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भारतीय जाति व्यवस्था और आरएसएस

विचार

 

भारतीय जाति व्यवस्था और आरएसएस

नेहा दाभाड़े


विज्ञान उन्हें बहुत आकर्षित करता था और वे अम्बेडकर के लेखन और उनकी सोच के लेंस के सहारे सत्य की खोज में रत थे. वे जाति की समस्या से बहुत व्यथित थे और उसके हल के लिए कुछ करना चाहते थे. एएसए ने याकूब मैमन को फांसी दिए जाने के खिलाफ एक बैठक का आयोजन किया क्योंकि वह सिद्धांततः मृत्युदंड के खिलाफ था..
 

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इस बैठक में आरएसएस की छात्र शाखा एबीवीपी के सदस्यों ने हंगामा किया. इसके पहले, रोहित ने दिल्ली विश्वविद्यालय में ‘‘मुजफ्फरनगर बाकी है‘‘ फिल्म के प्रदर्शन को जबरदस्ती रोके जाने का विरोध किया था. ऐसा आरोप है कि रोहित ने सन् 2015 में एबीव्हीपी के एक नेता पर हमला किया, जिसमें उसे गंभीर चोटें आईं.

बाद में यह पता चला कि एबीव्हीपी नेता एपेंडिसाईटिस के आपरेशन के लिए अस्पताल में भर्ती हुए थे ना कि चोट के इलाज के लिए. इसके बाद भी, विश्वविद्यालय के अधिकारियों ने रोहित को निलंबित कर दिया और उनकी शिष्यवृत्ति बंद कर दी गई. विश्वविद्यालय की इस प्रतिशोधात्मक कार्यवाही के चलते रोहित को अपने घरवालों को पैसा भेजना बंद करना पड़ा, जिसकी उन्हें सख्त जरूरत थी.

रोहित और एएसए के अन्य छात्रों को उनकी विचारधारा और राजनैतिक प्रतिबद्धताओं के लिए ‘‘राष्ट्रविरोधी, अतिवादी और जातिवादी‘‘ बताया गया. ये आरोप विश्वविद्यालय प्रशासन और सरकार दोनों ने लगाए. उनकी मां ने हाल में इस बात पर क्षोभ व्यक्त किया कि अन्य राजनेताओं के विपरीत, प्रधानमंत्री ने रोहित के परिवार से संपर्क करने की जरूरत नहीं समझी. उनकी यह मांग है कि रोहित के साथ न्याय होना चाहिए.

दरअसल रोहित तो केवल एक उदाहरण है. हमारे जातिग्रस्त समाज में दलितों को नक्सल बताया जाना आम है. उनके साथ बलात्कार होते हैं, उनके खिलाफ हिंसा की जाती है और भेदभाव भी. उदाहरणार्थ, सन् 2014 में सुधीर धावाले को 40 माह बाद नागपुर जेल से रिहा किया गया. उसे 60 अन्य आदिवासी व दलित कार्यकर्ताओं के साथ, गिरफ्तार किया गया था. वह सामाजिक असमानता पर प्रश्न उठाता था परंतु उस पर नक्सली होने के आरोप जड़ दिए गए. सुधीर की तरह देश में अनेक सामाजिक कार्यकर्ता हैं जिन्हें अपने हक मांगने के लिए राज्य के कोप का शिकार बनना पड़ता है.

जातिप्रथा केवल हिन्दू धर्म में है. इस व्यवस्था में किसी व्यक्ति का सामाजिक दर्जा और उसका पेशा उसके जन्म से निर्धारित होता है. कोई व्यक्ति जिस जाति में जन्म लेता है, उसी में मरता है. नीची जातियों में जन्में व्यक्तियों के साथ अन्याय और भेदभाव होता है. किसी व्यक्ति की योग्यता या उसकी पसंद का कोई महत्व नहीं है. यही कारण है कि रोहित वैमूला ने सुसाईड नोट में अपने जन्म को ‘‘प्राणघातक दुर्घटना‘‘ बताया था. पुराने समय में दलित की परछाई भी अपवित्र समझी जाती थी. वे सभी अधिकारों से वंचित थे.

आज भी दलितों द्वारा आवाज उठाए जाने या उनके सामाजिक उत्थान से वर्चस्ववादी शक्तियों को बहुत तकलीफ होती है और दलितों को किसी भी प्रकार से कुचलना, उनका लक्ष्य होता है. दलित दूल्हों को आज भी बारात में घोड़े पर नहीं बैठने दिया जाता और दलित महिला सरपंचों के साथ बलात्कार और उन्हें नंगा कर घुमाए जाने की अनेक घटनाएं हो चुकी हैं. कुछ ग्रामीण इलाकों में आज भी छुआछूत की प्रथा है. दलित न तो मंदिरों में घुस सकते हैं और ना सार्वजनिक कुओं से पानी ले सकते हैं.

परंतु अम्बेडकर द्वारा लाई गई जागृति, संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों और औपनिवेशिक काल में किए गए सुधारों के कारण भेदभाव और अछूत प्रथा आज उतने क्रूर और अमानवीय स्वरूप में विद्यमान नहीं है जैसे कि पहले थी. परंतु उसका केवल रूप बदला है, वह समाप्त नहीं हुई है. जिन लोगों को जाति प्रथा से लाभ होता है, वे इसे कभी समाप्त नहीं होने देंगे.

आरएसएस, दलितों के साथ जुड़ने का प्रयास कर रहा है. इसका उद्देश्य समावेशी भारत का निर्माण या सामाजिक समानता स्थापित करना नहीं है. आरएसएस ने खैरलांजी की घटना का कभी विरोध नहीं किया. वह अंतर्रजातीय विवाहों के खिलाफ है. दलितों से जुड़ने के पीछे आरएसएस के दो उद्देश्य हैं. पहला, दलितों की समानता व सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक व सांस्कृतिक अधिकारों को आत्मसात करना. आरएसएस, दलितों के संघर्ष को समाप्त करना चाहता है. दूसरा, मुसलमानों और ईसाईयों-जिन्हें आरएसएस बाहरी मानता है-से लड़ने के लिए आरएसएस दलितों का इस्तेमाल करना चाहता है.
 

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