पहला पन्ना प्रतिक्रिया   Font Download   हमसे जुड़ें RSS Contact
larger
smaller
reset

इस अंक में

 

क्यों बढ़ रहा भूख का आंकड़ा

हमारे कुलभूषण को छोड़ दो

भारत व अमेरिका में केमिकल लोचा

सवाल विकास की समझ का

प्रतिरोध के वक्ती सवालों से अलग

गरीबी उन्मूलन के नाम पर मज़ाक

जनमत की बात करिये सरकार

नेपाल पर भारत की चुप्पी

लोहिया काल यानी संसद का स्वर्णिम काल

स्मार्ट विलेज कब स्मार्ट बनेंगे

पाकिस्तान आंदोलन पर नई रोशनी

नर्मदा आंदोलन का मतलब

क्यों बढ़ रहा भूख का आंकड़ा

हमारे कुलभूषण को छोड़ दो

भारत व अमेरिका में केमिकल लोचा

युद्ध के विरुद्ध

किसके साथ किसका विकास

क्या बदल रहा है हिन्दू धर्म का चेहरा?

मोदी, अमेरिका और खेती के सवाल

 
  पहला पन्ना > Print | Share This  

गुटखा सेवन यानी धीमा जहर

विचार

 

गुटखा सेवन यानी धीमा जहर

रघु ठाकुर


9 फरवरी 2016 की रात्री निजामुद्दीन जबलपुर एक्सप्रेस से यात्रा कर रहा था और तभी मुझे रात्री में एक मित्र ने फोन पर जानकारी दी कि सागर के केन्ट बोर्ड के पूर्व पार्षद डा.प्रमोद चौकसे का आज अचानक हृदयघात होने के कारण निधन हो गया. यह खबर मुझे दुःखद भी थी और आष्चर्यजनक भी थी. डा.प्रमोद चौकसे की उम्र 58 के आस-पास थी तथा उन्हें इस प्रकार की बीमारी की जानकारी भी किसी को नही थी. . 

gutkha


प्रमोद चौकसे सागर विश्वविद्यालय से पी.एच.डी. थे, और कई वर्षो तक उन्होंने अध्यापन का कार्य भी करते रहे. वे एक अच्छे सामाजिक कार्यकर्ता भी थे. मैंने उनकी अत्येष्टी में शामिल होने के बाद उनकी मृत्यु के कारणो की खोज करने का भी प्रयास किया. दरअसल प्रमोद चौकसे की मौत का बड़ा कारण जो उनके परिवार से लेकर उनके मित्रों तक ने बताया कि वे गुटखा बहुत खाते थे.

गुटखा उनके जीवन का हिस्सा जैसा बन गया था. उनकी पत्नि जो अभी केन्ट बोर्ड पार्षद है, उनके परिजनो व मेरे जैसे अनेक शुभचिन्तको ने उन्हें कई बार इस गुटखा बीमारी के प्रति उनको सावधान भी किया था परन्तु गुटखा उनके लिये ऐसी बीमारी बन चुका था जिस के समक्ष वे लाचार थे.

गुटखा अब देश में बच्चो से लेकर बूढ़ो तक, गॉव से लेकर षहर तक, एक महामारी का रुप ले चुका है. इस गुटखे में गुटखा बनाने वाले, तम्बाकू के अलावा और भी कई ऐसे पदार्थो का इस्तेमाल करते है जिससे वह उसका उपयोग करने वाले को उसका अभ्यस्त बना देता है तथा एक प्रकार का नषेलची बना देता है.

यह गुटखा लाखों लोगों को कैंसर की बीमारी का शिकार बना रहा है, और उससे भी बड़ी संख्या में इसकी वजह से लोग हृदयघात के शिकार हो रहे है परन्तु समाज और शासन की प्रतिक्रियाये और उनके स्वर बहुत ही कमजोर है. वाकायदा टी.वी. चैनलो, समाचार पत्रों, में इनके विज्ञापन आते है जबकि वैधानिक तौर पर इन पर रोक है. न्यायपालिका के रोक के बावजूद भी गुटखा धड़ल्ले से सारे देश में बिक रहा है. सड़कों पर तो छोटे-छोटे बच्चे गुटखा बेचते हुये देखते है पर पुलिस अपना हिस्सा लेकर शांत रहती है. यह बच्चे भी गुटखा बेचते-बेचते खुद भी खाना सीखते है, और उसके नषेलची बन जाते है.

एक गरीब आदमी भी दिन भर में भले ही रोटियॉ आठ खाता हो परन्तु 15-20 गुटखा खा जाता है याने 75-100 रुपये रोज इस पर खर्च कर देता है. महीने का 2 से 3 हजार रुपया और एक साल मे ंऔसतन 25-30 हजार रुपया. कई बार मैने यात्रा के दौरान लोगो को अपनी जेबो में 10-10,से 20-20 गुटखे के पैकेट भरे हुये देखा है. गुटखा बनाने वाले साल -दरसाल में करोड़पति अरबपति बन जाते है और देश के लाखो नौजवान केंसर, हृदयरोग, जैसे घातक बीमारी के शिकार हो जाते है.

