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तथ्यों की परवाह करना जरूरी

विचार

 

तथ्यों की परवाह करना जरूरी

प्रीतीश नंदी


जनमत को लेकर आज सबसे बड़ी समस्या यह है कि इसे किसी भी दिशा में आसानी से मोड़ा जा सकता है. लोगों को कोई ऐसी कहानी दे दीजिए, जो समाज में चल रहे वर्णन से या कहें कि बतकही से मेल खाती है और आप यह पक्का भरोसा कर सकते हैं कि वे इसे स्वीकार कर लेंगे.
 

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फिर चाहे वह कहानी कितनी ही मूर्खतापूर्ण नज़र आए अथवा उसका जरूरत से ज्यादा सरलीकरण कर दिया गया हो. तलाश हमेशा उस विकल्प के लिए होगी, जिसमें ज्यादा दिमाग लगाने की जरूरत न हो. इसे हम लेज़ी च्वॉइस कह सकते हैं और इसकी ज्यादा तलाश होती है.


यही वजह है कि हम क्यों टेलीविजन अौर सोशल मीडिया से सुनी-सुनाई बातों को स्वीकार कर लेते हैं. इन दोनों में से कोई भी उनके द्वारा पेश किए गए विचारों की प्रखरता अथवा इसके विश्लेषण के लिए ख्यात नहीं है. दोनों आपको समाचार तत्काल देते हैं. इंस्टन्ट न्यूज़!

किंतु इससे भी खतरनाक बात तो यह है कि ये दोनों आपको विश्लेषण और विभिन्न किस्म की राय भी तत्काल उपलब्ध करा देते हैं. जैसा कि हम सब जानते हैं सच ऐसे आसानी से निकाले गए निष्कर्षों और अभिमतों में शायद ही कभी व्यक्त होता है.

शरलॉक होम्स की तरह कहना होगा कि किसी घटना की स्वाभाविक व्याख्या के सही होने की उतनी ही कम गुंजाइश या संभावना होती है. यही कारण है कि शरलॉक हमेशा वाटसन से पूछता है कि केस के बारे में उसका क्या विचार है ताकि उस विकल्प को वह शुरू में ही खारिज कर दे और दूसरी दिशा में सच को तलाशने की कोशिश शुरू करे, क्योंकि सच खुद को हमेशा वहां छिपाता है, जहां उसके होने की बहुत कम संभावना होती है. केवल असली दुस्साहसी व्यक्ति ही उस सच को खोज सकता है. अब पीटर मुखर्जी के मामले को ही लीजिए.

यह पूरी तरह इस लिजलिजे अनुमान पर खड़ा है कि इंद्राणी के पति के रूप में उन्हें निश्चित ही यह जानकारी होगी कि वे क्या कर रही हैं. कोई भी आपको बता सकता है कि आमतौर पर पति ही वह आखिरी शख्स होता है, जिसे मालूम हो कि महिला क्या करने जा रही है या किस उधेड़बुन में लगी है. जहां तक खुद इंद्राणी का सवाल है तो शीना बोरा अब भी लापता है और यदि शेरलॉक होम्स को फिर उद्‌धृत करें तो जब तक शव नहीं मिलता तब ऐसी कोई हत्या नहीं हुई है, जिसे साबित किया जा सके.

मेरे कहने का आशय कतई यह नहीं है कि पीटर या इंद्राणी निर्दोष हैं. किंतु पहले दिन से ही जनमत उन दोनों को फांसी पर लटकाने के लिए तैयार है. यह अनुचित जल्दबाजी है. वास्तविक सत्य का संबंध तो चैनल के उस बिज़नेस से हो सकता है, जो इन दोनों ने पीटर के स्टार टीवी छोड़ने के बाद शुरू किया था. इसमें बहुत सारा पैसा लगाया गया था और कोई भी आज तक पता नहीं लगा पाया कि यह सारा पैसा गया कहां.

समस्या यह है कि हम हमेशा अपराधी को धर-दबोचने की जल्दी में होते हैं. हम अपराध की पूरी सावधानी और सतर्कता से जांच करना नहीं चाहते. हम मामले को जल्द बंद करने की कोशिश में ऐसे केस तैयार कर लेते हैं जो अंतत: अदालत में धराशायी हो जाते हैं. यही वजह है कि बरसों की मुकदमेबाजी के बावजूद सलमान खान बच निकलते हैं.

