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बदलाव का मौका फिर खोया

विचार

 

बदलाव का मौका फिर खोया

प्रीतीश नंदी


राजनीति में चतुर लोग अपने व्यक्तित्व की खासियत बरकरार रखकर शुरुआत करते हैं. यही बात उन्हें तत्काल आकर्षण का केंद्र बना देती है. उन्हें आगे ले जाती है, लेकिन इस रास्ते पर बने रहना इतना आसान नहीं है. परिस्थितियों से मजबूर होकर आखिरकार प्रतिद्वंद्वी एक-दूसरे के आसपास मंडराने लगते हैं. फिर खौफनाक बदलाव यह होता है कि वे एक-दूसरे जैसे दिखने लगते हैं. .

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आप वही व्यक्ति हो जाते हैं, जिसे आप सबसे ज्यादा नापसंद करते थे. राजनेता यह कड़वी हकीकत स्वीकारने की बजाय मरना पसंद करेंगे. किंतु सच यही है कि कुछ समय बाद वे एक-दूसरे जैसे दिखने लगते हैं, बातचीत की शैली समान हो जाती है अौर व्यवहार भी. यही हाल उन दलों का हो जाता है, जिनका वे प्रतिनिधित्व करते हैं. इसी वजह से हमारे सामने बहुत कम विकल्प होते हैं. अंग्रेजी मुहावरे में कहें तो यह ट्विडलडी होता है या ट्विडलडम होता है.

बंगाल में हमारे यहां लोकप्रिय कहावत है: जो भी लंका में जाता है, रावण हो जाता है. नहीं बात वह नहीं है, जो आप सोच रहे हैं. हमारी संस्कृति में रावण खलनायक नहीं है. वह महान विद्वान, बुद्धिशाली व्यक्ति, भगवान शिव का अनन्य भक्त और वीणा में महारत रखने वाला संगीतकार है. वह अपने पुत्र से अत्यधिक स्नेह करने वाला पिता है और मेघनाद की हत्या होने पर बहुत दुखी होता है.

मैंने जिस पहले महाकाव्य का अनुवाद किया था वह था 19वीं सदी के महान कवि माइकल मधुसुदन दत्त का ‘मेघनाद वध.’ उन्होंने कवि के रूप में शुरुआत की थी, क्योंकि वे अंग्रेजों और उनके साहित्य के प्रशंसक थे, लेकिन अंतत: बंगाली भाषा की ओर मुड़े और यह महान काव्य लिखा, जिसने रावण को बंगाल में महान लोक-नायक बना दिया.

सोमवार को पेश किया गया केंद्रीय बजट पहचान खोने का ऐसा ही मामला है. यह अच्छा बजट है, लेकिन उत्साह पैदा करने वाला बजट नहीं है. हमने तो बहुत पहले ही उत्साहजनक बजट की उम्मीद छोड़ दी है. इस घटना का आकार और मीडिया कवरेज जैसे-जैसे बढ़ता गया, उतना इसके बारे में अनुमान लगाना आसान हो गया.

थोड़ी बहुत छेड़छाड़ करके ही वित्त मंत्रियों को लंबे-लंबे संपादकीय लेखों की सराहना मिल जाती है. किंतु मुझे ईमानदारी से बताएं कि यह पता नहीं होता कि अरुण जेटली ने इसे पेश किया है, तो क्या कभी आप यह भरोसा कर पाते कि यह बजट बिज़नेस सेक्टर के हीरो मोदी की दक्षिणपंथी सरकार ने पेश किया है? यह तो बखूबी कांग्रेस का बजट भी हो सकता था. जिन बिंदुओं को छुआ गया है, वे समान ही हैं. मुहावरे तक समान हैं. हमेशा की तरह किसान शिकार भी है और हीरो भी.

खलनायक तो शहरों के धनी लोग हैं, जिन पर और टैक्स लगाने की जरूरत है और जेटली ने ऐसा करने की चतुराईपूर्ण नई रणनीतियां खोज निकाली हैं. तंबाकू को भी हमेशा जैसा बर्ताव मिला. सिगरेट अब और महंगी हो गई है. बीड़ी को छुआ भी नहीं (प्रफुल्ल पटेल राहत की सांस ले सकते हैं). इसका ज्यादा अर्थ न भी लगाएं, यह तो पता चलता ही है कि जितना भारत बदलता है, उतना ही यह वही बना रहता है. कम से कम उन लोगों के लिए तो यह सही है, जो हमारा बजट बनाते हैं और पिछले सात दशकों से ऐसा कर रहे हैं.

