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आंकड़ों की खेती, वायदों की सिंचाई

विचार

 

आंकड़ों की खेती, वायदों की सिंचाई

रघु ठाकुर


म.प्र. सरकार को भारत सरकार ने तीसरी बार कृषिकर्मण पुरस्कार से पुरस्कृत किया है. पुरुस्कार ग्रहण करने के बाद म.प्र. के मुख्यमंत्री काफी प्रसन्न है और उनकी प्रसन्नता स्वभाविक भी है क्योंकि केन्द्र के पुरस्कार मिलने का एक अर्थ या एक जन संदेश यह भी है कि मुख्यमंत्री से प्रधानमंत्री काफी प्रसन्न है और इसीलिऐ उन्हें यह तीसरी बार पुरस्कार मिला है. 

शिवराज सिंह चौहान


मुख्यमंत्री जी की प्रसन्नता और अधिक मुखरित हुई जब उन्होंने अपने घर पर प्रदेश के किसानो का आंमत्रित किया और 14 किसानो को पुरस्कृत किया जिनमें से 5 किसानो को राज्य स्तरीय पुरुस्कार और 9 किसानो को जिला स्तरीय पुरस्कार दिये गये कि यह लोग बहुत बढ़िया फसल पैदा कर रहे है. हांलाकि यह आश्चर्य का विषय है कि प्रदेश में उन्नत कृषि और बढ़िया फसल पैदा करने वाले मात्र 14 किसान ही मिल पाये.

दूसरी तरफ 25 विभागो को इस उन्नत कृषि के लिये पुरस्कृत किया गया और विभाग का मतलब विभाग का मुखिया याने अफसर साहबान 25 पुरस्कृत हुये. और किसान मात्र 14 ऐसा लगता है कि कृषि शायद मुख्यमंत्री की नजरो में अब खेतो में कम फाइलो मे ंज्यादा होने लगी है.

मुख्यमंत्री जी ने इस अवसर पर अपनी खुद की पीठ ठोकी और विदिशा जिले में अपने खेत ओर खेती की चर्चा की. तथा बाबा रामदेव की तर्ज पर खाद्य प्रसंस्करण उद्योग लगाने की भी चर्चा की. उनकी इस चर्चा के अखबारों में छपने के बाद विदिशा के उनकी ही पार्टी के जानकार लोगो ने बातचीत में कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न खड़े किये? एक मित्र ने कहा कि मुख्यमंत्री जी की खेती और उनका गॉव जैत है जो सीहोर जिले में आता है. उस मूल गॉव में उनकी खेती का उल्ल्ेाख उन्होंने नही किया.

विदिशा मे उनकी खेती की उन्नति और उनकी राजनैतिक उन्नति के बीच कुछ रिष्ता है. विदिशा में उनकी खेती विदिशा का सांसद बनने के बाद षुरु हुई और उन्नत खेती मुख्यमंत्री बनने के बाद. यह उन्नत खेती श्री शिवराजसिंह चौहान की है या मुख्यमंत्री जी की यह भी शोध का विषय है?

म.प्र. में कितना भारी सूखा है यह अब किसी से छिपा नही है. पिछले चार माह के अखबार सूखे की कहानी सूखे खेतो के फोटो किसानो के दुःख और आत्म हत्यायों के समाचारो से भरे पड़े है. प्रदेश सरकार ने स्वतः माना था कि 42 जिलो में सूखे और अकाल की छाया है तथा मदद के नाम पर भारत सरकार से पहले 12 हजार करोड़ रु. और घटते-घटते छः हजार करोड़ रु. की मांग की थी.

किसानो को समय पर मदद या मुआवजा नही मिल पाया उसके परिणाम स्वरुप बड़ी संख्या किसानो में आत्म हत्याये की और यह स्थिति लगभग पिछले तीन वर्षो से लगातार जारी है. यहॉ तक कि पिछले तीन वर्षो की ओलावृष्ठि का मुआवजा भी अभी तक किसानो नही मिल पाया. इसके बावजूद भी भारत सरकार ने लगातार तीसरी बार प्रदेष सरकार को कृषिकर्मण पुरस्कार से पुरस्कृत किया है.

देश के पुरस्कारो और उसकी वास्तविकताओं का खुलासा इन पुरस्कारों से हो जाता है. वैसे तो इस समय देश में ही नहीं बल्कि सारी दुनिया में जो पुरस्कार बॅट रहे है उनकी स्थिति इसी प्रकार की है. अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार तो बहुत हद तक वैश्विक राजनैतिक संतुलन या आवश्यकताओं, व कारपोरेट समूहों के मोहरों को ही ज्यादातर दिये जा रहे है और फिर वे मोहरे अपने पुरस्कार देने वाली संस्थाओं के धनस्रोतों की जरुरतों को पूरा करने या उनके लिये बाजार तैयार करने फिर उनके पीछे की शक्तियों के राजनीतिक लक्ष्यों की पूर्ति में काम आते है.