हसन अली की टैक्स देनदारी का मामला एक दशक की जांच और जमानत की 14 याचिकाएं ठुकराए जाने के बाद इनकम टैक्स ट्रायब्यूनल द्वारा सिर्फ 3 करोड़ रुपए की पाई जाती है, जबकि शुरू में अनुमान 37,000 करोड़ रुपए की टैक्स देनदारी का लगाया गया था. इस बीच, मीडिया ने तो पहले ही इन लोगों पर मुकदमा चलाकर उन्हें फांसी पर लटका दिया है. दोनों जेल में रहे. सलमान थोड़े समय के लिए और अली (जो बीमार भी रहे हैं) बरसों तक.

सुप्रीम कोर्ट ने पिछले हफ्ते दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर साईबाबा को रिहा किया. वे भी व्हीलचेयर का इस्तेमाल करने वाले बीमार व्यक्ति हैं. उन्हें माओवादियों से सहानुभूति रखने के संदेह में गिरफ्तार किया गया था. कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को फटकार लगाई है. तत्काल समाचार और उतनी ही जल्दी उसके बारे में राय-मशविरे की तरह अब हमें तत्काल न्याय, इंस्टन्ट जस्टिस चाहिए. इसलिए अब हम खून की प्यासी किसी भीड़ की तरह सोचने और दलीलें देने लगे हैं.

हम किसी भी ऐसी राय को खारिज कर देते हैं, जो हमारी यह प्यास पूरी नहीं करती. हमने समस्याएं सुलझाने की प्रक्रिया से बौद्धिकता को हटा लिया है, क्योंकि हमें यह अनावश्यक और जटिल बोझ लगता है. हम तो बस यही चाहते हैं कि जिन्हें हम दोषी मानते हैं उन्हें जल्दी से जल्दी भूखे शेरों के सामने डाल दिया जाए और न्यूज़ बुलेटिन में हम यह खूनी खेल होता देखें.

यही वजह है कि आज की राजनीति कभी न खत्म होने वाले स्कैंडलों पर की जा रही है. जो कहानी सुर्खियां बटोरती हैं, वह कम के कम कुछ देर के लिए तो स्क्रीन पर ठहरती हंै. मानहानि के कानूनों की तो किसी को परवाह ही नहीं. कोई भी, लगभग कुछ भी कहकर बच सकता है. इसलिए नहीं कि हम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को महत्व देते हैं, बल्कि इसलिए कि हम हमेशा निकृष्टतम किस्से पर भरोसा करने के लिए तैयार रहते हैं.

वे जो ख्याति और प्रसिद्धि के शिखर पर सबसे आसान शिकार हैं. मीडिया को इनके आसपास कहानियां बुनना आसान लगता है. आसपास के लोग इस कहानी को नमक-मिर्च लगाकर बार-बार दोहराना पसंद करते हैं. वास्तविक मीडिया बिज़नेस की बजाय स्कैंडल उद्योग ज्यादा तेजी से बढ़ रहा है. बैंकों के ऐसे कई देनदार होंगे ही जिन्हें माल्या की तुलना में कहीं ज्यादा पैसा लौटाना होगा और उनके द्वारा पैसे लौटाने की संभावना भी बहुत कम होगी, लेकिन वे खबरों से बाहर रहने में कामयाब हैं. गुमनामी ही उनका कवच बन जाती है.

तथ्यों की किसी को चिंता नहीं है. हर कोई निशाना बनाने में लगा है. मुझे यह जानने की उत्सुकता रहेगी कि पनामा पेपर्स में जिन 500 लोगों के नाम हैं, उनमें से कितने लोगों पर सफलतापूर्वक मुकदमा चलाया जाता है. गलती उनकी नहीं है. ऐसा नहीं है कि टैक्स की दृष्टि से स्वर्ग माने जाने वाले देशों में खाता होने वाला हर भारतीय काले धन के ढेर पर बैठा है. हो सकता है कि वह सारी कानूनी प्रक्रियाओं से गुजर कर अपने बिज़नेस को अंजाम दे रहा हो.

इंस्टन्ट न्यूज़ के इस जमाने में मीडिया की खास जिम्मेदारी है. हमें आसान सुर्खियों के फेर से बचना चाहिए. यह रुकना चाहिए. तत्काल न्याय का विचार अच्छा हो सकता है, लेकिन यदि हर वक्त हम इसका पीछा करते रहें तो हम दूसरों को हमारी राय को अवांछित दिशा में मोड़ने का मौका देंगे. हमें बेहतर ढंग से सूचना संपन्न होना चाहिए. यह तभी संभव है जब हम बिना कुछ जाने आकलन करना बंद कर देंगे, जैसा कि हम पहले करते थे. यही तो खबर है और बाकी? स्कैंडल, हंटिंग.

13.04.2016, 18.59 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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