आर्थिक सुधारक नरेंद्र मोदी के लिए यह एकदम सही मौका था कि वे आगे बढ़कर पुरानी रूढ़ि को नई परिभाषा देते, नए विचार आजमाते, नई चुनौतियों का सामना करते, नामुमकिन को मुमकिन बनाने का जोखिम लेते. उनके पास उस राष्ट्र पर शासन करने के तीन वर्ष ही बचे हैं, जो खुद कोर दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के रूप में देखता है.

इसकी बजाय कि वे बीड़ा उठाकर दुनिया को बताते कि वे बदलाव को अपने तरीके संभव बना सकते हैं, उन्होंने उसी विचारधारा की नकल की, जिसकी उन्होंने इतनी खिल्ली उड़ाई, तिरस्कार किया. नतीजे में सामने ऐसा बजट है, जो दिखने, महसूस करने और सुनने में ठीक वैसा है, जैसा इतने वर्षों से हम देखते रहे हैं.

भारत फिर वास्तविक बदलाव का मौका खो बैठा है और एक बार फिर हमें अहसास हो रहा है कि हम किसी को भी वोट दें, उनकी विचारधारा कोई भी क्यों न हो, परिणाम हमेशा समान ही होगा. सत्ता में वामपंथी हो या दक्षिणपंथी, चाहे कम्युनिस्ट शासन करें या जो खुद को राष्ट्रवादी कहते हैं- जैसे यह विचारधारा उनकी बपौती है- शासन करने की घिसी-पिटी बातें अक्षुण्ण बनी रहती हैं.

हम वहीं अटके पड़े रहते हैं, जहां दशकों से हैं, इसलिए जाट आरक्षण की मांग करते हैं तो उन्हें मिल जाता है. मध्यवर्ग को राहत चाहिए तो उसे नहीं मिलती. यदि विपक्ष सूट-बूट की सरकार कहकर आपकी खिल्ली उड़ाता है, तो तत्काल आप किसानों के नए मसीहा बन जाते हैं. यही वजह है कि इस सरकार और पूर्ववर्ती सरकारों में फर्क करना इतना मुश्किल है. यहां तक कि कुछ भी गलत होने के बाद प्रधानमंत्री का मौन भी समान है.

भारत में शासन का एक ढर्रा है और जो भी सत्ता में आता है, खुद -ब-खुद इसे स्वीकार कर लेता है. मैं यह भरोसा करना चाहूंगा कि मोदी ने लंबे समय तक इसका विरोध किया, क्योंकि वे वाकई अलग ढंग से कुछ करना चाहते थे. उनके पूर्ववर्ती के विपरीत, जिसने सिर्फ कुर्सी में बैठना पसंद किया और सारी गलत बातों से इस तरह आंखें फेर लीं, जैसे उनसे उनका कोई संबंध ही नहीं.

मोदी ने शुरुआत तो यह ढर्रा बदलने (या नया बनाने) के इरादे से की थी, लेकिन पाया कि यह काम असंभव है. मास्को से स्वदेश लौटते हुए नवाज शरीफ की नातिन की शादी के लिए लाहौर जाना बहुत साहसिक पहल थी. वे भारत और दुनिया को बताना चाहते थे कि वे चीजें अलग ढंग से करके नतीजों का जोखिम उठा सकते हैं.

किंतु अपने रास्ते पर आगे बढ़ते हुए मोदी हिम्मत तथा उत्साह खो बैठे और वह परंपरागत प्रधानमंत्री बन गए, जससे वे बहुत नफरत करते थे. सोमवार के बजट ने हमें फिर याद दिलाया है कि हम चाहे जो करें, किसी को भी वोट दें और चाहे जिस विचारधारा को अपनाएं आखिर में जो भी सत्ता में आता है वह न वामपंथी होता है और न दक्षिणपंथी होता है.

आखिरकार वह मध्यमार्गी सरकार ही बन जाती है, जो परंपरा का निर्वाह करती है, उन्हीं घिसे-पिटे मुहावरों का इस्तेमाल करती है, जिन्हें सुनकर हम बड़े हुए हैं. जो भी लंका में जाता है, अंत में रावण ही हो जाता है. और कौन जानता है कि संभव है यह इतना भी बुरा विचार न हो.

03.02.2016
, 20.00 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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