यही बजह है कि इन पुरस्कारों से तैयार किये सेलेब्रिटी नाम के लोग समाज में कोई प्रभाव नही डाल पाते. आम तौर पर शासकीय पुरस्कार भी अफसरशाही अपने राजनैतिक आकाओं के इशारे पर तय करती है. दिल्ली की हुकुमत को किसे उठाना है और किसे गिराना है इस आधार पर पुरस्कार तय होते है.

अगर ऐसा नही होता तो दिल्ली के आला अफसरशाह और सरकार की आलाकमान इतना तो पूछतीं कि अगर कृषि उन्नत हुई है तो यह बार-बार का सूखा क्यों? किसानो की आत्महत्यायें क्यों? सिंचाई योजनायें क्यों नही बनी? सिंचित रकवा क्यों नही बढ़ा? परन्तु पहले कहा जाता था कि न्याय अंधा होता है जो अपना पराया नही देखता अब कहा जाता है कि सरकारे अंधी होती है जो गुण अबगुण नही देखती और न्याय पालिका की ऑखे खुल गई है जो अपने पराये को देखकर निर्णय देने लगी है.

एक उन्नत कृषि करने वाले किसान ने अपने साक्षत्कार में कहा कि उन्होंने एक एकड़ जमीन में 25 कुंण्टल गेहूं पैदा किया. जो कृषि को थोड़ा बहुत जानते है वे जानते है कि बीस गुना तक गेहॅू सामान्य सिंचित वाली जमीन पैदा करती है और अगर हाईब्रीड सीड या (उच्चनस्ल के बीज) और विदेशी खाद का जोड़ा बन जाये तो फिर कुछ समय के लिये फसल 80 से 100 गुना तक हो सकती है. अब इसमें उन्नत खेती कहॉ खड़ी है?

पिछले दिनों अरहर के दाल का संकट खड़ा हुआ और अरहर के दाल के दाम ऐन बिहार चुनाव के वक्त बढ़कर 200 रु. किलो तक पहॅुच गये. दिल्ली के चुनाव के समय प्याज के दाम बढ़कर 80 रु किलो तक बढ़ गये थे. अभी कुछ दिनों पूर्व भोपाल के बाजार मे लहसुन के फुटकर दाम 300 से 400 रुपये प्रति किलो हो गये. अभी भी लहसुन इतना मंहगा कि घरो में उसका इस्तेमाल लगभग न के बराबर हो गया है.

अगर प्रदेश में इतनी उन्नत कृषि है तो फिर प्रदेश मे इन खाद्यान्नो का अभाव क्यों हुआ? वस्तु स्थिति यह है कि भले ही संविधान ने मंत्री मंडल और सरकार की सामूहिकता व एक रुपता की कल्पना की है परन्तु व्यवहार में सरकार विभाजित ढंग से काम कर रही है. हर हाथ के अलग-अलग अपने-अपने काम है और वे अपने-अपने निर्णय करते है. जिनमें परस्पर तारतम्य या सामूहिक निर्णय नही है. एक हाथ अकाल और सूखे की परिस्थितियॉ पैदा करता है तो दूसरा हाथ राहत बॉटता है और तीसरा हाथ पुरस्कार देता है.

मुख्यमंत्री जी ने, अपनी भावी योजना का भी उद्घाटन किया है कि वे अब फुड प्रोसेसिंग में, कूदेगें. उन्होने कहा ’’अगर बाबा रामदेव के ब्रांड बिक जाते है तो अपने क्यों नही?’’ वे यह भूल गये कि कृषि खेत की पैदावार है तथा प्रोसेस्ड फुड कारखाने का. बाबा रामदेव कृषि नही कर रहे है बल्कि, आयुर्वेदिक दवाओं को बनाकर बेच रहे है. या फिर पैकेड सामग्री को शुद्वता के नाम पर बेच रहे है. लगता है कि अब मुख्यमंत्री जी उद्योग के क्षेत्र में पैर रखने की तैयारी में है.

लायसेंस खुद ही देना है कमीशन लगना नही है सस्ता कर्ज, अनुदान, पानी, बिजली सस्ती व नियमित मिल ही जाना है. और प्रदेश जो अभी तक राजनीति का बाजार था, अब उत्पादो का भी बाजार बन जायेगा. अब ऐसा महसूस होने लगा है कि केन्द्र और राज्य सरकारे ऑकड़ो की खेती करते है, वायदो की सिंचाई करते है, झूठ का खाद डालते है, और वोटो की फसल काटते है.

27.02.
2016, 19.39 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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