एक मोटे अनुमान के अनुसार देश में लगभग 1लाख करोड़ साल का गुटखे का व्यापार होता है. जिसमें 10 प्रतिषत लागत व परिवहन व्यय होता है और षेष 90 प्रतिषत याने 90 हजार करोड़ रुपया साल का मुनाफे में जाता है इसका औसतन 10 प्रतिषत पुलिस तंत्र को, 10 प्रतिषत रेल तंत्र को भ्रष्टाचार में जाता है. 20 प्रतिषत बेचने वाले का कमीषन होता है, और षेष 50 प्रतिषत बनाने वाले मौत के ठेकेदारों का मुनाफा बन जाता है. याने ये गुटखा निर्माता 50 हजार करोड़ साल का मुनाफा कमाते है.

न्यायपालिका ने सार्वजनिक स्थानों पर गुटखे की बिक्री पर रोक के आदेश दिये है तथा शासन भी विज्ञापन प्रचार के माध्यम से प्रचार कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेता है तथा शासन और न्यायपालिका आम चलन के अनुसार रिश्वत से हार जाती है. गुटखा और सट्टा का चलन समूचा देश के गरीबो को लूटने का माध्यम बन गया है. गॉव-गॉव की महिलाये यहॉ तक की मजदूरी करने वाली महिलाये गुटखे का सेवन व सट्टे का नम्बर लगाने लगी है.

ऐसा नही है कि शासन चाहे तो इस पर रोक नही लगा सकता, यदि शासन संकल्पित होकर पुलिस तंत्र को कसे और निर्माताओं के विरुद्व छापामारी कार्यवाही करें तो समस्या का हल निकल सकता है. जब गुटखा के निर्माण केन्द्र ही बंद हो जायेगे तो फिर गुटखा की बिक्री अपने आप बंद हो जायेगी.

तम्बाखू और सुर्ती भी स्वास्थ के लिये बहुत नुकसानदेह है. क्योंकि उसमें निकोटीन की मात्रा होती है. बीड़ी, सिगरेट भी स्वास्थ के लिये हानिकारक है क्योंकि उनमें भी निकोटीन होती है. परन्तु गुटखा इसमें सर्वाधिक खतरनाक है. तम्बाकू खाने वाला तम्बाकू खाकर थूकता भी है जिससे उसका प्रभाव कुछ कम हो जाता है परन्तु गुटखे वाला सारा का सारा पी जाता है.

अब समाज को और परिवारजनों को संगठित पहल करना होगी ताकि समाज और परिवार गुटखे के प्रभावो से अपने आप को बचा सके. मेरी राय में समाज और परिवारों को निम्न कदम उठाना चाहियेः-
1.माता-पिता अपने बच्चो को और बच्चे अपने माता-पिता को समझाये और रोके तथा अगर आवष्यकता महसूस हो तो प्रेेमपूर्वक सत्याग्रह करें.

अगर माता या पिता अपने बच्चे को गुटखा से विमुख करने के लिये यह निर्णय करेगे कि वे उनकी आदत को छुड़ाने के लिये स्वतः तकलीफ उठायेगे तथा उपवास करेगे और इसी प्रकार बच्चे अपने माता-पिता के साथ प्रेम पूर्वक सत्याग्रह करेगें तो यह रिष्तो और प्रेम की डोरी से बॅधी एक बाध्यकारी रोक हो सकती है.

2. नगर या मुहल्ले में जहॉ कहीं भी गुटखा उत्पादन के या संग्रह के केन्द्र हो उनके सामने धरना दें और पुलिस और प्रशासन को उन्हें बंद करने के लिये बाध्य करें.

3. सोषल मीडिया पर गुटखे के विरुद्व अभियान चलाया जाये. गुटखे से होने वाले नुकसान की जानकारी को जन-जन तक पहॅुचाया जाये और लोगो को प्रेरित किया जाये.

4. न्यायपालिका, शासन और शासन पुलिस को स्पष्ट समयबद्ध कार्यावाही का आदेश दें तथा गुटखा के निर्माण केन्द्रो पर छापा डालकर उन्हें बंद कराये.

5. दंड विधान में संसोधन कर गुटखा र्निमाताओं की व थोकमंद विक्रेताओं की सम्पति को जप्त करने का प्रावधान बने और उनकी सम्पति जप्त की जाये. गुटखा बनाने वाले अपने लाभ के लिये लाखो लोगो की मौत और घातक बीमारियों के जबावदार है. यह एक, दो के नही बल्कि हजारो लाखो मौतो के जबावदार और हत्यारे है. इनके विरुद्व राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के अंतगर्त कार्यवाही होना चाहियें.

डा.प्रमोद चौकसे की असमायिक मृत्यु के सामान्य मौत नही माना जा सकता. बल्कि यह एक भ्रष्ट तंत्र और कमजोर व्यवस्था के चलते हुई निर्मम हत्या जैसी है. जिसमें व्यक्ति एक बार ही नही बल्कि षनै-षनै मृत्यु की ओर जाता है. इसके लिये समाज भी गुनाहगार है.

15.03.2016, 16.59 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


इस समाचार / लेख पर अपनी प्रतिक्रिया हमें प्रेषित करें

  ई-मेल ई-मेल अन्य विजिटर्स को दिखाई दे । ना दिखाई दे ।
  नाम       स्थान   
  प्रतिक्रिया
   


 
  ▪ हमारे बारे में   ▪ विज्ञापन   |  ▪ उपयोग की शर्तें
2009-10 Raviwar Media Pvt. Ltd., INDIA. feedback@raviwar.com  Powered by Medialab.in