे नहीं भागना होगा, जो हमेशा उपलब्ध नहीं होते और जब होते भी हैं तो इनसे मामूली राहत ही मिलती है।

तीसरा सुझाव, सभी व्यक्तिगत करदाताओं को एक साल के लिए आयकर से मुक्ति दे दी जाए। रिटर्न्‍स दाखिल किए जाएं ताकि उनके कर संबंधी रिकॉर्ड में निरंतरता बनी रहे, लेकिन लोगों को अपनी कर की रकम खुद रखने और खर्च करने की छूट हो। अर्थव्यवस्था के लिए इससे बेहतर कदम और कुछ नहीं होगा। मंदी से लड़ने के लिए किए जा रहे भारी-भरकम खर्च के मुकाबले इससे खजाने पर काफी कम भार पड़ेगा। सरकारी अधिकारी इसकी अनुशंसा नहीं करेंगे, क्योंकि जैसा हम सब जानते हैं कि उन्हें तभी फायदा होता है जब जनता से पैसा जुटाया जाए और जब पैसा खर्च होता है। यह एक बेहतर चुनावी कदम हो सकता है। और हां, सरकार वास्तव में इस तरीके से पैसा बचाएगी। जनता के खर्चे में बढ़ोतरी, औद्योगिक उत्पादन में वृद्धि और व्यावसायिक गतिविधियों को फिर से गति मिलने से अप्रत्यक्ष और कारपोरेट करों में पर्याप्त इजाफा होगा, जो व्यक्तिगत आयकर के एक साल के घाटे की भरपाई के लिहाज से कहीं अधिक होगा।

नहीं, यह रॉकेट साइंस नहीं है। सरकार अर्थव्यवस्था के लिए बेलआउट पैकेजों पर पहले ही काफी खर्च कर चुकी है, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला है। यहां कोई नकदी बाहर नहीं जा रही है। उसे सिर्फ इतना करना होगा कि आगामी साल में खर्चे पर लगाम लगाए और इसकी बजाय लोगों को अपनी बचत से पैसा खर्च करने दे। रातोरात देश का मिजाज बदल जाएगा और कौन जानता है कि इससे यूपीए का एक और कार्यकाल भीसुनिश्चित हो जाए। हो सकता है कम्युनिस्टों को यह पसंद न आए, लेकिन क्या वास्तव में यह मायने रखता है?

 

25.12.2008, 22.25 (GMT+05:30) पर प्रकाशि


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